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सोमवार, 28 सितंबर 2020

वीरेन्द्र आस्तिक : समय, साहित्य और संपादन — अवनीश सिंह चौहान


पिछले वर्ष (दिसंबर 30, 2019) लखनऊ में 'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान' द्वारा जब वीरेन्द्र आस्तिक (जन्म : 15 जुलाई 1947) को 'साहित्य भूषण सम्मान' से सम्मानित किया गया, तब उन्हें और उनके परिवार को बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ देने वालों का तांता लग गया। यह तांता उनके घर पर भी लगा था और बाहर भी— ख़ासकर फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर सैकड़ों शुभ-संदेशों के साथ छात्र-छात्राओं, शोधार्थियों, पाठकों, श्रोताओं, मित्रों, शुभचिन्तकों, कवियों, आलोचकों, शिक्षकों, पत्रकारों का उमड़ पड़ना। यद्यपि यह बात कहने की नहीं है— साहित्य जगत इस घटना से लगभग पूरी तरह से परिचित है ही— फिर भी, बिना लाग-लपेट के, यहाँ कहने की अनुमति चाहता हूँ। अनुमति इसलिए कि—  "कब से तुम गा रहे" (ठाकुरप्रसाद सिंह), "जो गाना था वह न गा सके"  (डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया), "इस सदी का गीत हूँ मैं" (माहेश्वर तिवारी ), "हम न होंगे... ये गीत होंगे" (गुलाब सिंह), "गीत गाता चल, ओ साथी, गुनगुनाता चल" ( रवीन्द्र जैन, फिल्म; गीत गाता चल, 1975),  "मैं फिर से गाऊँगा" (दिनेश सिंह), "मैं तुम्हें गाता रहूँगा" (किशन सरोज), "तेरे प्यार के नगमे गाऊँगा" (मनोज मुंतशिर, फिल्म: हाफ गर्लफ्रेंड), "मैं समय का गीत हूँ" (आ. वीरेन्द्र आस्तिक जी) जैसे तमाम महत्वपूर्ण गीत, गीत सृजन की अभीप्सा का संकेत करते हुए, 'भाव-सेवा' के लिए रचे तो जाते हैं, किन्तु उन्हें समय से नोटिस नहीं किया जाता है। ऐसे में, भला गीतकारों की कौन सुध ले— वे लिखते रहें, खपते रहें, मिटते रहें और अपनी "स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा" की उद्घोषणा कर संतुष्ट हो लें। कहने वाले कहेंगे— इससे अधिक और क्या? नहीं, इससे भी अधिक बहुत कुछ है, जीव-सेवा हेतु, समाज-सेवा हेतु, राष्ट्र-सेवा हेतु, विश्व-सेवा हेतु— कहने और करने के लिए। 

शायद तभी शुद्ध, सात्विक एवं शाश्वत मूल्यों को उद्घाटित करने वाले गीतऋषि वीरेन्द्र आस्तिक स्पष्ट रूप से कह देते हैं—  "मैं कलियुग का सच हूँ, सच/ का निपुण प्रवक्ता-सा/ आँखें तो टपकें पर/ हिरदय पुरयिन पत्ता-सा।/ अक्ल खुली क्या, मुक्त हुआ मन/ दुनिया के सामान से।" कलिकाल का यही सच है— "यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार" (कवि-कुल कमल बाबा तुलसीदास) और इसीलिये सत्य में स्थित हो आस्तिक जी जन-हित के पथ का वरण करना ज्यादा श्रेष्ठ समझते हैं— "शब्द-सर में डूब जाते/ पीर जन की कौन हरता/ मोक्ष का पद त्याग,/ जनहित का चुनो पथ,/ कौन कहता।/ चुभ रहे थे कील-कंकण/ चलती सड़कों से उठाए।" आज जब करोड़ों लोग जन्म और मृत्यु से परे मोक्ष पद प्राप्ति के लिए तमाम ठठकर्म कर रहे हैं, तब 'मोक्ष का पद त्याग' करने का उपदेश तो आस्तिक जी जैसा कोई कर्मयोगी ही दे सकता है, क्योंकि— "सकल जीव बसहिं महादेवा/ जीव सेवाहु सिव की सेवा" (पूज्यपाद श्रीरामकृष्ण परमहंस)। 'सेवा-भाव' की शब्दाग्नि में निरंतर दहने वाले सुकंठी आस्तिक जी मन, वचन और कर्म से पवित्र एवं निर्मल हैं— "मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु संवारेहु" और स्वभाव से विनम्र एवं सहज भी— "सहज सुभाय सुभग तन गोरे" (कवि-कुल-कमल बाबा तुलसीदास)।  यह मैं नहीं कह रहा हूँ! उनको पढ़ने पर, उनको सुनने पर, उनसे मिलने पर, उनसे बातचीत करने पर स्वयं प्रकट हो जाता है कि कैसे साकार-सदेह-निश्छल-निर्मल विनम्रता एवं सहजता का दिग्दर्शन उनकी भेदरहित कृतज्ञता के अखण्ड-भाव में समाहित है और कैसे उनकी रागवेषित सहज टिप्पणियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं— "कुछ खास बात जरूर होगी कि मुझे आप सभी आत्मीयों का इतना प्यार मिल रहा है, सभी को अभिवादन", "हमें नवगीत को किसी सीमा तक नहीं, व्यापकता की ओर ले जाना होगा" और "आत्मीय अवनीश, नवगीत की विशद चर्चा करके (आस्तिक जी को साहित्य भूषण मिलने पर समाचार प्रकाशित करने के सन्दर्भ में) आपने नवगीत को ऊँचाई प्रदान की है। हमलोग तो सिर्फ माध्यम हैं। बहुत-बहुत बधाई" (वीरेन्द्र आस्तिक, फेसबुक)।  

