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| डॉ ओमप्रकाश सिंह |
ओमप्रकाश सिंह से अवनीश सिंह चौहान की बातचीत
ओमप्रकाश सिंह— आपका जन्म उत्तरागौरी (रायबरेली) में उस वर्ष हुआ था जिस वर्ष स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान (26 जनवरी 1950) लागू किया था। इस परिप्रेक्ष्य में आप अपने जन्म के बारे में क्या कहना चाहेंगे?
अवनीश सिंह चौहान— यह तो मेरा सौभाग्य था कि मैंने धरती पर उस वर्ष अपनी आँखें खोलीं जिस वर्ष इस महान भारत देश में स्वतंत्रता के पश्चात संविधान लागू हुआ था। इस बात का मुझे गर्व है। परम श्रद्धेया स्वर्गीय माता श्रीमती शांति सिंह और श्रद्धेय स्व. पिता श्री महेंद्र बहादुर सिंह के आंगन में मुझे भक्ति और सेवा का स्नेहिल पाठ पढ़ाया गया और बाबा स्व. श्री त्रिभुवन बहादुर सिंह के द्वार पर शास्त्रों का अध्ययन और सामाजिक आचार संहिता से परिचित होने का अवसर मिला। मेरे बाल मन में ही परिवार, समाज और राष्ट्रीयता के बीज अंकुरित होने लगे। 15 अगस्त और 26 जनवरी के राष्ट्रीय उत्सव की मुझे गूंज ही नहीं मिली, बल्कि 5 वर्ष की आयु से पूर्व भी मुझमें देश के गौरव गान और नारों को स्वर देने की ऊर्जा भी विकसित होने लगी थी। सावन के झूले पर झूलते हुए आंचलिक लोकगीतों की मधुरिमा होंठों पर उतरने लगी थी और भीतर ही भीतर बढ़ते वय के साथ राष्ट्रीय गीतों के शब्द-सुर संचरित होने लगे थे। खासकर उन दिनों लोकगीतों का ढोल-मजीरे की लय-धुन के साथ दादी माँ का अलाप मुझे संजीवनी प्रदान करता था।
ओमप्रकाश सिंह— आपकी शिक्षा-दीक्षा किस प्रकार से और कहाँ हुई? शिक्षा प्राप्ति के बाद शिक्षण एवं शोध को अपनी आजीविका के रूप में चुनने के पीछे क्या कोई विशेष कारण रहा?
अवनीश सिंह चौहान— मेरे बालपन में मेरे गाँव के मकान के निकट शिवाले पर वाद्य यंत्रों के साथ सामूहिक भजन-कीर्तन हुआ करता था। इस संगीत-मण्डल में गाँव के सभी बिरादरी के लोग सम्मिलित होते थे। वर्षा-ऋतु के दस्तक देते ही परिवार के बड़े-बुजुर्ग आल्हा पाठ कराते थे, जिसमें बैसवारे के अल्हयित आल्हा सुनाने आते थे। आये दिन भिखमंगों की टोलियाँ ढोल-मँजीरे के साथ घाघरे वाली को लेकर लोकधुनों की टंकार लगाती थीं। कभी-कभी दाढ़ी वाले बाबा जी एकतारा लेकर बजाते और राजा हरिश्चंद्र या भगीरथ राजा की लयबद्ध लोकगाथाएँ सुनाकर हम सभी बच्चों का मन मोह लेते थे। परंतु जब वे हमारे वंशवृक्ष के नायकों का गुणगान कर अलाप देते थे, तब वह एकतारा हम लोगों की आंखों का तारा बन जाता था। इन्हीं काव्यमय लोकधुनों की मन में भरी अनुगूँज ने बालपन में कविता के सृजन का बीजारोपण किया है और इससे भी अधिक ऊर्जस्वित प्रेरणा हमें प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में आयोजित होने वाले कार्यक्रम 'अंत्याक्षरी' से प्राप्त हुई। इस पारिवारिक एवं विद्यालयी संस्कारों ने हमें शिक्षित एवं दीक्षित किया है। उस समय अध्ययन, अनुशासन और सेवाभाव ही बच्चों के लिए मूलमंत्र थे।
मेरी प्राथमिक शिक्षा प्राइमरी पाठशाला, उत्तरागौरी में, माध्यमिक शिक्षा गाँव के निकट चचिहा में और हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट की शिक्षा बैसवारा इंटर कॉलेज, लालगंज कस्बे में संपूर्ण हुई। तत्पश्चात मैंने डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से बी.ए. और एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की, जो कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर से संबंधित था।
सच तो यह है कि मेरे मन में हाई स्कूल से ही यह बात बैठ गई थी कि मुझे शिक्षक बनना है। यह संस्कार मुझे गुरुजनों के शैक्षणिक भाषणों से और समाज में उन्हें सम्मान मिलते देखकर होने वाले आकर्षण के कारण मिला। इसीलिए मैंने बैसवारा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लालगंज, रायबरेली के हिंदी विभाग में स्थाई प्राध्यापक होने के पश्चात पीएचडी तथा डीलिट की उपाधियाँ कानपुर विश्वविद्यालय, कानपुर से प्राप्त कीं, जो मेरी आजीविका से ही नहीं जुड़ा, बल्कि मुझे लेखन की ओर इस उपलब्धि से एक महनीय प्रेरणा मिली; हालाँकि मैं इंटरमीडिएट से ही लेखन के प्रति समर्पित हो चुका था। हाँ, लेखन के विकास-क्रम में जितने ही प्रतिरोध खड़े किए गए, लेखनी उतनी ही समृद्ध और सशक्त होती गई। मेरा सन 1973 से 2013 तक का शैक्षणिक जीवन शांत और निष्कंटक रूप से संपूर्ण हुआ; इसका मुझे संतोष है। जीवन अपनी चाहतों और प्रवृत्तियों के अनुकूलन से भर जाता है, तो उसकी लयात्मक अनुभूति होने लगती है।
ओमप्रकाश सिंह— कई बार प्रबुद्ध रचनाकारों को पढ़ते-पढ़ते लगता है कि कुछ स्वयं भी लिखा जाना चाहिए? यानी कि आपके जीवन की वे कौन-सी परिस्थितियाँ थी जिनसे आपके भीतर एक रचनाकार ने जन्म ले लिया?
