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बुधवार, 12 जनवरी 2022

‘नवगीत वाङ्मय’ : एक समीक्षा — डॉ वीरेन्द्र निर्झर

पूर्वाभास, वर्ष 12, अंक 1, जनवरी 2022 

[पुस्तक : नवगीत वाङ्मय, संपादक : अवनीश सिंह चौहान, प्रकाशक : आथर्सप्रेस, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष : 2021 (संस्करण प्रथम, पेपर बैक), पृष्ठ : 174, मूल्य रु 350/-, ISBN 978-93-5529-004-5]

(1)
नवगीत पर अब तक अनेक संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। सभी संकलनों के अपने-अपने मानदंड हैं— कुछ क्षेत्रीय कवियों को लेकर प्रकाश में आए हैं, तो कुछ काल खण्डों के आधार पर और कुछ कोश के रूप में। कुछ संग्रहों की भूमिकाएँ नवगीत की पृष्ठभूमि और स्वरूप को व्याख्यायित करतीं बड़ी और व्यापक हैं। 

नवगीत पर सन 2021 में आथर्स प्रेस, नई दिल्ली से यशस्वी नवगीतकार डॉ अवनीश सिंह चौहान द्वारा संपादित 'नवगीत वाङ्मय' नाम से एक और संकलन प्रकाश में आया है, जो चार पर्वों में संकलित, नाम के अनुरूप नवगीत की समग्रता को समोये हुए है। इस ग्रंथ में डॉ चौहान द्वारा लिखी भूमिका— 'प्रसंगवश' मात्र डेढ़ पेज में है। लघुकाय इस भूमिका में डॉ चौहान आम आदमी के साथ-साथ खास आदमी के दुख-दर्दों की बात भी उठाते हैं। भले ही दोनों के दुख-दर्द अलग-अलग हैं, पर खास आदमी का दुख-दर्द भी दुख-दर्द है, उसे नकारना वे समीचीन नहीं मानते। दूसरे वे नवगीत को प्रेम, प्रकृति, हर्ष, विषाद, संघर्ष, वर्तमान विसंगतियों आदि जीवन के सतरंगी अनुभवों को उकेरने की एक सशक्त एवं प्रतिष्ठित विधा मानते हैं। थोड़े शब्दों में उन्होंने बहुत कुछ कहने का प्रयास किया है। 

डॉ चौहान ने 'नवगीत वाङ्मय' के प्रथम पर्व को 'समारंभ' कहा है। इस पर्व में नवगीत के पुरस्कर्ता और दिवंगत कवियों में प्रमुख डॉ शम्भुनाथ सिंह, डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया और डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह के संक्षिप्त परिचय सहित प्रत्येक के तीन-तीन नवगीत संकलित किए गए हैं। 'नवरंग' पर्व में उन प्रवर नौ  नवगीतकारों के नौ-नौ गीत संपादित हैं, जो नवगीत की निकष हैं और आज भी इस विधा को समृद्ध कर रहे हैं। तीसरा पर्व 'अथबोध' है। इस पर्व में यशस्वी कवि एवं आलोचक दिनेश सिंह का 'नवगीत की संघर्षशील जयी चेतना' शीर्षक से समीक्षात्मक लेख दिया गया है। अंतिम पर्व का नाम साक्षात्कार है, जिसमें डॉ मधुसूदन साहा से संपादक महोदय की बातचीत का ब्यौरा है। इस प्रकार काव्य, लेख और साक्षात्कार से युक्त यह संकलन नवगीत पर एक सम्यक संपादन है और 'वाङ्मय' शब्द की व्यापकता के अनुरूप भी।

(2)
युगीन नव्यता और गीतात्मक छंद विधान दोनों की संपृक्ति में गीत की अमरता के दृष्टा, नवगीत के समर्थ और पुरोधा कवि डॉ शम्भुनाथ सिंह 'समारंभ' पर्व के पहले कवि हैं— नई कविता के दौर में गीत विधा में नई स्फूर्ति फूँकने वाले कवि। इस संकलन में उनके तीन गीत संग्रहीत हैं, जो समय की त्रासदी का सम्यक चित्र प्रस्तुत करते हैं। 'सोन हँसी हँसते हैं लोग' (17) में हँस-हँस कर डसते लोगों के आम चरित्र को कवि ने उजागर किया है। नगर, घर, बस्ती सभी कत्लगाहों की तरह दुखद और संवेदना-शून्य है। ऊपर से सुंदर दिखती इस दुनिया में— "वे, हम, तुम और ये सभी/ लगते कितने प्यारे लोग/ पर कितने तीखे नाखून/ रखते हैं ये सारे लोग" (18)। दूसरे गीत में 'देश' हम-आप-सब का समष्टि का प्रतीक है और 'राजधानी' व्यष्टि का। समाज, संस्कृति और उसके गौरव को, जिसे हम हजारों बरस से जी रहे हैं, वह अभी भी हमारी रगों में गर्म खून की तरह प्रवहमान है। उसे कोई भी शक्ति "मोड़ सकती मगर/ तोड़ सकती नहीं" (19) में कवि ने राष्ट्रीयता का उद्बोध दिया है। तीसरा गीत मानवता की रोशनी के लिए बुराइयों से लड़ने की इच्छाशक्ति को संबलित करता है। इस प्रकार शम्भुनाथ सिंह जी के गीत मानवता के विकास और युग की अपेक्षाओं के सजग संवाहक हैं।