कवि, आलोचक एवं सम्पादक वीरेंद्र आस्तिक बाल्यकाल से ही अन्वेषी, कल्पनाशील, आत्मविश्वासी, स्वावलंबी, विचारशील, कलात्मक एवं रचनात्मक रहे हैं। बाल्यकाल में मेधावी एवं लगनशील होने पर भी न तो उनकी शिक्षा-दीक्षा ही ठीक से हो सकी और न ही विरासत में मिले शास्त्रीय संगीत और गायन में वह आगे बढ़ सके। जैसे-तैसे 1962 में हाईस्कूल की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की और एक-दो वर्ष संघर्ष करने के बाद 1964 में देशसेवा के लिए भारतीय वायु सेना में भर्ती हो गये। पढ़ना-लिखना चलता रहा और छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में वीरेंद्र बाबू और वीरेंद्र ठाकुर के नामों से छपना भी प्रारम्भ हो गया। उनकी पहिला कविता 1971 में 'साप्ताहिक नीतिमान' (जयपुर) में छपी थी। उन दिनों आस्तिक जी दिल्ली में रहा करते थे। दिल्ली में नई कविता का दौर चल रहा था, शायद इसीलिये उन्होंने यहाँ नई कविता और गीत साथ-साथ लिखे। 1974 में भारतीय वायु सेना छोड़ने के बाद वह कानपुर आ गए और अगले वर्ष (1975) से ही भारत संचार निगम लि. को अपनी सेवाएँ देने लगे। कानपुर में छंदबद्ध कविता की लहर थी। इस नये माहौल का उनके मनोमस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह गीत के साथ ग़ज़लें भी लिखने लगे। 1980 में रामस्वरूप सिन्दूर ने एक स्मारिका प्रकाशित की, जिसमें — 'वीरेंद्र आस्तिक के गीत' (गीतों की संख्या 24) प्रकाशित हुए। 1984 में उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर से एम.ए. (हिंदी) की परीक्षा उत्तीर्ण की। 2007 में  बीएसएनएल में लम्बे अरसे तक अपनी सेवाएँ देने के बाद ससम्मान सेवानिवृत्त हुए। 