अवनीश सिंह चौहान— हर पीढ़ी अपनी पूर्व पीढ़ी की पीठिका पर खड़े होकर उससे कुछ सीखती है और फिर उस सीखी हुई कला में आमद कर अर्थात नवता लाकर अपनी रचनाशीलता द्विगुणित करती है। मुझे भी प्रसाद, निराला, दिनकर, अज्ञेय और मुक्तिबोध आधुनिक कविता के धरातल पर अधिक प्रभावित करते रहे हैं। यदि काव्य-कृतियों की बात करें तो 'कामायनी', 'राम की शक्तिपूजा', 'कुरुक्षेत्र', 'कितनी नावों में कितनी बार', 'ठंडा लोहा', 'रश्मिरथी' इत्यादि। किंतु मेरे लेखन के उत्थान काल में मुझे जयशंकर प्रसाद की कृति- 'आँसू' की करुणा ने मेरे मन को छू लिया था। आगे चलकर नागार्जुन, त्रिलोचन, शमशेर और गीतकारों में नीरज के गीतों को सुनता और गुनगुनाता था। प्रेम, पीड़ा और दर्शन के गीत मुझे बहुत पसंद थे। बाद में मैं स्कूल से बाहर निकला और मानव जीवन के अभाव, शोषण और सामाजिक सरोकार की व्यवस्थाओं की ओर मेरा रुझान बढ़ा। इन्हीं सामाजिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक परिस्थितियों ने मेरे लेखन को संघर्षशील और प्रतिरोधक बनाया। इतनी महत्वाकांक्षाएँ भी नहीं थीं कि जो अपूर्ण होने पर मेरे मन को ग्लानि से भर दें, क्योंकि मैं जानता था कि महत्वाकांक्षा का मोती निष्ठुरता की सीपी में रहता है।
ओमप्रकाश सिंह— आपकी पहली रचना और पहली कृति कब और कहाँ प्रकाशित हुई? उस समय साहित्य प्रकाशन की क्या सीमाएँ थीं और उन सीमाओं को आप आज किस प्रकार से देखते हैं?
अवनीश सिंह चौहान— जहाँ तक मुझे स्मरण है कि मेरी पहली रचना पंजीकृत पत्रिका— 'नवनीत' (हिंदी डाइजेस्ट) में सन 1973 में प्रकाशित हुई थी; वैसे तो रायबरेली, उन्नाव और कानपुर के साप्ताहिक पत्रों में एकाध छुटपुट गीत प्रकाशित हो चुके थे। मैंने पारंपरिक लेखन से ही गीत लिखना सीखा, किंतु कुछ नवगीतकारों— नईम, इंद्रजी, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, मधुकर खरे से विशेष प्रेरणा प्राप्त की। मेरी प्रथम नवगीत कृति— 'सर्जना के पंख' 1993 में आराधना ब्रदर्स, कानपुर से प्रकाशित हुई। चूँकि मेरा लेखन सर्वाधिक नवगीत से ही प्रारंभ हुआ, नवगीत के कथ्य और शिल्प दोनों की नवता मुझे नया लिखने के लिए प्रेरित करती रही। इसकी बिंबधर्मिता और मानवीकरण का आकर्षण एक नई दिशाबोध की अनुभूति देने लगा था। जब तुकबंदी, जोड़-तोड़ करने की प्रवृत्ति से मुक्त हुआ तब मुझे मौलिक लेखन की पृष्ठभूमि पर उतरने का शुभ अवसर मिला।
ओमप्रकाश सिंह— आप विविध विधाओं में कार्य करने वाले बहुआयामी रचनाकार हैं। गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहा, कहानी, नाटक, समीक्षा एवं शोध में आपने किन पुस्तकों का प्रणयन किया है? अपनी कृतियों के प्रकाशन वर्ष का उल्लेख करते हुए अपनी सर्वाधिक प्रिय विधा (यदि हो तो) के बारे में संक्षेप में बताएँ।
अवनीश सिंह चौहान— कभी-कभी मुझे उच्चस्तरीय शिक्षण कार्य करते हुए चिंतन की अवस्था में यह आभास और विश्वास होने लगा था कि अपनी लेखनी हिंदी की किसी भी विधा में चल सकती है क्योंकि मेरे भीतर इन विधाओं की समझ विकसित हो गई थी। चाहे आत्मकथा हो या संस्मरण, रेखाचित्र और यात्रा वृत्तांत। सभी के तात्विक अंतर को समझकर विधा-विशेष में लेखन करना मेरे लिए असंभव न था। परंतु, हर रचनाकार की कार्यक्षमता और सामर्थ्य की सीमाएं हैं। यदि सैद्धांतिक या वैचारिक अथवा विचारधारा से मुक्ति की बात हो तो मैं यह मानता हूँ कि नदी जब अपने यौवन में होती है तब वह सभी बंधनों और सीमाओं को तोड़कर आनंद की विजय-यात्रा करती है। मनुष्य का यह स्वभाव बदलाव की व्यापक संभावनाओं का जन्मदाता है।