(3)
डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया ने गीत ढाँचे की रक्षा करते हुए उसकी निजी पहचान को नवीन आयाम दिए हैं। इनमें उनका रूढ़िग्रस्त सोच को तोड़ने और सापेक्ष संस्कार गढ़ने का प्रयास है। 'पुरवा जो डोल गई' ग्राम्य जीवन के प्राकृतिक सौंदर्य और परिश्रम का वह सौंधा गीत है जिससे उनकी गीत साधना को प्रतिष्ठा मिली है। 'नदी का बहना मुझमें हो' में जीवन की प्रवहमानता और परोपकार का भाव तो है ही, विलुप्त होती मानवता को पुनः प्रतिष्ठापित करने का प्रयास भी है। तीसरा गीत "जी कर देख लिया जीने में/ कितना मरना पड़ता है" (24) जीवन संघर्ष का गीत है। इसमें अपनी शर्तों पर जीने की चाह और विसंगतियों से जूझने, समझौता होने आदि की अनचाही स्थितियों की व्यंजना है। भदौरिया जी के गीत कई बार एक छंद तक ही सिमटे हुए हैं, पर हैं लोक की अभिव्यंजना के तीखे तेवरों से युक्त।

(4)
नवगीत के अन्य महास्तंभ डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह ने आज के गीत का नामकरण 'नवगीत' ही नहीं किया, उसे गहरे तक जिया भी है। उनके अनुसार नवगीत नई अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिक समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार्य है। संकलन के 'अर्थ मेरा क्या' गीत में मानव जीवन के अर्थ को खोजते सिंह साहब बहुरंगी गतिविधियों और विसंगतियों के बीच जीवन को समझने और पकड़ने के प्रयास में हैं, तो 'बीच की सड़क हुई ख़तम' में नदी और पोखर, गाँव और नगरों, अभिजात्य और सामान्यजन, पूंजीपति और गरीबों के बीच सड़क न होने से भटक जाने के असमंजस में हैं। 'किधर जाएँ हम' गीत में वे जनजीवन के ऊहापोह को व्यंजित करते और नई सभ्यता के उलझावों से त्रस्त जीवन की विडंबना को उद्घाटित करते हैं। इस प्रकार 'समारंभ' पर्व नवगीत की पूर्वपीठिका है, प्रशस्त पथ और पाथेय है, जिसके सहारे नवगीत के नए आयाम तय हुए हैं।

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'नवरंग' में नव जहाँ नवता का परिचायक है, वहीं नवगीत को पूर्णता की ओर ले जाने वाले उन नौ शिखरस्थ गीतकारों के गीतों का संकलन है, जिन्होंने नवगीत की दिशा और उसके बोध को संबलित किया है। 1940 से 1964 के बीच में जन्मे ये गीतकार नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर ही नहीं, नवगीत धारा के वे पुण्य तीर्थ हैं जहाँ से आवेग लेकर धारा पुरस्सर हुई है और आज भी जो धारा को प्राण संपन्न बनाए हुए हैं।

नवरंग के इन नवगीतकारों में पहला नाम गुलाब सिंह जी का है, जिनके अब तक पाँच नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। विभिन्न नवगीत संग्रहों में भी उनके नवगीत संग्रहीत हैं। आत्मा की तरह कविता की अमरता के संपोषक गुलाब सिंह जी समय और उसकी प्रवृत्तियों के साथ बदलती जीवनलय को जिस सूक्ष्मता के साथ महसूसते हैं, उसे उस रूप में प्रस्तुत भी करते हैं। 'जीवन राग' गीत में गाँव के पारंपरिक जीवन के सुख-दुखात्मक संवेदन, भाव, कल्पना और लयात्मकता के बीच भीतर बसे प्रयाग की पावनता का स्मरण करते हुए वे उसमें रमण की भावना से जुड़े हैं। गीत की रसज्ञता के बीच वे आदमियत को बचाने और प्रेम को ध्रुपद बनाने के लिए लालायित हैं। पंक्तियाँ हैं—

सघन भीड़ में बचे ‘आदमी’
उसका आदमकद हो
गए प्यार का नए गीत में
आगम ही ध्रुवपद हो

धुले मैल, निखरे मानवता
चमक उठे बेदाग। (33)
आँगन में तुलसी का बिरवा
मन में जीवन राग। (33)

पर गाँव का जीवन आज 'लाठी और भैंस' की कहावत की तरह शक्ति-संपन्नों के हाथ— "गरीब की पतोहू-सी" (35) हो गया है।

