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बुधवार, 19 मई 2021

गुलाब सिंह और उनके दस नवगीत — अवनीश सिंह चौहान


उत्तर भारत में कुम्भ नगरी के रूप में विख्यात एवं पौराणिक महत्व की तीन पावन नदियों— गंगा, यमुना एवं सरस्वती का संगम स्थल कहे जाने वाले प्रयाग ने अब तक जहाँ देश को अभूतपूर्व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, प्रधानमंत्री, वैज्ञानिक, अभिनेता, प्रशासक, खिलाड़ी, शिक्षाविद, समाज सुधारक आदि दिए, वहीं कई अविस्मरणीय साहित्यकार भी दिए हैं। साहित्य, संस्कृति और समाज परिवर्तन की प्रक्रिया में अपना अभीष्ट अवदान देने वाले इन विशिष्ट साहित्यकारों में से एक हैं— गुलाब सिंह। गुलाब सिंह का जन्म 5 जनवरी 1940 को जनपद इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयाग, उ.प्र.) के ग्राम बिगहनी में हुआ। उन्होंने यू.पी. बोर्ड से इंटरमीडिएट (1957), इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. (1960), आगरा विश्वविद्यालय से एम.ए. (इतिहास, 1965 एवं अर्थशास्त्र, 1970) की उपाधियाँ प्राप्त कीं। के.पी. ट्रेनिंग कॉलेज, इलाहाबाद से 1962 में एल.टी. करने के बाद वे इलाहाबाद कॉलेज, इलाहाबाद में अध्यापक नियुक्त किए गए। तदन्तर अगस्त 1966 में राजकीय सेवा में एल.टी. ग्रेड शिक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति हुई, फिर प्रवक्ता (इतिहास, 1981) बने। इस प्रकार अपनी  मेहनत, लगन और दूरदर्शिता से प्रगति करते हुए उन्होंने 1995 में राजकीय इंटर कॉलेज, सिरसिया, सोनभद्र में प्रधानाचार्य के रूप में कार्यभार ग्रहण किया, जहाँ से वे 1998 में ससम्मान सेवानिवृत्त हुए। 

नवगीत से गहराई से जुड़े होने के बावजूद उनकी पहली कृति— "पानी के घेरे" (उपन्यास) 1975 में प्रकाशित हुई, जिसका विमोचन मूर्धन्य कलमकार नरेश मेहता के कर-कमलों से हुआ। तदुपरांत उनके पाँच नवगीत संग्रह— "धूल भरे पाँव" (1992 & 2017), "बाँस-वन और बाँसुरी" (2004), "जड़ों से जुड़े हुए'' (2010), "कभी मिटती नहीं संभावना" (2014) एवं — "दे रहा आवाज फिर भी" (2019) प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त उनके नवगीत कई महत्वपूर्ण समवेत संकलनों, यथा— 'नवगीत दशक- दो' (1983), 'नवगीत अर्द्धशती' (1986), 'गीतायन' (पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर की परास्नातक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में निर्धारित संकलन, 1990), ‘हिंदी के मनमोहक गीत’ (सं.— डॉ इशाक अश्क, 1997), 'नये-पुराने' : ‘गीत अंक – 3’ (सं.— दिनेश सिंह, सितंबर 1998), 'श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन' (सं.— कन्हैयालाल नंदन, 2000), 'टेसू के फूल' (सं.— डॉ इशाक अश्क एवं चन्द्रसेन विराट, 2003), 'नवगीत निकष' (सं.— उमाशंकर तिवारी, 2004), 'शब्दपदी: अनुभूति एवं अभिव्यक्ति' (सं.— निर्मल शुक्ल, 2006), "नवगीत के नये प्रतिमान" (सं.— राधेश्याम बंधु, 2012), 'गीत वसुधा' (सं.— नचिकेता, 2013), 'नयी सदी के नवगीत - खण्ड एक’ (सं.— डॉ ओमप्रकाश सिंह, 2015),  'सहयात्री समय के' (सं.— डॉ रणजीत पटेल, 2016), 'समकालीन गीतकोश' (सं.— नचिकेता, 2017) आदि में संकलित हो चुके हैं। उनकी रचनाएँ 'दैनिक जागरण', 'आज', 'हिंदुस्तान', 'राष्ट्रीय सहारा', 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'नये-पुराने', 'संकल्प रथ', 'साहित्य भारती' जैसे पत्र-पत्रिकाओं के साथ साहित्यिक काव्य-मंचों पर खूब पसंद की गयी हैं। उन्हें अब तक उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ से 'साहित्य भूषण' (2004) सहित आधा दर्जन सम्मानों/ पुरस्कारों से अलंकृत किया जा चुका है। — अवनीश सिंह चौहान 