मेरी हिंदी की विकास यात्रा में क्रमशः लिखी गई प्रकाशित कृतियाँ निम्नवत हैं— 'सर्जना के पंख' (नवगीत, 1993), 'गीत मेरे मीत (नवगीत, 1995), 'जंजीरों को तोड़ो' (नवगीत, 2002), 'दीप जलने दो' (नवगीत, 2002), 'एक नदी है गीत' (नवगीत, 2004), 'इन्द्रधनुषी गीत मेरे' (नवगीत, 2006), 'ये समय के गीत हैं' (नवगीत, 2007), 'चंदन पर नागों का पहरा' (नवगीत, 2009), 'शब्द हैं प्रतिबिम्ब मेरे' (नवगीत, 2011), 'बनजारे गीतों के गाँव' (नवगीत, 2012), 'यायावर नवगीत हमारे' (नवगीत, 2012), 'सूरज अभी डूबा नहीं' (नवगीत, 2016), 'पुल कभी टूटेगा' (नवगीत 2018), 'तंग जड़ों में होंगे अंकुर' (नवगीत, 2019), 'अग्निपथों पर जलते पांव' (नवगीत, 2020)। इनकेअतिरिक्त 'एक चिंगारी और' (गजल, 2008), 'नयी सदी के पाँव' (दोहे, 2010), 'धूप के दरवाजे' (हाइकु 2010), 'अंधेरों को तोड़ दो' (मुक्तक 2016), 'अंधे लोग' (कहानी संग्रह, 2013), 'राना बेनी माधव' (नाटक, 1991, 2004), 'इतिहास के पन्ने' (एकांकी संग्रह, 2014), बैसवारा : संस्कृति, इतिहास और साहित्य (इतिहास ग्रंथ, 2015) और 'साहित्य चिंतन' (निबंध, 2020)।
इनके अतिरिक्त समीक्षा ग्रंथ हैं— 'ब्रजनंदन : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' (1990), 'छायावादी कविता की आलोचना : स्वरूप और मूल्यांकन' (1990), 'समकालीन कविता और नवगीत का समीक्षात्मक आकलन' (2016), 'नयी सदी के नवगीत : नया मूल्यांकन' (2019), 'आधुनिक काव्य : समीक्षा और संदर्भ' (2020), 'समकालीन नवगीत : समीक्षात्मक आकलन' (2020), 'समकालीन नवगीत : अवधारणा और मूल्यबोध' (2020)।
संपादित ग्रंथ— 'ब्रज मंजरी' (1980), 'सात समुंदर पार' (1982), 'जमीन के लोग' (रमाकांत के साथ, 2003), 'नयी सदी के नवगीत' (क्रमशः पाँच खण्ड- 2015, 2016, 2016, 2017, 2018), 'समकालीन नवगीत' (समीक्षा, 2020), 'समकालीन नवगीत संचयन' (साहित्य अकादमी, नई दिल्ली)। मेरे व्यक्तित्व-कृतित्व पर दो कृतियाँ प्रकाशित हैं— 'नवगीतकार ओमप्रकाश सिंह : संवेदना और शिल्प' (डॉ महेश दिवाकर, 2010), 'प्रतिभा के शिलालेख' (डॉ बृजेश सिंह, 2021)।
स्पष्ट है कि मेरी
गद्य-पद्य की अनेक विधाओं
में अभिरुचि होते हुए भी मैं नवगीत
को केंद्र में लेकर अपने लेखन में प्रमुख रूप से रमा रहा;
हालाँकि मेरे तीन उपन्यास, आत्मकथा इत्यादि अपनी पूर्णता की मांग कर
रहे हैं। समयाभाव एवं उदर रोग से प्रभावित होने कारण
अभी तक वे अर्द्धनिमीलित हैं।
अवनीश सिंह चौहान— 'तंग जड़ों में होंगे अंकुर' आपके प्रतिनिधि नवगीतों का संग्रह हाल ही में प्रकाशित हुआ। इस प्रतिनिधि नवगीत संग्रह को प्रकाशित कराने का उद्देश्य क्या रहा? वर्तमान और भविष्य में लिखे जाने वाले नवगीतों के लिए क्या कोई अन्य प्रतिनिधि संग्रह प्रकाशित कराने की योजना है?
ओमप्रकाश सिंह— यदि इसी भाँति आप जैसे शुभेच्छुओं की प्रेरणा मिलती रही और मेरी लेखनी अवाध गति से चलती रही, तो अपने पाठकों और शोधार्थियों की मांग पर इसका दूसरा खण्ड भी प्रकाशित कराया जा सकता है। कुछ विशिष्ट पाठकों, प्रबुद्धजनों और शोधार्थियों की मांग पर इसका प्रकाशन सुनिश्चित हुआ है। अनेक भाव-विचार के नवगीतों को एक कृति में 'प्रतिनिधि नवगीत' का प्रकाशन कराया गया है। जो नवगीत संग्रह बाजार में उपलब्ध नहीं हैं, उनकी बानगी इन नवगीतों में देखी जा सकती है। इस संग्रह के नवगीत मेरे नवगीत के विकास-क्रम को परिलक्षित एवं अनुबंधित तो करते ही हैं, वे इनको मूल्यवद्ध कर नयी सदी के नवगीतों की अनुभूति और शिल्प-नवता को भी सुसम्बद्ध करते हैं। यह कृति आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुविधा और पाठकीयता की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसा मेरा विश्वास है।
अवनीश सिंह चौहान— आपने 'नयी सदी के नवगीत' का पाँच खण्डों में संपादन किया है। इस योजना से जहाँ कई अल्प-चर्चित नवगीतकार चर्चा में आये, वहीं स्वाभाविक है कि कुछ चर्चित नवगीतकार जाने-अनजाने चर्चा से बाहर भी हुए होंगे? क्या इन छूटे हुए नवगीतकारों को किसी अन्य खण्ड में संकलित करने का कोई विचार है?