600 से अधिक समकालीन गीत और 100 से अधिक शोधपरक आलेख, जो प्रतिष्ठित अखबारों, पत्रिकाओं, यथा— 'दैनिक जागरण', 'दैनिक हिंदुस्तान', 'सन्डे मेल', 'जनसंदेश टाइम्स', 'प्रेसमेन', 'विधान केसरी', 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान', 'वागर्थ', 'आजकल', 'कल के लिए', 'गगनांचल', 'नये-पुराने', 'अतैव', 'मधुमती', 'गीत नवांतर', 'पाखी', 'संकल्प रथ', 'उत्तरायण', 'नवनीत', 'प्रयास', 'उत्तरार्द्ध', 'अलाव', 'पूर्वाभास', 'कविताकोश', 'अनुभूति', 'हिंदी समय'  आदि  और महत्वपूर्ण समवेत संकलनों, यथा— 'कानपुर के कवि' (सं.- प्रतीक मिश्र, 1985), 'हिंदी के मनमोहक गीत' (सं.- इसाक अश्क एवं चंद्रसेन विराट, 1997), 'श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन' (सं.- कन्हैयालाल नंदन, 2000), 'बीसवीं सदी के श्रेष्ठ गीत' (सं.- मधुकर गौड़, 2003), 'बंजर धरती पर इंद्रधनुश : मैं और मेरी पसंद' (सं.- कन्हैयालाल नंदन, 2003), 'गीत नवांतर-5' (सं.- मधुकर गौड़, 2006), 'शब्दपदी' (सं.- निर्मल शुक्ल, 2006), 'शब्दायन : दृष्टिकोण एवं प्रतिनिधि' (सं.- निर्मल शुक्ल, 2012), 'गीत वसुधा' (सं.- नचिकेता, 2013), 'सहयात्री समय के' (सं.- डॉ रणजीत पटेल, 2016), 'शिखर के सात स्वर' (सं.- डॉ मधुसूदन साहा एवं डॉ के के प्रजापति, 2016), 'नई सदी के नवगीत : खण्ड-2' (सं.- डॉ ओम प्रकाश सिंह, 2016) आदि में प्रकाशित और आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित हुए, के यशस्वी कलमकार आस्तिक जी मुख्य रूप से कानपुर देहात की अकबरपुर तहसील के रहने वाले हैं।

वीरेन्द्र आस्तिक कृत 'परछाईं के पांव' (गीत-ग़ज़ल संग्रह, 1982), 'आनंद! तेरी हार है' (गीत-नवगीत संग्रह, 1987), 'तारीखों के हस्ताक्षर' (राष्ट्रीय त्रासदी के गीत,  उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से अनुदान प्राप्त, 1992), 'आकाश तो जीने नहीं देता' (नवगीत संग्रह 2002), 'दिन क्या बुरे थे' (नवगीत संग्रह, सर्जना पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, 2012), 'गीत अपने ही सुनें' (प्रेम-सौन्दर्यमूलक नवगीत संग्रह, 2017) आदि बहुचर्चित काव्य-कृतियों ने उन्हें नई ऊँचाईयाँ प्रदान कीं। इसी दौरान सितम्बर 2013 में भोपाल के जाने-माने गीतकवि एवं सम्पादक राम अधीर ने 'संकल्प रथ' पत्रिका का महत्वपूर्ण विशेषांक— 'वीरेन्द्र आस्तिक पर एकाग्र' प्रकाशित किया। इस विशेषांक में भाव और विचार से आस्तिक वीरेंद्र आस्तिक पर तमाम लेखकों ने अपनी सार्थक कलम चलाई है। आस्तिकता को रेखांकित करते हुए 'परछाईं के पाँव' की भूमिका में कवि एवं आचार्य डॉ रवीन्द्र भ्रमर ने ठीक ही लिखा था— "रेखांकित करने योग्य एक विशेष बात यह है कि वीरेंद्र आस्तिक के गीतों में निर्गुण संत-भक्तों जैसी एकांत समर्पण भावना और घनीभूत रागात्मकता के बीज मिलते हैं। इनका उपनाम 'आस्तिक' होना निरर्थक नहीं प्रतीत होता है। प्रेम मंदिर के पुजारी की तुलना में और अधिक आस्तिक दूसरा कौन हो सकता है? वीरेंद्र की यह आस्तिकता इनके गीतों में एक खास तरह का आध्यात्मिक आभास उत्पन्न करती है।" 