नगरीय जीवन की असंतुष्टता में भी— "यह शहर का घाट है/ पानी नहीं, सीढ़ी तो है/ इस सदी का सफर है/ सपने नहीं, पीढ़ी तो है" (34) के रूप में सदी की यात्रा में संतोष व्यक्त करती भीड़ की तकदीर की तरह परवाहहीन जहाँगीरी को अपनाए बढ़ी चल रही है। संतोष की यह इयत्ता "देखते एँड़ी उठाकर/ हम बड़े कि तुम बड़े" (34) में विवशता की संवेदना को स्पर्श करती है। असंतोष और संतोष के अंतर को नापती है। 'समय के प्रवाह' गीत में आधुनिकता के प्रवाह और अपनों से आँख चुराते इस सदी का वर्णन है, तो फूल वाले रास्तों पर चलने और हथेली मलने में ऊंची उड़ानों की व्यस्तता समाहित है। 'बाजार' कविता में विदेशी सामानों की चमक-दमक और बाजारवाद का प्रभाव है, तो 'पत्ते' गीत में लोभ-लालच से परे देश के विकास का स्वर है और 'वनवासी' गीत में वनवासी जीवन की सुख-दुख की दास्तान है। इस प्रकार गुलाब सिंह जी जहाँ विसंगतियों से पहचान कराते हैं, बदलते गांवों और नगरों से रूबरू कराते हैं, वहीं अंतिम गीत में पठारीपन को वैचारिक लहर से सींचकर हरा करने और "मिटाकर के सत्य का/ वनवास, वत्सल प्राणदा/ संकल्प सत्तासीन" (42) करने में मानव-शक्ति को जगाने के प्रयास में हैं।

(6)
दूसरे गीतकार मयंक श्रीवास्तव जी अपने समय के विसंगत यथार्थ के प्रति जितने सचेत हैं, मानवता के प्रति उतने ही संवेदनशील भी हैं। नवगीत को इसी अर्थ में वे गीत के विकास का सोपान मानते हैं। समय कितना भी बदल जाए, पर व्यक्ति की सकारात्मक सोच, सात्विकता और आचरण की शुचिता लोक में उसे प्रतिष्ठावान बनाती है। लोक उसी को सिर माथे पर लेता है, जिसमें वह मानवीयता और अपनेपन की झलक देखता है। 'कथन में आए होंगे हम' गीत में इसी तथ्य को मयंक जी ने व्यक्त किया है। वे लिखते हैं— "अपनेपन की किरण/ कहीं देखी होगी/ इसके बाद नयन में आए होंगे हम" (44)। यद्यपि नगरीय विकास की हवा तथा अपसंस्कृति का प्रभाव गाँवों को भी गिरफ्त में ले रहा है, पर मयंक जी उसे विकृतियों से बचाए रखने के लिए वह जैसा है वैसा ही रहने देने के पक्षधर हैं—  "मेरा गाँव अगर छोटा है/ छोटा ही रहने दो" (45) और "जब तक भी बह सके/ हवा पावन होकर बहने दो" (45)। 'लोग यहाँ' गीत में मानवता के बिखरने और विघटनकारी शक्तियों तथा गुणधर्मों की व्यंजना है, तो "आग लगती जा रही है/ अन्न-पानी में/ और जलसे हो रहे हैं/ राजधानी में" (47) गीत में भी विसंगतियों की तस्वीर उभरी है। आज के प्रवाह में सब कुछ बदल रहा है, सपने ध्वस्त हो रहे हैं और अस्वीकार्य को भी स्वीकारने की बेबसी है। शहरी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन का प्रभाव गाँवों की जीवन शैली को भी बदल रहा है। 'लड़के के जीवन' गीत की पंक्तियाँ हैं—

मेरा लड़का जान गया 
क्या होती बिरियानी 
पीने से पहले शराब में 
मिलता है पानी 

वापस जाते समय 
मीन का 
स्वाद उछाल गया। (46)
... 
सीख गया सुत 'मटन'
मांस को बोला जाता है 
मदिरा की बोतल को कैसे 
खोला जाता है 

मन उसका 
उजली चादर से 
हो रूमाल गया। (47)

आज की आपाधापी में सरगम के तार के ढीला होने, लय खंडित होने, और मन को जीवन की लंगड़ी भाषा के बेधने में मन पंछी की उड़ान ही रुक गई है। ऐसे में गीत के अनबोले दीप मानवता को रोशन कर जाते हैं। मयंक जी के गीत विसंगतियों को तोड़ने और मानवीयता के फलने-फूलने की कामना से परिपूर्ण अटल सत्य की स्थापना की प्रतीक हैं। वे कहते हैं—

तुम नहीं मुझको सुनहरी और ऊँची 
कल्पनाओं की नकल देना 
शब्द कुछ मुझको असल देना 

गाँव की पगडंडियाँ लूटी गई हैं 
हो सके तो तुम लुटेरों का पता दे दो 
मेड़ की खोई हंसी फिर ढूँढ़ लाना 
अन्यथा घायल दिलों को और मत भेदो 

जो न हिल पाए कभी अपनी जगह से 
बात कुछ ऐसी अटल देना। (53)

इस प्रकार मयंक जी में विडंबनाओं का दर्द गहरे तक पैठा हुआ है। वे परिवेश से संतप्त मनुष्य की मुक्ति के लिए बेचैन हैं।

(7)
'नवरंग' में तीसरा स्वर शान्ति सुमन जी का है। भले ही डॉ शम्भुनाथ सिंह ने अपने दशकों और संकलनों में उन्हें स्थान न दिया हो, पर उनके गीत समय के साथ न्याय करते समकालीनता से जुड़े नवता के हर क्षितिज को छूने के प्रयास में हैं। संकलन का पहला गीत— 'फिर हरापन ओढ़ती है/ ताल में झरती कमल की पंखुरी' में विडंबनाओं और दुखों से भरे जीवन के हरियाने की कल्पना में उल्लिखित बिम्ब— उड़ने के लिए पाँखें तोलते परिंदे, शिवालय के कलश पर मेघों की बांसुरी का स्वर, जंगलों के रास्तों में प्रकाश फूटने और पीड़ा से तृप्त पाँव की पायल छनकने में गाँवों के विकास शहरों को भी पीछे छोड़ने का भाव समेटे हैं। 