ओमप्रकाश सिंह— भाई अवनीश जी, कोई भी लेखक या संपादक आज तक नहीं हुआ है जिसने अपने युग के लेखकों, गीतकारों, नवगीतकारों की रचनाओं को संपूर्णता प्रदान की हो, चाहे अज्ञेय जी हों या शम्भुनाथ जी। फिर मेरे जैसा संपादक गागर में सागर भरने का प्रयत्न ही कर सकता है। आज तक जितने भी संचयन प्रकाशित हुए हैं, उनमें कुछ रचनाकार छूटे हैं, तो कुछ जुड़े हैं। फिर चाहे 'तार सप्तक' हो या 'नवगीत दशक' या फिर 'नयी सदी के नवगीत'— कोई भी संपूर्ण नहीं है। इन से भी आगे आने वाली पीढ़ी संचयन का प्रकाशन करेगी और बेहतर करने की कोशिश करेगी, मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ हैं। इधर के दिनों में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हो रहे 'समकालीन नवगीत संचयन' में 'नयी सदी के नवगीत' से छूटे हुए नवगीतकारों को भी जोड़ा गया है, जिसमें हमारे स्मृतिशेष नवगीतकार और आज के लोकचर्चित नवगीतकारों को सम्मिलित किया गया है। आशा है कि अकादमी शेष नयी पीढ़ी के नवगीतकारों को ध्यान में रखते हुए इसका दूसरा खण्ड भी प्रकाशित कराएगी। इसके अलावा नवगीत के उज्जवल भविष्य को देखते हुए आने वाली पीढ़ी कुछ नया और सर्जनात्मक संपादन कर नवनीत को समृद्धि प्रदान करेगी, ऐसी मूल्यवान अपेक्षाएँ हैं।
अवनीश सिंह चौहान— साहित्य अकादमी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित होने वाले ऐतिहासिक संकलन— 'समकालीन नवगीत संचयन' की योजना कैसे बनी? इस संकलन को तैयार करने का प्रारूप क्या है? इसमें संकलित सामग्री नये-पुराने पाठकों-विद्वानों के लिए किस प्रकार से उपयोगी होगी?
ओमप्रकाश सिंह— 'नयी सदी के नवगीत' के पाँच खण्डों के प्रकाशन के उपरांत साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित कन्हैयालाल नंदन के संपादन में प्रकाशित 'श्रेष्ठ हिंदी गीत संचयन' के अवलोकन का अवसर मिला, तभी मेरे मन में अकादमी के माध्यम से समकालीन नवगीत संकलन की योजना तैयार हुई। कई साहित्यिक मित्रों से परामर्श कर मन ही मन संकल्प बनाते हुए अपने नवगीतकार मित्र डॉ माधव कौशिक से प्रेरणा ली और फिर में एक निवेदन पत्र अध्यक्ष/ निदेशक, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली को भेजकर आश्वस्त हो गया। कई माह तक कोई सूचना न मिलने पर मुझे निराशा हुई, क्योंकि मुझे यह ज्ञात नहीं था कि साहित्य अकादमी की कार्यवाही पूरी होने में समय लगता है। मैं तो अकादमी के कार्यालय भी कभी नहीं गया। इस संचयन की संपूर्ण कार्यवाही में लगभग डेढ़-दो वर्ष लग गये। परंतु, मैं अकादमी के सभी पदाधिकारियों और सदस्यों के प्रति विशेष अनुग्रहीत हूँ कि अंततः नवगीत संचयन के प्रकाशन का निर्णय लेकर उसके संपादन का कार्यभार मुझे सौंप दिया; आज वह ऐतिहासिक संचयन प्रकाशन की ओर है। इसमें भूमिका भाग के बाद नवगीत रखे गए हैं और अंत में नवगीतकारों के परिचय सम्मिलित है।
इस संचयन में नवगीत की परंपरा, विकास, उसके मूल तत्वों के अतिरिक्त गीत और नवगीत का सामान्यतः अंतर तथा अन्य नवगीत की विषयवस्तु, शिल्प इत्यादि पर संक्षिप्त जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है। नवगीत के प्रारंभिक अर्थात अभ्युदय काल के नवगीतों से लेकर समकालीन नवगीतों तक को इस संचयन में सम्मिलित किया गया है। स्पष्ट है कि नये-पुराने सभी पाठकों एवं विद्वानों और शोधार्थियों के लिए इस संचयन में पर्याप्त सामग्री उसकी विविधता के साथ उपलब्ध है।
अवनीश सिंह चौहान— नवगीत के लिए बैसवारा की धरती बड़ी उर्वरा रही है। यहाँ के किन-किन नवगीतकारों का रचनाकर्म आपको पूरी तरह से आश्वस्त करता है और वे किस प्रकार से राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका का निर्वहन करते दिखाई पड़ते हैं?