नवगीत सृजन एवं आलोचना के जरिए ख्याति प्राप्त करने वाले वीरेंद्र आस्तिक मानते हैं कि नवगीत मूलत: ऋग्वेद से विरासत में मिले गीत की आधारशिला पर ही खड़ा हुआ है और इसीलिये आज गीत अपनी यात्रा में कई पड़ावों को पार कर नवगीत के रूप में समकालीन लोक-जीवन की संवेदना, संस्कृति एवं सरोकारों को मुखरित कर रहा है। सर्वाधिक चर्चित समवेत संकलन 'धार पर हम' (1998, बड़ौदा विश्वविद्यालय में एम.ए. पाठ्यक्रम में निर्धारण : 1999-2005) एवं 'धार पर हम- दो' (2010, नवगीत-विमर्श एवं नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर) के प्रकाशन से आस्तिक जी को जबरदस्त सराहना मिली। एक प्रतिष्ठित समीक्षक के रूप में उन्होंने विभिन्न कृतियों में यादगार भूमिका आलेख भी लिखे हैं, जिनमें आचार्य रजनीश (ओशो) कृत 'केनोपनिषद' (प्रवचनों का अनुवादित संकलन, 1989), माँ प्रबुद्धानन्द कृत 'अवकाश' (कविता संग्रह, 2000), मनोज जैन 'मधुर' कृत 'एक बूँद हम' (नवगीत संग्रह, 2012), अवनीश सिंह चौहान कृत 'टुकड़ा कागज़ का' (नवगीत संग्रह, 2013), शंकर दीक्षित कृत 'चाँदनी समेटते हुए' (नवगीत संग्रह, 2015), डॉ संतोष तिवारी कृत 'रिश्ते: मन के मन से' (कहानी संग्रह, 2017), डॉ टी. रवींद्रन कृत 'परिवर्तन के बाद' (कविता संग्रह, 2018), रामनारायण 'रमण' कृत 'जोर लगा के हइया' (नवगीत संग्रह, 2020) आदि प्रमुख हैं। हाल ही में उनकी आलोचना पुस्तक— 'नवगीत: समीक्षा के नये आयाम' (2019) के जरिए उन्होंने गीत-नवगीत क्या है, इसे जानने-समझने का मनोयोगपूर्वक प्रयास किया है। 

संपादन के साथ लेखन को धार देने वाले आस्तिक जी के नवगीत किसी एक काल खंड तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनमें समयानुसार प्रवाह देखने को मिलता है। यह प्रवाह उनकी रचनाओं की रवानगी से ऐसे घुल-मिल जाता है कि जैसे स्वातंत्र्योत्तर भारत के इतिहास के व्यापक स्वरुप से परिचय कराता एक अखण्ड तत्व ही मानो नाना रूप में विद्यमान हो। इस दृष्टि से उनके नवगीत, जिनमें नए-नए बिम्बों की झलक है और अपने ढंग की सार्थक व्यंजना भी, भारतीय जन और मन को बड़ी साफगोई से व्यंजित करते हैं। राग-तत्व के साथ विचार तत्व के आग्रही आस्तिक जी की रचनाओं में भाषा-लालित्य और सौंदर्य देखते बनता है— शायद तभी कन्नौजी, बैंसवाड़ी, अवधी, बुंदेली, उर्दू, खड़ी बोली और अंग्रेजी के चिर-परिचित सुनहरे शब्दों से लैस उनकी रचनाएँ भावक को अतिरिक्त रस से भर देती हैं। अनुभूति की प्रमाणिकता, सात्विक मानुषी परिकल्पना एवं अकिंचनता का भाव इस रस-सिद्ध कवि-आलोचक को पठनीय एवं महनीय बना देता है— "हम ज़मीन पर ही रहते हैं​/अम्बर पास चला आता है​​​।​/ हम न हिमालय की ऊंचाई​/ नहीं मील के हम पत्थर हैं​/ अपनी छाया के बाढ़े हम/ जैसे भी हैं हम सुन्दर हैं​​​।​/ हम तो एक किनारे भर हैं​/ सागर पास चला आता है​​।​"​

साहित्य संगम (कानपुर, उत्तर प्रदेश) द्वारा 'रजत पदक' एवं 'गीतमणि- 1985' की उपाधि— 17 मई 1986, श्री अध्यात्म विद्यापीठ (नैमिषारण्य, सीतापुर) के 75 वें अधिवेशन पर काव्य पाठ हेतु 'प्रशस्ति पत्र'— फरवरी 1987, अखिल भारतीय साहित्य कला मंच (मुरादाबाद) द्वारा 'अलंकार सम्मान'— 2012, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (लखनऊ) द्वारा 'सर्जना पुरस्कार'— 2012, निमित्त साहित्यिक संस्था (कानपुर) द्वारा 'अलंकरण सम्मान'— 2013, श्री सत्य कॉलेज ऑफ हायर एजुकेशन (मुरादाबाद) द्वारा 'गीतांगनी  पुरस्कार/सम्मान'— 2014, बैसवारा शोध संस्थान (लालगंज, रायबरेली) द्वारा 'सुमित्रा कुमारी सिन्हा स्मृति सम्मान'— 2015, संकल्प संस्थान (राउरकेला, उड़ीसा) द्वारा 'संकल्प साहित्य शिरोमणि सम्मान'— 2016, संयोग साहित्य (भायंदर-मुंबई, महाराष्ट्र) द्वारा 'संयोग गीत वैभव सम्मान'— 2018, 'कादम्बरी' और 'महाकोशल शहीद स्मारक ट्रस्ट' (जबलपुर, म.प्र.) द्वारा  'स्व. यदुनंदन प्रसाद बाजपेयी सम्मान'— 2019 से अलंकृत आस्तिक जी स्वस्थ रहें और शतायु हों, परम पिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है।