1. अपनी मौलिकता 

हम सीढ़ी के पास खड़े हैं 
ऊपर जाना सख्त मना है 
कहते लोग— देश अपना है 

पाउच में पानी बिकता है 
बाढ़ में पाँव कहाँ टिकता है 
सब कुछ देख मौन रह जाना
ही तो अपनी मौलिकता है 

खतरे के निशान का खम्मा 
देख-देख सोना-जगना है 

सागर को क्या पड़ी कि— 
आई हुई नदी को वापस भेजे
समय धार भी पीछे मुड़कर 
क्यों मुर्दों की प्यास सहेजे 

लहर-ज्वार से डरे हुओं का 
बेड़ा पार नहीं लगना है 

कालीनों के फूल देखकर 
धूसर पाँव लौट जाते हैं 
बैठक से निकले विचार पर 
छिड़ी बहस तो हकलाते हैं 

पिंजरे के भीतर की भाषा से 
आकाश नहीं नपना है।

2. हमें कितने दिन हुए देखे!

फूल पर बैठा हुआ भँवरा
शाख पर गाती हुई चिड़िया
घास पर बैठी हुई तितली
और तितली देखती गुड़िया
हमें कितने दिन हुए देखे!

घाट पर नीचे झुके दो पेड़
धार पर ठहरी हुईं दो आँख
सतह से उठता हुआ बादल
और रह-रह फड़फड़ाती दो पाँख
हमें कितने दिन हुए देखे!

बाँह-सी फ़ैली हुईं राहें
गोद-सा वह धूल का संसार
धूल पर उभरे हुए दो पाँव
और उन पर बिछा हरसिंगार
हमें कितने दिन हुए देखे!

घुप अँधरे में दिये की लौ
दिये जल पर भी जलाते लोग
रोशनी के साथ बहती नदी
और उससे नाव का संयोग
हमें कितने दिन हुए देखे!

3. दिन 
 
फूलों भरी हरी धरती से 
झुक कर कुछ कहते हैं दिन 

कच्चा रेशम धूप हो गई 
नदी दूध की धोयी 
रात चाँदनी झोपड़ियों के 
गले लिपट कर रोयी 

पगडण्डी के सूनेपन को 
सुबह-शाम सहते हैं दिन 

सरसों के पीले पृष्ठों पर 
हवा 'गीत-गोविन्द' लिखे 
रहकर मौन दर्द दुहराते 
शीश झुकाए गाँव दिखे 

बजते हैं बाँसुरी से 
आँसू से बहते हैं दिन 

सूखे अधर प्यास पथराई 
नैन उरेहें सपने 
पानी-पत्थर-बीच प्यार के 
अँखुए लगे पनपने 

'शाकुन्तल', 'सतसई' खोलकर 
मोरपंख रखते हैं दिन।

4. गाँव कह रहे

गांव कह रहे, 
दिल्ली दादी
हमें बचा लो
तो अच्छा

हम हैं गेहूं धान
बाजरा ज्वार उरद
अलसी सरसों तिल हैं लेकिन
तुम्हें ताड़ का कद

देते आए बरसों
वादों के दे रहे निवाले
हम भूखे के भूखे हैं
हुआ जो हुआ, अब तो
असली ग्रास खिला दो 
तो अच्छा

उथले ताल बन गई मेड़ें
पोखर पटी, कुएं सब अंधे
तिकठी घोड़ा गाड़ी पर रख
दूर हो गए चारों कंधे

घड़ियालों के महारुदन से
सदियों तक सीलन में सोये
हुआ जो हुआ अब तो
पक्के घाट लगा दो 
तो अच्छा

गाँव-गाँव गंवई-गंवई
उत्थान किसान, कलित क्रंदन
काली सड़कों पर झक मारें
स्वर्गादपि गरीयसी नन्दन

बगिया खिली वसंत बिराजे
गूंजे भ्रम के गाजे बाजे
हुआ जो हुआ, शब्द नहीं
अब हाथ बढ़ा दो 
तो अच्छा