ओमप्रकाश सिंह— राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका का निर्वहन करने वाले नवगीतकार कमोबेश डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया और दिनेश सिंह ही रहे हैं, जिनका नवगीत काव्य बेजोड़ है; किंतु भदौरिया जी ने कुछ आलेखों को छोड़कर गद्य विधा में विशेष रुचि नहीं दिखाई। नवगीत काव्य और नवगीत आलोचना के क्षेत्र में 'नये-पुराने' पत्रिका के यशस्वी संपादक दिनेश सिंह ने जो ऐतिहासिक कार्य किया है, उस पर हमें गर्व है। इनके अतिरिक्त समकालीन नवगीतकारों में रामनारायण रमण, विनय भदौरिया, जय चक्रवर्ती, रमाकांत में काफी ऊर्जा दिखाई पड़ती है। कहने का आशय यह कि इन रचनाकारों का रचनाकर्म हमें आश्वस्त ही नहीं करता, बल्कि इनकी लेखनी का निरंतर प्रवाह हिंदी नवगीत के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत भी करता है।
अवनीश सिंह चौहान— "गीत क्या है? समकालीन गीत क्या है? नवगीत क्या है? समकालीन नवगीत क्या है?"— ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिन पर कई विद्वानों ने अपनी-अपनी बात रखी है। आप इन प्रश्नों को किस प्रकार से देखते हैं?
ओमप्रकाश सिंह— मनुष्य के भीतर अंतर्नाद के साथ लयवद्ध पीड़ा अपने गर्भ को भेदती हुई जब गुनगुनाहट में बहिर्मुखी अभिव्यक्ति लेती है तब संवेदना के शब्द छन्दवद्ध होकर आकार ले लेते हैं। ये गीत भावप्रधान होते हैं और विचार सहायक। चूँकि गीतकार केवल अनुभूति का संवाहक ही नहीं, शिल्पी भी होता है, इसलिए वह उसमें छंद विधान के साथ अन्य अलंकरणों द्वारा उसकी बुनावट में लावण्य भरता है। समकालीन गीत पारंपरिकता से मुक्त उत्तर आधुनिकता के पटल पर वर्तमान को निर्धारित करता है और युग-परिवर्तन से युक्त मानवीय संवेदना को मूल्यवद्ध करता है। स्पष्ट है कि समकालीनता युग संदर्भों के दरवाजे पर कालबोधक है। एक निश्चित कालावधि में विचार एवं रचना-शिल्प का संप्रेषण भी समकालीन जीवन-संवेदना की विशिष्टता है। यह कालबोध के निमित्त भाववाचक संज्ञा ही नहीं, बल्कि वह जीवंतता प्रदान करने वाली सर्जनात्मक शक्ति भी है। यह समकालीनता आपने काल की समस्याओं और चुनौतियों का भी मुकाबला करता है। यह बात गीत और नवगीत दोनों के साथ अभिभूत होती है। हाँ, विद्वानों ने इस बारे में विमर्श किया है। फिर तो भाई, 'मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्नः।'
अवनीश सिंह चौहान— नवगीत के प्रवर्त्तक कवियों का उल्लेख करते हुए नवगीत की रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डालें?
ओमप्रकाश सिंह— नवगीत का कोई एक प्रवर्त्तक नहीं है, क्योंकि नवगीत की उत्पत्ति और विकास में नवगीतकारों का सामूहिक योगदान है। भले ही अपने-अपने नवगीतों के कालविशेष में पत्रिकाओं में प्रकाशन के आधार पर नवगीतकारों के कुछेक समर्थकों ने दावे पेश किए हैं और आड़े-ओढ़े अपने-अपने नवगीतों की वकालत की है, सच तो यह है कि कभी-कभी युगीन परिस्थितियाँ और सामानकूल परिवेश में, एक ही कालखंड में, समान विचारों और शिल्प की आमद होती रही है। कई भाषाओं के रचनाकार अलग-अलग परिवेश और काल में रहकर वैचारिक समानता स्थापित करते हैं; सोच के धरातल पर मनोमय संस्तुतियाँ उनमें समत्व बाँटती दिखाई देती हैं। हाँ, नवगीत के अभ्युदय काल में राजेंद्र प्रसाद सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, शम्भुनाथ सिंह, चंद्रदेव सिंह और ओम प्रभाकर के अवदान को नहीं भुलाया जा सकता। इसी कड़ी में आगे चलकर उमाकांत मालवीय, वीरेंद्र मिश्र, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, देवेंद्र कुमार, देवेंद्र शर्मा 'इंद्र' इत्यादि ने नवगीत की संवेदना और शिल्प के विकास में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की, ऐसा मेरा मानना है।
हालाँकि नवगीत की रचना-प्रक्रिया पर संक्षिप्त रूप में कुछ कह पाना कठिन है, फिर भी मैं नवगीत की सर्जनात्मकता के लिए कुछ बिंदुओं पर चर्चा करना चाहूँगा— संक्षिप्त, भाव-सघनता, सांकेतिकता, मानवीकरण, उत्तर आधुनिकता, बिम्ब-धर्मिता, यथार्थ और गेयता। ये नवगीत के लिए प्रतिबंध नहीं हैं, बल्कि उसकी गुणवत्ता के मानक हैं। ये मानक भी समय और विकास के अगले चरण में कुछ परिवर्तित हो सकते हैं, किंतु नवगीत की छंदबद्धता टूटने पर वह कोई गद्य कविता का स्वरूप ले सकती है। इस परिवर्तनशील जगत के आने वाले देश काल में मनुष्य की वैचारिक यात्रा और शिल्प-योजना में बदलाव संभावित है। यही नव निर्माण की प्रक्रिया का अंग भी है।