1. मेरी कविता के नायक

तुम नायक
मेरी कविता के
जबर बना कर तुमको सीढ़ी
आसमान पर चढ़ जाते हैं

तुम हो कितने पास मगर वे
कितने दूर-दूर रहते हैं
कहने भर को महानगर में
झुग्गी और महल रहते हैं

बराबरी के बन प्रतीक वे
'राजघाट' तक हो आते हैं

उपन्यास सम्राट बने वो
जस के तस तुम धनिया-गोबर
तुमको पढ़-पढ़ हुए यहाँ पर
बड़े नामवर, बड़े मनीजर

तुम ही तो 'स्लमडाग' तुम्हीं पर
लोग पुरस्कृत  हो जाते हैं। 

कैसा मैं बनिया शब्दों का
रहा उठाता हरदम घाटा
कैसे वे जो 'दलित' शब्द पर
राज कर रहे बन महराजा

मिथक हो गई दलित जि़न्दगी
काल-पुरुष वे बन जाते हैं। 
                       
2. हूँ पका फल

हूँ पका फल
अब गिरा मैं तब गिरा

उम्र का अंतिम चरण है
और स्वागत पत्थरों से
लोग ऐसी नाजुकी में
कब निकलते हैं घरों से

हो गया मन
भीष्म तन शर से विंधा

मैं नहीं इतिहास वो जो
जिंदगी भर द्रोण झेले
यश नहीं चाहा कभी जो
दान में अंगुष्ठ ले ले

क्या सिधाई है
कि दिल शूली छिदा। 

3. आईना है वक्त

आईना है वक्त
यह पत्थर नहीं है।

वस्तु के विज्ञापनों में
एक भाषा पिट रही है
और इस बाजार के मुँह
लग गया मछली दही है

हादसा है
खुशनुमा मंजर नहीं है।

थूह, टीला या कि पर्वत
या कि घाटी की सतह से
यह तुम्हीं पर तुम ‘विजन’ को
देखते हो किस जगह से

यह धरा पूरी तरह
बंजर नहीं है

युद्ध, मंदी या धमाके
हार में जो भी मिले हैं
कुछ प्रसू जय के
शहीदों की चिताओं पर खिले हैं

मूर्खों की आँख
फिर भी तर नहीं है।

4. थर्रा उठा वन

आँख में भर तो लिया वन
पर यहाँ भी मन नहीं थिर।

आरियों के स्वार्थ से
आदिम दिखे भिड़ते हुए
और तरु की आँख से
आँसू दिखे बहते हुए

चीख सुन थर्रा उठा वन
साँस टूटी तरु गया चिर

भेड़िए में शक्ल हिटलर
की दिखाई पड़ गई
पीठ पर मेरी तभी
बंदूक भय की गड़ गई

चिथ रही होगी किशोरी
बाघ से छौना गया घिर

चाह थी खुद को भुला दूँ
कलरवी सुर-ताल में
वह कृषक सुगना तभी बन
फड़फड़ाया जाल में

जान लेकर ही गया था
विश्वग्रामी दूत आखिर।

5. ऐ गन्ध ! तेरी हार है

सूख जाते हैं सुमन,
ऐ गन्ध ! तेरी हार है
      
ज़िन्दगी है एक जंगल
चैन काँटों का बिछौना
रूप को गढ़ता समय पर
प्रीति है टूटा खिलौना
     
टूट जाते हैं सपन,
संबंध ! तेरी हार है
      
घोंसला भाये नहीं यदि
एक तिनका भी बिखरता
फिर वही है जो कि तारों
को पिरोकर एक करता
      
छूट जाते हैं सदन,
सौगन्ध ! तेरी हार है
      
तुम हमारे हम तुम्हारे
नाम लिखते थे करों पर
वो कभी मिटता नहीं जो
खुद गया गाये स्वरों पर
        
छलछलाते हैं नयन,
आनन्द ! तेरी हार है। 

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