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बुधवार, 7 अगस्त 2013

शिवबहादुर सिंह भदौरिया को विनम्र श्रृद्धांजलि — अवनीश सिंह चौहान

 डॉ. शिवबहादुर सिंह भदौरिया
समय : 15 जुलाई 1927 - 07 अगस्त 2013

हिन्दी साहित्य के लिए बैसवारा की धरती बड़ी उर्वरा रही है। यहाँ पर अमर बहादुर सिंह 'अमरेश', आचार्य बेनी, काका बैसवारी, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, दिनेश सिंह, देवीशंकर अवस्थी, नंद दुलारे बाजपेयी, प्रताप नारायण मिश्र, भगवती चरण वर्मा, मधुकर खरे, मलिक मुहम्मद जायसी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुल्ला दाउद, रघुनंदन प्रसाद शर्मा, रामविलास शर्मा, लालचदास, शिवमंगल सिंह सुमन, शिव सिंह 'सरोज', सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला से लेकर ओम प्रकाश सिंह, इंद्रेश भदौरिया, जय चक्रवर्ती, रमाकांत, रामनारायण रमण, विनय भदौरिया आदि ने जन्म लेकर इस धरती को गौरवान्वित किया है। इसी पुण्य-प्रसूता धरती पर अपने मधुर कंठ एवं रसवंती गीतों के माध्यम से लाखों श्रोताओं, पाठकों, सहृदयों को आप्लावित कर देने वाले कीर्तिशेष नवगीतकार डॉ शिव बहादुर सिंह भदौरिया का जन्म 15 जुलाई 1927 को जनपद रायबरेली (उ.प्र.) के एक छोटे से गाँव धन्नीपुर (लालगंज) के एक किसान परिवार में हुआ था।

'साहित्य भूषण' (उ.प्र. हिंदी संस्थान, लखनऊ, 2000) से अलंकृत डॉ भदौरिया ने हिंदी में एम.ए कर "हिंदी उपन्यास : सृजन और प्रक्रिया" विषय पर कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर से पी-एच.डी की उपाधि प्राप्ति की। इन्होंने 1946 से 1956 तक पुलिस विभाग में कोषाध्यक्ष, 1957 से 1966 तक बैसवारा इण्टर कॉलेज, लालगंज में हिंदी प्रवक्ता, 1967 से 1972 तक बैसवारा डिग्री कॉलेज, लालगंज में हिंदी प्रवक्ता और विभागाध्यक्ष और 1973 से 1988 तक कमला नेहरू डिग्री कॉलेज, तेजगाँव, रायबरेली में प्राचार्य के रूप में सफलतापूर्वक कार्य किया। शिक्षा विभाग में आने से बहुत पहले, 1948 में, आपने कविताई करना प्रारम्भ कर दिया था। 'नवगीत दशक— एक' (सं.— शम्भुनाथ सिंह, 1982) तथा 'नवगीत अर्द्धशती' (सं.— शम्भुनाथ सिंह, 1986) एवं 'नये-पुराने' गीत अंक - 1 (सं.— दिनेश सिंह, नवंबर 1997) के विशिष्ट रचनाकार डॉ भदौरिया काव्य मंचों पर ही नहीं, देश के चर्चित एवं प्रतिष्ठित समवेत कविता संकलनों में अपनी गरिमामयी उपस्थिति के लिए जाने जाते रहे हैं।

आपके प्रथम गीत संग्रह ‘शिजिंनी (1953) की भूमिका में आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने भदौरिया जी को अमित सम्भावनाओं वाला गीतकार कहा है। डॉ भदौरिया में अगर सम्भावनाएँ न होतीं, तो ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित 'पुरवा जो डोल गयी’ आदि गीत गीत विधा को परिवर्तनकारी दिशा देने में सफल न हुए होते। इस बात की पुष्टि बहुत बाद में कीर्तिशेष कवि एवं सम्पादक दिनेश सिंह ने भी की है। एक जगह दिनेश सिंह कहते हैं— "डॉ शिव बहादुर सिंह भदौरिया उन गीतकारों में से हैं जो पारंपरिक गीतों से लेकर नवगीत तक की यात्रा में निरपेक्ष भाव से गीत के साथ रहे हैं।" गीत-नवगीत ही नहीं, साहित्य की अन्य विधाओं के साथ भी वह निरपेक्ष ही दिखाई देते हैं। एक बार अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने कवि-पुत्र डॉ विनय भदौरिया से कहा ही था— "मेरी सृजनधर्मिता का प्रारंभ यूँ तो गीत विधा से ही हुआ, किन्तु मैं अन्य काव्य-रूपों के प्रति भी कभी उदासीन नहीं रहा। यह उल्लेखनीय है कि ग़ज़ल और मुक्तछंद में मेरी रचनाएँ ज्ञानोदय, नवनीत, आरती, प्रतिमा, धर्मयुग और दैनिक जागरण आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं।"