नवगीत ने भी अपनी गीत परंपरा से अर्जित विषय-वस्तु और शिल्प में नये-नये बदलाव किए हैं। उसने छंद, राग, लय, संगीत के साथ व्यक्ति-पीड़ा, जीवन-दर्शन, प्रकृति सौंदर्य, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय चेतना, युग-संदर्भों को लेकर कहन और गठन के स्तर पर भी बदलाव किए हैं। युगीन स्थितियाँ, सामाजिक परिवेश और युग बदलते हैं, तो भाषा भी युगानुरूप आकार लेकर शब्द-योजना, मुहावरे, बिम्ब, प्रतीक एवं उपमान के परिवर्तन के साथ संप्रेषणीय ऊर्जा ग्रहण करती है। नवगीत ने व्यक्ति पीड़ा के साथ एक सामाजिक दर्शन दिया है और युगीन विसंगतियों और विद्रूपताओं का सामना करने के लिए उसने अपनी प्रतिरोधक क्षमता को विकसित किया है। उसने सौंदर्य और संघर्ष की क्षमता बढ़ाते हुए वैयक्तिकता का सामाजीकरण किया है।
अतएव नवगीत ने गीत परंपरा से प्राप्त प्रदेय को स्वीकार करते हुए प्रगतिशील साहित्य से युग-संदर्भ, उत्तर-आधुनिकता, वैश्वीकरण या भूमण्डलीकरण, पर्यावरण, उदारीकरण, महाद्वीपीय विघटन, अंतर्राष्ट्रीय चिंतन, सामाजिक विकृतियाँ एवं विद्रूपताएँ, नारी-दलित-विमर्श एवं अन्य सामयिक समानताओं-असमानताओं पर चिंतन करते हुए गीतों की ग्रामीण संवेदना को वैश्विक फलक पर उतारकर उसकी प्रासंगिकता और गुणवत्ता को समृद्ध एवं एवं वैभवशाली बनाया है। साथ ही प्रयोगशील साहित्य से लेकर यथार्थ, मानवीकरण, वैज्ञानिक बिम्ब, प्रतीक और उपमान इत्यादि अलंकरणों की उपादेयता सिद्ध की है।
एक ही उर्वर धरती पर विवाद होने वाली समानांतर काव्य-धाराओं का एक-दूसरे पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि वे देशकाल, परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव के साथ-साथ रेखांकित होती चलती हैं। उनके विचारों, वैभवों, शब्द-स्वरों और सांस्कृतिक संवेदनाओं का आदान-प्रदान भी संभव है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि नवनीत ने अपनी पृष्ठभूमि पर अपनी समन्वयवादी चेतना को क्षमतावान कर एक नई विधा के रूप में आकार ग्रहण किया है। वह अत्यंत प्रगतिशील, मनोवैज्ञानिक और पारंपरिक चिंतन व दर्शन को लेकर काव्य-पटल पर अग्रसर है। आज वह अपने सौंदर्य और सामर्थ्य के साथ हिंदी कविता के केंद्र में ही स्थापित नहीं है, बल्कि वह आंचलिक बोलियों, हिंदी की उपभाषाओं और वैश्विक भाषाओं के फलक पर अत्यंत प्रासंगिक सिद्ध हो रहा है।
अवनीश सिंह चौहान— 'नयी सदी के नवगीत' और 'समकालीन नवगीत' — दो ऐसे वाक्यांश हैं जो सामान्य रूप में देखने पर समानार्थी दिखाई पड़ते हैं। नवगीत की अवधारणा एवं मूल्यबोध को केंद्र में रखते हुए बताएँ कि क्या कोई इनमें मूलभूत अंतर भी है? यदि 'हाँ', तो क्यों? यदि 'न', तो क्यों नहीं?
ओमप्रकाश सिंह— 'नयी सदी के नवगीत' और 'समकालीन नवगीत' दोनों एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। नयी सदी हो या पुरानी सदी हो— 'सदी' शब्द एक दीर्घ कालखण्ड बोधक है और 'समकालीन' शब्द सामयिक या लघु कालखण्ड का समवाय है। जब सदी के अर्थ में युग-संदर्भों पर चिंतन किया जाता है तब उसके समय एवं परिस्थितियों की परिधि व्यापक होती है। विश्वनाथ प्रसाद का मत है कि 'नवगीत में संवेदना का विशेष महत्व है।' संवेदना का तात्पर्य है— 'भाव के साथ समझदारी। सौंदर्यबोध, जीवनानुभव, जीवन-दृष्टि, सामाजिक सोच, राजनीतिक समझदारी और जातीय अस्मिता की पहचान नवगीत के संदर्भ बन गए; मूल्यबोध भी नवगीत में उभरने लगे।' समकालीनता मेरे लिए भी केवल कालबोध के निमित्त प्रयोग की जाने वाली एक भाववाचक संज्ञा ही नहीं, बल्कि वह जीवंतता प्रदान करने वाली सृजनात्मक शक्ति भी है, अर्थात वह केवल एक लघुतम कालखण्ड ही नहीं, उसकी वैचारिक एवं जीवनशैली का हेतु भी है। इसमें भाव एवं विचारों में आनुपातिक योग है।
अवनीश सिंह चौहान— भूमंडलीकरण के इस दौर में वैश्विक स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उन्नति का विशेष महत्व है। नवगीत के ऐसे नये संदर्भ कौन-कौन से हैं जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की उन्नति में सहायक हैं?