5. पैसे के पाँव 

पैसे के पाँव 
बड़े ठोस बड़े भारी
पैसे की दौड़
रेस कोर्स घुड़सवारी

थर-थर कांपे ईमान
मुंह ढ़ककर सच रोये
बचे रहने की जगहें
न्याय नैतिकता टोये

सारे सम्बंध जैसे
कच्चे जर्जर धागे
सब से दिलकश लगती
पैसे की यारी

सूर्योदय सी दमके शक्ल
इसे जोड़कर
झूठ छल फरेब
इसके जूते की नोक पर

एक पांव देश
दूसरा विदेश में जमा
यहां वहां घर
पैसा ऐसा घरबारी

सारे कानून नियम
कदमों के नीचे
चीख या कराह
सब से आँखें मीचे

जिसको भी चाहे
उसे बेच दें, खरीद ले
पैसा हो गया
सार्वमौमिक व्यापारी।

6. परस्परता

तुम मुझे कहो महान
मैं तुम्हें कहूं महान
चश्मा दो अंगुल का
अन्तहीन आसमान

शब्दों को पिघलाकर
गढ़े गए जो गहने
उन्हें छोड़
घूम रही भाषा
विरुदावलि पहने

कैसा भी पानी हो
काठ नहीं डूबेगा
लहरों को पता नहीं
अतल का विधान

दौर है हवाओं के
पत्तों में पांव उगे
उड़-उड़कर जुड़ते हैं
गड्ढों के ठांव रुके

पतझर के रेले में
रचनाओं के पल्लव
उत्सुक हैं करने का
मौसम का परिज्ञान

मठों के कंगूरों पर 
गुटुर गूं करें विहंग
वरदानी मुद्रा में
बाहर निकले घडंग 

सम्मिलित स्वर में गूंजा
दरवाजे अहोराग
ओ महान सिरीमान
मुट्ठी में आसमान।

7. हतप्रभ हैं शब्द 

शायद किसी मोड़ पर
ठहर जाए
थककर हाँफती
जिन्दगी लौट आए

पीपल के पत्तों तक का
हिलना बन्द है
इस कदर
मौसम निष्पंद है

हवाओं के झोंके
सिर्फ उठें श्मशानों से
भटक रही राख
खुली आँखों में पड़ जाए

मंचों पर नाच रही
कठपुतली
मिट्‌टी खाए मुँह में
डाले टेढ़ी अँगुली

छिः छिः आ आ
माँ बार बार दुहराए
बच्चा बस रो रोकर
मौन मुस्कराए

हतप्रभ हैं शब्द
दया करुणा संवेदना
सब कहते अपने को
दुनिया की आँखों से देखना

कौन सी दुनिया
यही जो मूल्यों के शस्य डाल-
खड़ी है दोनो हाथ
उन पर आए।

8. गीतों का होना

गीत न होंगे
क्या गाओगे?

हँस-हँस रोते
रो-रो गाते
आँसू-हँसी
राग-ध्वनि-रंजित
हर पल को
संगीत बनाते

लय-विहीन
हो गए अगर
तो कैसे फिर
सम पर आओगे

तन में कण्ठ
कण्ठ में स्वर है
स्वर शब्दों की
तरल धार ले
देह नदी
हर साँस लहर है

धारा को अनुकूल
किए बिन
दिशाहीन बहते जाओगे

स्वर अनुभावन
भाव विभावन
ऋतु वैभव
विन्यास पाठ विधि
रचनाओं के
फागुन-सावन

मुक्त-प्रबंध
काव्य कौद्गाल से
धवल नवल
रचते जाओगे।

9. पेड़ और छाया

पेड़ मेरा था मगर
छाया तुम्हारे द्वार पर थी
क्या हुआ भाई मेरे कि
बीच में दीवार कर दी

चाहिए थी धूप दो पल
दो पलों छाया
पेड़ सूरज वही अपने
बीच में से कौन आया

मिटाकर सम्वाद सारे
मौन को लम्बी उमर दी

तनी हरदम रही अपने
अहं की पूरी प्रत्यंचा
ठूँठ ही रिश्ते रहे
खिलने न पाया कोई गुंचा

जय पराजय कुछ न दीखी
दिखा बस केवल समर ही

तीन घर के गाँव में
जलते रहे हैं तीस चूल्हे
जल गयी बारात सारी
अश्व से उतरे न दूल्हे

खोदते रह गए नीवें
उठ न पाया एक घर भी। 

10. शहरों से गाँव गए

शहरों से गाँव गए
गाँव से शहर आए
काग़ज़ के गुलदस्ते
चिड़ियों के पर लाए

ख़ुशबू तो है नहीं
उड़ान भी नहीं
रंगों की धरती
आकाश है कहीं

छाँह में चमकते हैं
धूप लगे कुम्हलाए

बढ़ करके दूर गए
गए बहुत ऊँचे
रिश्तों की धार
बून्द-बून्द तक उलीचे

जीने की प्यास बेंच
मरने के डर लाए

एक लहर उठी
और एक नाव डूबी
आँख बचा गैरत
ऊँची छत से कूदी

मेले में जुड़े जो
अकेले वापस आए। 

Ten Hindi Poems of Gulab Singh

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