अवतरण होगा, बहेगी धार 
गंगा की नई 
गाँव की पगडंडियों में 
राजपथ होंगे कई 

छाप नंगे पाँव की 
अब शहर में लगती बड़ी। (55)

भारतीय संस्कृति और परिवेश से सुमन जी का विशेष लगाव है— "दरवाजे का आम-आँवला/ घर का तुलसी-चौरा/ इसीलिए अम्मा ने अपना/ गाँव नहीं छोड़ा" (56)। पोता-पोतियों की चंचलता के लिए घुँघरुओं का श्रव्य-बिंब और खुशियों के लिए बताशों का आस्वाद्य बिम्ब भी इसी परिवेश से लिया गया है।  आधुनिकता की काली आंधियों में जीवन के मार्दव का खिरखिरा उठना तथा फूल की खुशबू की तरह मुरझा जाने में "बैल बिन बेकार हल-सी जिंदगी" (57) का चित्र व्यक्ति की विवशता को मूर्तित करता है। समय की विद्रूपता, वैमनस्यता और मक्कारी से भरे समय में आदमी भले ही बाहर सन्नाटे में जी रहा हो, पर भीतर-भीतर आग की तरह धड़क रहा है। 'अकाल में बच्चे' गीत में यह विडंबना और व्यापक हुई है— "सन्नाटे में सीटी बजती/ बस कुछ और नहीं/ इस अकाल में बच्चे रोते/ मुँह में कौर नहीं" (59)। लालच के बताशों ने हमें यहाँ तक पहुँचा दिया है जिससे समय के हाथों हम ढोल-तांसे की तरह बज रहे हैं।

'धीरे पाँव धरो' गीत में "आज पिता-गृह धन्य हुआ है/ मंत्र-सदृश उचरो!" (60)। यह गीत बेटियों को वधू जीवन की पावनता का बोध कराता है और ढाढ़स देता है, तो बूँद पसीने की गीत में श्याम वर्ण श्रमिक महिला के श्वेत बिंदुओं से झलमलाते सौंदर्य और जीवनचर्या की कठोर कर्मठता का चित्र आरेखित हुआ है— "गोबर-माटी सने हाथ में/ भाषा जीने की" (61)। आठवाँ गीत विसंगतियों के बीच "नहीं मरकर भी मरे ये पेड़" (62) की जीवंतता को समर्पित है, तो अंतिम गीत में कृषक जीवन की जड़ता और हवाओं के आंख खोलने के रूप में खुशियों के अंकुरण का वर्णन है। इस प्रकार शांति सुमन जी के गीत लोक की पृष्ठभूमि से अधिक जुड़े हैं और नवगीत चेतना के प्रकर्ष हैं।

(8)
राम सेंगर जी ने वर्तमान स्थितियों, जीवन यथार्थ और आंतरिक अनुभूतियों को विश्लेषित करने तथा सर्जनात्मक दृष्टि से अपनी संवेदनाओं को बिम्बों-प्रतीकों और अप्रस्तुत विधान द्वारा साकार करने की अद्भुत क्षमता है। उनका पहला नवगीत है— "जन से कटे, मगन नभचारी/ देख रहे हैं नब्ज हमारी" (65)।  यह राजनीतिक धृष्टता को रेखांकित करता इकहड़ आदमी की लाचारी का गीत है, जिसमें अनर्गल लोग भी "हमें हमारी जगह बतावें/ लोहा-लंगड़ के व्यापारी" (65) हमें रास्ता बताते हैं। दूसरे गीत में ऊंची नाक वाले लोगों के बीच जनजीवन की समस्याएं और उनसे संभलकर रहने तथा गुलामी न करने की समझाइश देते हुए सेंगर जी सर्वहारा वर्ग को खुद को ढाल बनाने के लिए उद्यत करते हैं और कहते हैं— 

बने अलग माटी के ये सब 
नामी और गिरामी 
गैरत बची रहे मत करना 
इनकी गोड़-गुलामी 

इनकी नीयत से टकराना 
लेश नहीं मिमियाना। (66)

और—

इनकी भाषा से टकराना
जोखिम भले उठाना। (66) 

सेंगर जी शहर में इज्जत से जीने की कीमत चुका रहे लोगों की जीवंतता के साथ-साथ 'चढ़ी बाँस पर नटनी' गीत में नारी की स्थिति, उसके साहस और रोटी की जुगाड़ में लहूलुहान लज्जा के तमाशा बनने की व्यथा-कथा को व्यक्त करते हैं। सेंगर जी की संवेदना ने एकाकी बुढ़ापे से जूझते जीवन की पीड़ा को महसूसा है— कहीं आषाढ़ की तबाही और दाने-दाने पर साहूकार का नाम होने का दर्द को जाना-समझा है, तो कहीं 'रंगभेद, पाखंड, धर्म के तोप तमंचे बम' के बीच भी वे जीवन के बचे रहने की उम्मीद से भरे हुए भी हैं।  सेंगरजी के गीत विसंगतियों में भी अस्तित्व की रक्षा के लिए चिंताओं के "बिंब को शक्ति बनाकर/ एकचित्त हो/ दुनिया से टकरा जायेंगे" (73) की प्रतिरोधी-शक्ति से संपन्न हैं।