ओमप्रकाश सिंह— भूमंडलीकरण का व्यावहारिक अभिप्राय यह है कि अनेक रंग-रूप, देश या भू-भाग में जीने वाली मानव जाति अपने सभी संसाधनों, स्थितियों और जरूरतों के साथ समरसता बनाकर जीवन यापन करते हुए एक दूसरे की सहयोगी बनें; अपने-अपने हित साधन से जुड़कर मानव संवेदना के प्रति उदात्त बने। इस परिधि पर जीते हुए मनुष्य, मनुष्य के प्रति उत्तरदायी भी बने। आज इसीलिए एक देश दूसरे देश में होने वाले कलह, युद्ध या किसी प्राकृतिक आपदा अथवा महामारी के समय सहयोग में खड़े होकर मानवता की रक्षा के लिए कटिबद्ध है।
भौतिक संसाधनों के विकास और प्रौद्योगिक उन्नति में विज्ञान ही सहायक है। विज्ञान के विकास के क्रम में आज दुनिया के देश अपनी प्रौद्योगिक उन्नति के प्रति विशेष जागरूक हैं। बिना वैज्ञानिक विकास के पृथ्वी पर मानवता की रक्षा भी संभव नहीं है। नवगीत इस वैज्ञानिक विकास व प्रौद्योगिक उन्नति के हेतु रेखांकन की ओर अग्रसर है, अभी इतना ही कह सकता हूँ।
अवनीश सिंह चौहान— नयी सदी और पुरानी सदी के नवगीतों की भाषा, शिल्प और संवेदना के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? सदी के हिसाब से नवगीत का इस प्रकार से मूल्यांकन करने में किन तथ्यों/ मानकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए?
ओमप्रकाश सिंह— नवगीत के अभ्युदय काल के नवगीतकारों की शिक्षा उर्दू के साथ हिंदी में पूर्ण हुई थी। वह उर्दू भारतीय भाषा तो जरूरत थी, किंतु इसमें अरबी-फारसी के शब्द मिला-जुला कर लिखे जा रहे थे। साथ ही अधिकांश नवगीतकार पारंपरिक हिंदी भाषा के साथ संस्कृत शब्दावली का भरपूर प्रयोग करने लगे थे। कुछ नवगीतकारों ने लोकगीतों की संवेदना लेकर नवगीतों में ग्राम्यबोध या आंचलिक बोध लाने के लिए लोकभाषा अथवा हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों के शब्दों का प्रयोग करना समीचीन समझा, जिससे उन उपभाषाओं के शब्द, मुहावरे, मिथक और बिम्ब इत्यादि के प्रयोग से नवगीत के सौंदर्य और सामर्थ्य में यथोचित वृद्धि हुई। किन्तु नवगीत की भाषा में खड़ी बोली के आयातित एवं देशज शब्दों की अधिकता और बिम्बों के गुम्फन से नवगीत की संप्रेषणीयता बाधित होने लगी। अस्पष्ट और सांस्कृतिक शब्दों एवं बिम्बों ने पाठकों तथा साधकों को विचलित कर दिया। कुछ नवगीतकारों ने नवगीत में चमत्कार और अर्थ-गाम्भीर्य लाने के लिए नए शिल्प का खेल किया, किंतु उन नवगीतों के प्रति पाठकों की उदासीनता ने उन्हें नया दिशा बोध कराया। आगे चलकर नवगीत-लेखन दो प्रकार का हो गया— जो नवगीत पत्र-पत्रिकाओं और प्रबुद्ध वर्ग के लिए लिखे गए, वे 'क्लास' के लिए थे और जो जनसामान्य के लिए मंचीय दृष्टि से लिखे गए, वे 'मास' के समक्ष प्रस्तुत किए गए; किन्तु मंचों पर आठवें दशक के बाद भी पारंपरिक गीतों का ही बोलबाला था। क्रमशः मंचीय गीतों में भाषायी गिरावट आने लगी थी। भाषा-शिल्प की हानि के साथ-साथ छिछली लोकप्रियता ने मंचीयता प्रदूषित कर दी और क्रमशः जन-जन के होठों पर गुनगुनाये जाने वाले गीतों के गीतकार सन 1910 तक आते-आते मंचों से उतरने लगे थे।
इधर नवगीतकारों ने कवि-सम्मेलनी मंचों से अलग साहित्यिक संगोष्ठियों और पत्र-पत्रिकाओं के मंच की आचार संहिता को विकसित किया। कुछ पारंपरिक गीतकारों ने भी नवगीत की समृद्धि को देखते हुए पाला बदलना शुरू कर दिया और नए गीत को नवगीत कहकर सेंधमारी के जरिए नवगीत के संकलनों में साझीदारी प्रारंभ कर दी। किंतु समय ने जब बदलाव लिया, उसकी समझ और सृजनधर्मिता का विकास हुआ; फलस्वरुप कुछ आयातित गीतकार पीछे छूटते गए और नवगीत की भाषा ने करवट मारते और अंधेरे को चीरते हुए संघर्ष और प्रतिरोध के साथ अपनी भाषा-सामर्थ्य को द्विगुणित किया। आज नवगीत की भाषा लोकभाषा, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी भाषा इत्यादि के प्रचलित शब्दों को आत्मसात करती हुई सहज, स्पष्ट और विशुद्ध खड़ी बोली के रूप में