महामहिम राज्यपाल (उ.प्र.) द्वारा जिला परिषद, रायबरेली के नामित सदस्य रह चुके डॉ भदौरिया मानवीय मन एवं व्यवहार के विभिन्न आलम्बनों और आयामों को बड़ी बारीकी, निष्पक्षता और दार्शनिकता के साथ अपने गीतों में प्रस्तुत करते हैं, जोकि उनके जीवन के गहन चिन्तन, संवेदनात्मक अनुभव एवं सामाजिक-सांस्कृतिक संचेतना को मुखरित करती है। मंच पर उनकी वाणी में उत्साह एवं उमंग, उनके मन की गतिमान विविध तरंगों और रचनाओं के वातानुकूलित प्रसंगों को देख बरबस ही श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाते थे और जब उनकी इस जीवन्त मेधा को पाठक लिपिबद्ध पाते हैं, तो वे ‘वाह‘-‘वाह‘ की अंतर्ध्वनि से रोमान्चित हो जाते हैं। उनकी विषयवस्तु का दायरा बड़ा ही व्यापक है— चाहे गाँव की माटी हो, खेतों की हरियाली, शहरों की कंकरीट या जीवन के अन्य संदर्भ— सब कुछ बड़ी ही सहजता से उनकी रचनाओं में गीतायित हो जाता है। शायद इसीलिये भदौरिया जी कहते भी हैं— "मैंने अच्छी तरह समझ लिया कि गीत-काव्य मेरी भावुकता की अभिव्यक्ति का पर्याय नहीं है। यह यथार्थ के प्रति एक प्रौढ़ प्रतिक्रिया की मार्मिक अभिव्यक्ति बन रहा है और इसी नये गीत के साथ अन्त:प्रेरित होकर मैं भी जुड़ गया। गीत की प्रचलित धारणाओं से मुक्ति ही नये गीत को नये आयाम उद्घाटित करने का आधार बन सकती है। जीवन का समग्र साक्षात्कार ही नये गीत को व्यापक काव्य भूमि पर प्रतिष्ठित कर सकता है।" 

'शिन्जनी' (गीत-संग्रह, 1953), 'पुरवा जो डोल गई' (गीत-कविता संग्रह, 1973), 'नदी का बहना मुझमें हो' (नवगीत संग्रह, 2000), 'लो इतना जो गाया' (नवगीत संग्रह, 2003), 'माध्यम और भी' (ग़ज़ल, मुक्त छंद, हाइकु, मुक्तक संग्रह, 2004), 'गहरे पानी पैठ' (दोहा संग्रह, 2006) आदि आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। 2013 में डॉ ओमप्रकाश अवस्थी के संपादकत्व में उत्तरायण प्रकाशन ने इस मूर्धन्य साहित्यकार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केन्द्रित 'राघव रंग' शीर्षक से एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित की और उसके कुछ समय बाद ही डॉ भदौरिया परिनिर्वाण (7 अगस्त 2013) को प्राप्त हुए। नवगीत के इस विशिष्ट शब्द-शिल्पी को पूर्वाभास की ओर से विनम्र श्रृद्धांजलि

1. नदी का बहना मुझमें हो
Art by Vishal Bhuvania

मेरी कोशिश है कि 
नदी का बहना मुझमें हो 

तट से सटे कछार घने हों 
जगह -जगह पर घाट बनें हों 
टीलों पर मंदिर हों जिनमें 
स्वर के विविध वितान तनें हों 

भीड़ 
मूर्छनाओं का 
उठाना -गिरना मुझमें हो 

जो भी प्यास पकड़ ले कगरी 
भर ले जाये खाली गगरी 
छूकर तीर उदास न लौटें 
हिरन कि गाय कि बाघ कि बकरी 