(9)
नचिकेता जी नवगीत के बड़े हस्ताक्षर हैं। गीत संकलनों के अतिरिक्त उन्होंने आलोचना पर भी कार्य किया है और समवेत संकलन भी सम्पादित किए हैं। उनमें मानवीय संवेदना को उकेरने के साथ ही अस्तित्ववादी जीवन दृष्टि का समन्वय है। उनका मानना है कि यद्यपि बहुत कहा जा चुका है फिर भी बहुत कुछ कहने सुनने को शेष है। समाज में अनेक जाति-वर्गों को बहुत से कार्यों से आज भी दूर रखा गया है। इस कुरीति पर वे कहते हैं— "किंतु मनाही है/ मकड़ी को जाले बुनने की" (75)। दलितों की किस्मत पर भी उनका तर्क है— "सुर्ख चने ने/ किस्मत पाई पिसने-भुनने की" (75)। विकास की आधुनिकता में गांव भी नई सदी की इबादत लिखते-लिखते अपनी परंपराओं और संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। यहां तक कि "सगे भाई-बहन के रिश्ते/ पहने दिखे नकाब" (77)। आज तुलसी-चौरे, पनघट, चौपाल, अलाव आदि इतिहास की वस्तुएं बन गई हैं। आधुनिकता का प्रभाव इस कदर बढ़ा है कि "परिचित चेहरों पर/ मुस्कान अपरिचित-सी" (78) दिखाई पड़ती है।

अच्छे दिन का अर्थ सबके लिए अलग-अलग होता है। वनवासियों के अच्छे दिन का अर्थ "फूल गया महुआ/ अच्छे दिन आने वाले हैं/ वनवासी चेहरे थोड़ा/ मुस्काने वाले हैं" (79)। महुआ आया है तो व्याह, सगाई, नृत्य, उत्सव होगा। अन्न के दाने आएंगे, "पर, महुआ की/ खैर नहीं है ठेकेदारों से" (79) के माध्यम से सुखों पर वज्रपात और सियासत की विडंबना को भी नचिकेता जी उजागर करते हैं। वहीं 'यहाँ नहीं जल है' गीत में "मछली के हिस्से में आया/ यहाँ नहीं जल है" (80) और "सीपी, घोंघे,/ शंख, केकड़े भी तो घायल हैं" (80) के द्वारा समय की अराजकता का वर्णन है। 'बच्चे हैं' गीत में बच्चों की अनुमति और उनके स्वच्छंद विकास को महत्व दिया गया है। 'हँसी तुम्हारी' गीत में हँसी को उपमानों के माध्यम से कवि ने 'हँसी' को साकार ही नहीं किया, बल्कि इसे भावात्मक पवित्रता और तरलता से भी समंजित किया है। समय के साथ जीने की कवि की कामना, वन पखेरू-सा चहकना, फूलों की तरह महकना और नदी-सा अभिराम प्रवहमान होना चाहती है। इस प्रकार नचिकेता जी आज की विडंबनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए— "जो सोए हैं आज/ उन्हें कल जगना ही होगा" (84) की भावना के साथ कुच-कुच अंधियारे में दिया जलाने के महत्व को प्रतिपादित करते हैं।

(10)
वीरेन्द्र आस्तिक अपने गीत 'तुम नायक मेरी कविता के' के द्वारा लोक-जीवन और शहर के अंतर को निरूपित ही नहीं करते, लोक-जीवन की संपदा से प्रगति करते आधुनिक मनुष्य की कृतघ्नता को भी आरेखित करते हैं। पेड़ों से बतियाते हुए वे प्रकृति के प्रति व्यामोहित हैं, तो उनमें परिस्थितियों के बीच राह खोजने की जीवटता भी है। संकलन में बाजारवाद पर उनके दो गीत हैं। पहले में— 'हो गई बाजार/ दुनिया/ औ' अकेले हम", "प्यार हो या रंग हो/ सब हैं बिकाऊ" और "सब तो सोनेलाल हैं/ मानव नहीं हैं" (89)। मानवता का यह स्खलन दूसरे गीत में रिश्तों के भी बाजार बनने में लाभ-हानि की तुला को महत्व देते हैं। खुशियाँ मृगजल की तरह छलावा बन जाती हैं और चैटिंग की प्रमुखता में संस्कार बिखर जाते हैं। पंक्तियाँ हैं— 

बिटिया बता रही है
टूट गई है चैटिंग
संस्कारों की टकराहट में
कैसी मैचिंग

पापा के कम्प्यूटर पर
भीगा है काजल। (90)

और—  

नये अर्थ के युग में हैं
नव निर्मित रस्ते
सोच एक से, कर्म एक-से
बनते रिश्ते

पापा ने ई-मेल किया
मम्मी का आँचल। (90)

कुबेरों की इस दासता से थका कवि समय को बदलने का आह्वान करता है— "हाथ तेरे हों हथौड़े/ शक्ति हो भरपूर फिर/ मन-वचन से संगठित/ हो देश का मजदूर फिर/ वक्त यह जंजीर-सा है, तोड़ दो/ माल-गोदामों से निकालो मुझे" (92-93) और "वक्त का पर्याय गाँधी है अगर/ क्यों न गाँधी ही बना डालो मुझे" (93)। कवि को व्यक्ति की कर्मठता पर पूरा विश्वास है और इसी विश्वास पर ईश्वर भी पास चलाता है। यह आस्था व्यक्ति को बलवान बनाती है। 'कहता मन' गीत में यही विश्वास गिरकर उठने और उम्मीदों पर चलने की शक्ति देता है— "धीरज, दूर-दृष्टि, आशाएँ-/ मन के घोड़ों की क्षमताएँ/ अन्तर संकल्पों का दीया/ ज्योतित होती हैं इच्छाएँ (95)। इस प्रकार आस्तिक जी के गीतों में समय की सही पहचान भी है और विसंगतियों के विरुद्ध नाम की तरह ऊर्जा से संपन्न आस्तिक स्वर भी है—  

हम न समय से अब तक हारे 
हम न अभी हैं मरने वाले। (95)

(11)
बुद्धिनाथ मिश्र के गीत मंच को बांधने में भी समर्थ हैं और पाठकों के बीच भी पूरी शिद्दत से अपनी बात रखते हैं। वे नवगीत को गीत के विशाल परिवार की एक प्रशाखा मानते हैं। उनके गीतों में समय की विडंबना के साथ मनुष्य भी है। जिंदगी की स्थिरता को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं— "ज़िन्दगी यह, एक लड़की साँवली-सी/ पाँव में जिसने दिया है बाँध पत्थर/ दौड़ पाया मैं कहाँ उन की तरह ही/ राजधानी से जुड़ी पगडंडियों पर/ मैं समर्पित बीज-सा धरती गड़ा हूँ/ लोग संसद के कँगूरे चढ़ गए हैं" (97)। आज की राजनीति में तरह-तरह के लोगों का जमावड़ा है, पर जिन्हें जो मिलना चाहिए, उन्हें वह नहीं मिल पाता। 'देखी तेरी दिल्ली' गीत में यह विसंगति देखें— "हर दुकान पर कोका-कोला, पेप्सी की बौछार/ फिर भी कई दिनों का प्यासा मरा राम औतार" (98)। यह विसंगति "पशु-मेले की जगह/ हुआ ऋण मेलों का उत्सव" (99) में कर्ज में डूबते गाँव और सतरंगी चालों में हाथी, घोड़ों आदि को मात देती विकास-यात्रा पर व्यंग्य है। 'जंगलराज' गीत में "फूलों जैसा लोकतन्त्र था/ काँटों में बदला" (101)— इसमें आधुनिकता, बर्बरता, अवगुणों का विकास, पब संस्कृति आदि बुराइयों के प्रति आकर्षण तथा तुलसी, पीपल आदि की उदासी में अराजकता और सभ्य समाज की तटस्थता को कवि ने व्यक्त किया है। "कड़वी लगे शहद/ मीठी पत्तियाँ नीम की आज" (102) जैसी स्थिति हो गई है।

आज गांधी के बंदरों को राजनीति रास आने लगी है। परिणामतः सदाचार की बस्ती को "रौंद रहा सत्ता का अंधा भैंसा" (102)। जनता की स्थिति को "मेहतर पूरा देश" (103) के रूप में मिश्र जी वीभत्स बिम्ब द्वारा व्यक्ति की दुर्बलता और असमर्थता को पूरी जुगुप्सा के साथ प्रस्तुत करते हैं। मिश्र जी ने 'जाड़े में पहाड़' गीत में हंस जैसे स्वेत भींगे पंख वाले परेवा मेघों और लोकरंग में खिले फूलों के सौंदर्य को आरेखित किया है, वहीं ठंड, बर्फीली हवा आदि के रूप में आतंक का वर्णन है, जो अंदर तक झिंझोड़ जाता है। फिर मिश्र जी ने भी राह में आए अवरोधों के बावजूद— "नदी रुकती नहीं है" के द्वारा जिंदगी की सतत प्रवहमानता और जिजीविषा को अभिव्यक्ति दी है। इस प्रकार 'नवगीत वाङ्मय' में संकलित नवगीतों में मिश्र जी "दिया बनकर तमक से लड़ने" (104) की भावना को उकसाते हैं और 'प्रकृति', 'बसंत', 'जिजीविषा', 'जंगलराज' आदि गीतों में वे बढ़ रही अराजकता को मूर्तित करते हुए मनुष्य को मनुष्य जोड़ने का प्रयास करते हैं।

(12)
डॉ विनय भदौरिया डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया के सुपुत्र हैं। पेशे से भले ही वकील हैं, पर काव्य के संस्कार उन्हें घुट्टी में मिले हैं। नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर डॉ विनय जी वक्त की दुरभिसंधि से आहत हैं। समय की भूमिका के प्रति उनकी टीस है— 

भूमिकाएँ इस तरह से 
हैं निभाई जा रहीं 
जब जरूरत चक्र की 
वंशी थमाई जा रही 

किस तरह पारथ करे संधान 
कौरवों के पास गिरवी बान 
युग को क्या हुआ है। (108)