मच्छ -मगर 
घड़ियाल 
सभी का रहना मुझमें हो 

मैं न रुकूँ संग्रह के घर में
धार रहे मेरे तेवर में 
मेरा बदन काट कर नहरें 
ले जाएँ पानी ऊसर में 

जहाँ कहीं हो 
बंजरपन का 
मरना मुझमें हो। 

2. इंद्रधनुष यादों ने ताने

इंद्रधनुष 
यादों ने ताने
क्या क्या होगा आज न जाने

सिरहाने चुपचाप आ गया
झोंका मिली जुली गंधों का
अनुगूँजों ने चित्र उकेरा
सटे पीठ से अनुबंधन का

खिड़की से 
गुलाब टकराया
किसने छेड़ा साज न जाने

आकारों से रेखाओं को 
कितना दूर किये देती है
संबंधों के शीश महल को
चकनाचूर किये देती है

अर्थ देह का 
बदले देती
किसकी है आवाज न जाने।

3. पुरवा जो डोल गई

पुरवा जो डोल गई
घटा घटा आँगन में 
जूड़े-सा खोल गई

बूँदों का लहरा दीवारों को चूम गया
मेरा मन सावन की गलियों में झूम गया
श्याम रंग परियों से अंतर है घिरा हुआ
घर को फिर लौट चला बरसों का फिरा हुआ

मइया के मंदिर में
अम्मा की मानी हुई
डुग डुग डुग डुग डुग 
बधइया फिर बोल गई

बरगा की जड़ें पकड़ चरवाहे झूल रहे
बिरहा की तालों में विरहा सब भूल रहे
अगली सहालग तक ब्याहों का बात टली
बात बहुत छोटी पर बहुतों को बहुत खली

नीम तले चौरा पर
मीर की बार बार
गुड़िया के ब्याह वाली 
चर्चा रस घोल गई

खनक चुड़ियों की सुनी मेंहदी के पातों ने
कलियों पर रंग फेरा मालिन की बातों ने
धानों के खेतों में गीतों का पहरा है
चिड़ियों की आँखों में ममता का सेहरा है

नदिया से उमक उमक
मझली वह छमक छमक
पानी की चूनर को 
दुनिया से मोल गई

झूले के झूमक हैं शाखों के कामों में
शबनम की फिसलन केले की रानों में
ज्वार और अरहर की हरी हरी सारी है
सनई के फूलों की गोटा किनारी है

गाँवों की रौनक है
मेहनत की बाँहों में
धोबन भी पाटे पर 
हइया हू बोल गई। 


डॉ भदौरिया के प्रति:

वरिष्ठ गीतकार डॉ. शिवबहादुर सिंह भदौरिया आधुनिक गीत और नवगीत विधा के ऐसे समर्थ हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने गीत को अपनी विशिष्ट भाषा एवं शैली के द्वारा नव्यता प्रदान की। उनके गीत उनके विश्वास को दृढ़ता से हमारे समक्ष प्रस्तुत करते हैं। ‘नदी का बहना मुझमें हो’ शीर्षक उनका गीत संग्रह समकालीन गीत के नए प्रतिमान स्थापित करता है। वे श्रेष्ठतम मानव थे और उनकी सरलता, सहजता, उदारता और निश्छल हंसी अनायास सबको प्रभावित करने वाली थी। ऐसे समर्थवान गीतकार, समीक्षक, सम्पादक डॉ. भदौरिया का हमारे बीच से जाना साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति है। अपने सशक्त कृतित्व के माध्यम से वे अनन्तकाल साहित्यानुरागियों के बीच उपस्थित रहेंगे। - उदय प्रताप सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान

Dr Shivbahadur Singh Bhadauriya

6 टिप्‍पणियां:

  1. भदौरिया जी अपनी संवेदनापूर्ण रचनाधर्मिता के चलते साहित्य में अमर रहेंगे । उनके नवगीतों में जो लोकचेतना है वह उन्हें हमेशा प्रासंगिक और जीवन्त बनाये रखेगी ।ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे!

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  2. विनम्र श्रद्वांजलि के साथ इस आलेख को दिनांक 09.08.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक किया गया है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  3. हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए आपकी यह प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है।
    http://nirjhar.times.blogspot.in पर आपका स्वागत् है,कृपया अवलोकन करें।
    सादर

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