आज की बढ़ती महंगाई में मोबाइल आज की प्राथमिकता और बिना हैसियत के आसमान तक की ख्वाहिशों में ईमान की मिट्टी पलीद होना तो स्वाभाविक है। डॉ विनय जी इन स्थितियों से बेचैन हैं। उनकी पंक्तियाँ हैं— 

जीने की बदली स्टाइल 
मेहनत छोड़ हुये हम काहिल 
खाली पेट भले सो जायें 
पर न रहे भूखा मोबाइल 

बिन पैसे के नई आफतें 
हर-दिन रहे खरीद। (114)

कथनी और करनी में बढ़ता अंतर, दोहरी नीतियाँ— "आधे अँगना पानी बरसे/ आधे अँगना धूप" (115) की स्थितियाँ, विद्रूपताओं, वैमनस्यता और विघटन को जन्म देती हैं। 'जीवन है तो जीना भी है, पर तृष्णा का कोई अंत नहीं है— "जितना पियो प्यास हो दुगनी", पर "सोच-समझकर पीना होगा" (117), क्योंकि इसमें विष और अमृत दोनों हैं। अतः डॉ विनय जी सचेत करते हैं— 

इस नदिया में काल मकर है 
जो रहता हरदम मुँह खोले 
हम बे-फिकर न देखें उसको 
निकट आ रहा हौले-हौले 

ग्रास बनें हम, इसके पहले 
उसका ही मुख सीना होगा। (117)

'समता के बीज-मंत्र' गीत में कवि मानवीय संवेदनाओं को जगाते हुए "आयत औ' चौपाई साथ गुनगुनाएँ" (116) के रूप में देश को एकता के प्रेम-सूत्र में बाँधने का प्रयास करता है। 'मेरा बेटा' गीत में घर से दूर होते बच्चों की मनोदशा तथा ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप्प आदि के प्रभाव का अंकन है। 'पुरखों की देहरी से लगाव' में गाँव की राजनीति के कारण— "लाठी और कलम— दोनों में/ करना पड़ा चुनाव हमें" (110) में गाँव छोड़ने की मजबूरी का जिक्र है। 'जब से चली बयार' गीत में पछुआ के स्पर्श से उद्वेलित नवयौवना के मानसिक ऊहापोह को कवि ने प्रकृति के माध्यम से व्यक्त किया है, तो वहीं 'पनडिब्बे में' गीत में माँ के पनडिब्बे की स्मृतियों में जीवन के छोटे-छोटे रेशों और अपनेपन की संस्कृति का उन्मेष है। डॉ विनय जी के गीत लोक से अधिक जुड़े हैं।

(13)
रमाकांत जी नवगीत में सामाजिक सरोकारों की तो बात करते हैं, पर सबूत और अर्थों से परे बिम्बों तथा प्रतीकों के अनावश्यक प्रयोगों को उचित नहीं मानते। वे आज के खुले समय में साफ अभिव्यक्ति के पक्षधर हैं। पहले गीत में "जीत उसकी फिर/ हमारा हारना फिर" (119) की पड़ताल में जिंदगी की अनवरत रीतेपन के लिए वे— "दोष मेरा, दोष उनका/ दोष सबका/ हाँ, मगर दोषी/ बड़ा है एक तबका" (119) के रूप में जन-सामान्य को तो दोषी मानते ही हैं, पर उस बड़े शक्तिशाली तबके की ओर भी इशारा करते हैं जो कोल्हू के बैल को हाँक रहा है। इस विभीषिका में लगता है कुछ बचेगा ही नहीं। रंजिशें, अहंकार और लोकतंत्र की आड़ में फिर वही बातें और चालें चली जा रही हैं। भले ही राजशाही नहीं है, पर— "बस, जरा-सा 'क्लिक'/ कि दग जाये पलीता" (121)— कवि साइबर-युद्ध जैसी भयावह महाभारत जैसी विभीषिका से आगाह करता है। 'योग होता है विरल' गीत में शहर की अपेक्षा गांव का सुख और 'विषम-सी पगडंडियों की स्नेह की भाषा' अभिभूत करती है। ग्लैमर की दुनिया के रंगों और आज की विद्रूपता की ओर खिंच रहे युवाओं और उन पर पड़ रहे प्रभावों को 'सेलिब्रिटी' गीत में उजागर किया है, तो 'हे गरीब' के अंतर्गत प्यासों के घर में पानी की बात बड़ी मार्मिक और दयाद्रता को बिम्बित करती है। रमाकांत ने प्रेम को मदारी की भांति स्वार्थी और सौदेबाजी का खेल माना है। कवि ने माँ की ममता के प्रति नमन करते हुए— "सपने टूटे फिर भी सपनों का/ सत बाकी है" (126) गीत में "संघर्षों की अकथ-कथा में/ साथ नहीं कोई/ हारे तो हारे हम/ निर्मल दृष्टि नहीं खोई" (126) की आशावादिता सिर उठाती है। दिनों के बदलाव में आशा और आशा से ही प्रकृति के अनोखे रचाव में कल का विश्वास है, यथा—

बदलेंगे दिन 
ऐसी आशा बची हुई है 
आशा से ही 
प्रकृति अनूठी रची हुई है 

देखो, रुको 
समय का पतझड़ 
बीता जाये। (128)

इस प्रकार शिल्पीय गूढ़ता से दूर रमाकांत जी के गीत जीवन की सूक्ष्म-संवेदना के गीत हैं।

(14)
तृतीय पर्व 'आठ-बोध' में नवगीत के प्रमुख हस्ताक्षर दिनेश सिंह का "गीत की संघर्षशील जयी चेतना" शीर्षक से एक लेख संकलित है। यह आज के गीत की प्रासंगिक भूमिका है। नवगीत नई कविता के साथ-साथ युग की पीड़ा को खेलता हुआ अपने पथ पर आगे बढ़ा है, किंतु नई कविता ने इसे अपना प्रतिपक्ष ही मानकर सदा विरोध किया। इस विरोध के बावजूद नवगीत युगबोध के साथ बराबर आगे बढ़ता रहा, संघर्ष करता रहा। आज के गीत की प्रासंगिकता समय के समग्र यथार्थ से जुड़ी हुई है। नवगीत की छान्दसिक समकालीनता को केवल छंदों में बाँधने का शिल्प नहीं है, वह कविता की वह भावप्रवणता है जो रागात्मक लय से जीवन में आवेगमयी धड़कने पैदा करती है। दिनेश जी ने इस लेख में बहुत अधिक गहरे तक जाकर गीत की संघर्षशील चेतना को, उसकी जयी चेतना को समझने और समझाने का प्रयत्न किया है। जीवन की भाषा तथा गीतों की भाषा के बीच लयात्मक संबंध और अभिव्यक्ति के फलक पर कल्पनाशीलता, बिम्बों आदि की आवश्यकता पर भी विचार किया है।

(15)
अंतिम पर्व में "नवगीत : न्यूनतम शब्दों में अधिकतम अभिव्यक्ति" शीर्षक से डॉ अवनीश सिंह चौहान द्वारा डॉ मधुसूदन साहा से लिया गया साक्षात्कार दिया गया है। इसमें डॉ साहा जी की काव्ययात्रा, उन पर अन्य रचनाकारों का प्रभाव, कविता की विभिन्न विधाओं में उनके आधिकारिक लेखन तथा हिंदी और उड़िया में उनके गद्य लेखन आदि पर चर्चा उनके व्यक्तित्व की महत्ता को उद्घाटित करते हैं। इस साक्षात्कार में डॉ चौहान ने उनसे नवगीत के संदर्भ में उसके स्वरूप, प्रवर्तन, दशा और दिशा तथा नवगीत दशकों में उनकी अनुपस्थिति को लेकर प्रश्न किए हैं, जिससे नवगीत के इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। 

नवगीत विधा के महत्वपूर्ण साधक होने के नाते गीत की काव्य धाराओं पर उनके विचार और दीर्घकालीन साहित्यिक यात्रा में उनके खट्टे-मीठे अनुभव, पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीतों के प्रकाशन तथा प्रिंट मीडिया की बड़ी पत्रिकाओं द्वारा नवगीत से दूरी बनाए रखने के विषय में भी डॉ चौहान की चर्चा हुई है। नवगीत अपने समय और समाज का प्रतिनिधित्व ठीक से कर रहा है? के सवाल पर डॉ साहा जी का उत्तर कि आज की तारीख में नवगीत ही वह काव्यधारा है जिसने समसामयिक जीवन-मूल्यों के तमाम कथ्यों को संपूर्ण सामर्थ्य सहित अभिव्यक्ति प्रदान कर यह सिद्ध कर दिया है … कि उसे अपनी विकास यात्रा में आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता।

इस प्रकार 'नवगीत वाङ्मय' नवगीत का एक सम्यक संपादन है। इसके लिए हिंदी और अंग्रेजी भाषा के यशस्वी साहित्यकार डॉ अवनीश सिंह चौहान को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ एवं बधाई।

समीक्षक : 
डॉ वीरेन्द्र निर्झर का जन्म 15 अक्टूबर 1949 को महोबा, उत्तर प्रदेश में हुआ। बुरहानपुर (म.प्र.) के एक महाविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष रह चुके डॉ निर्झर की अब तक एक दर्जन से अधिक पुस्तकें— 'ओंठों पर लगे पहरे' (नवगीत संग्रह), 'विप्लव के पल' (काव्य संग्रह), 'ठमक रही चौपाल' (दोहा संग्रह), 'कजली समय' (पाठालोचन), 'वार्ता के वातायन' (आलेख), 'बुंदेली फाग काव्य : एक मूल्यांकन (सं), आल्हाखण्ड : शोध और समीक्षा (सं) प्रकाशित हो चुकी हैं। संपर्क : एम.बी./120, न्यू इंदिरा कालोनी, बुरहानपुर-450331 (म.प्र.)

Book Review of Navgeet Vangmaya. Reviewer - Dr Virendra Nirjhar

1 टिप्पणी:

  1. बहुत विवेचना पूर्ण एवं सटीक समीक्षा।
    समीक्षा के माध्यम से " नवगीत वांग्मय " संग्रह को पूर्णतः जानने और समझने का अवसर मिला।
    निश्चित रूप से डॉ अवनीश सिंह चौहान ने नवगीत को लेकर बहुत महत्व पूर्ण कार्य किया है। आदरणीय डॉ वीरेंद्र निर्झर को बहुत अच्छी समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई।

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