लोकचर्चित और सम्मानित हो रही है। अतएव युग परिवर्तन के साथ नवगीत की संवेदना का विकास हुआ। मनुष्य की अनुभूति की धरती पर संवेदनशीलता के कुंठित होने के कारण बौद्धिक वैचारिकी का दबाव अधिक बढ़ा। फलस्वरुप बुद्धिवाद की कलात्मकता ने कविता के बाह्य आवरण पर जोर दिया। स्पष्ट है कि नवगीत के पारंपरिक मानक भी बदले, मानवीय संवेदनशीलता की क्षमता का क्षरण हुआ और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी ने भौतिक विकास के फलक पर उतरकर मनुष्य के अंतःलोक को संकीर्ण और संकुचित कर दिया। इसीलिए युगीन काव्यधाराओं के प्रवाह में आकर नवगीत भी बाह्य आकर्षण चमत्कार की ओर उन्मुख होता गया। इसी कारण मानवीय संवेदना का नवगीत में भी ह्रास होने लगा और उसके बाह्य आवरण में इंद्रधनुषी रँग उभरने लगे। मेरा मानना है कि नवगीत को काव्य-सुंदरी-सा सुसज्जित कर उसे प्रदर्शन अथवा विज्ञापन का हेतु न बनाया जाना चाहिए। शुद्ध एवं सार्थक काव्य मनुष्य को संवेदनशीलता के साथ उसके जीवन-मूल्यों के रक्षार्थ सृजित होता है। वह कविता मानव-मूल्यों की रक्षा करते हुए लोक-कल्याण की भावनाओं से अभिभूत होती है। वही सर्जना के मानक पर खरी उतरती है। इसलिए नवगीत की उपादेयता एवं मूल्यबद्धता तब तक बनी रहेगी जब तक वह मनुष्य, समाज और वैश्विक जीवन को आत्मसात करती रहेगी। उसके मूल्यों के प्रति जागरूक नवगीतकारों को युगानुरूप संवेदना और उसके शिल्प को भी तराशना होगा।
अवनीश सिंह चौहान— समकालीनता के परिप्रेक्ष्य में नवगीत की कौन-कौन-सी सीमाएँ हैं? इन सीमाओं से परे जाकर नवगीत में आप किस प्रकार की सम्भावनाएँ देखते हैं?
ओमप्रकाश सिंह— इस जगत में मनुष्य का कोई भी ज्ञान पूर्ण नहीं है, उसकी अपूर्णता ही उसे पूर्णत्व की तलाश के लिए प्रेरित करती है। इसी तरह मनुष्य का अभावग्रस्त मन अपनी सभी भावनाओं के साथ उसकी पूर्णता के प्रति संकल्पित होता है। मनुष्य यथार्थ जगत में जब अपनी इच्छाओं का संपूर्णता प्रदान नहीं कर पाता तब वह कल्पना लोक में उसकी तलाश करता है। इसीलिए उसकी कविता अपने सृजन के परिप्रेक्ष्य में कभी आदर्श से यथार्थ की ओर और कभी यथार्थ से आदर्श की ओर यात्रा कराती है। कविता के संसाधन भी वही उपयोगी माने जाने चाहिए जो मनुष्य और समाज की संवेदना और मूल्यों को उन्नतिशील बनाते हुए उसकी रक्षा कर सके। इस दृष्टि से किया गया सृजन ही समकालीनता का अनुकूलन कर सकता है। अभिप्राय यह है कि मनुष्य के जीवन-मूल्य— प्रेम, दया, कृपा, त्याग, दान, सेवा, सौहार्द, सौंदर्यबोध इत्यादि सभी सद्गुणों का प्रकाशन जीवन और वैश्विक समाज की अनिवार्यता है। यही नवगीत या किसी भी युग की काव्य-विधा के मानक बनते हैं। इनकी अनंत सीमाएँ और मानक हैं, क्योंकि इन मूलभूत सामाजिक तथ्यों के आधार पर मानव समाज की कुवृत्तियों, असमानताओं और विकृतियों का निर्धारण कर संघर्षशील चेतना का उदय होता है और वह अपनी प्रतिरोधक क्षमता के द्वारा एक योद्धा की भाँति खड़ी होती है। इसकी सीमाओं का निर्धारण तो नहीं किया जा सकता, किंतु इसकी सम्भावनाएँ अनंत हैं। जैसे किसी गतिशील नदी की हर लहर अगली लहर को काटती आगे प्रवाहित होती है, उसी प्रकार नवगीत की चिंतन-धारा भी एक सिद्धांत या वैचारिकी को तोड़कर अपना नया रूप धारण कर लेती है। इसीलिए उसकी असीम विजय-यात्रा का निश्चयात्मक मानक तैयार कर पाना संभव नहीं है। इसके सृजन और ध्वंस की प्रक्रिया साथ-साथ चलने के कारण बदलते हुए मानकों का निर्धारण भविष्य के नवीन साँचे में ही संभव है।
अवनीश सिंह चौहान— क्या आधुनिक पत्र-पत्रिकाएँ छांदस रचनाओं की उपेक्षा पूरी तरह से कर पा रही हैं? यदि नहीं, तो क्या इसके पीछे नवगीत की सशक्त उपस्थिति एक वजह हो सकती है?
ओमप्रकाश सिंह— सच तो यह है कि भारतीय लोकमानस ने समकालीन कविता— प्रगतिवाद, प्रयोगवाद तथा नई कविता अर्थात छंदविहीन कविता को नकारते हुए उसे कभी समर्थन नहीं दिया है— न तो मंचों पर और न ही पाठकीयता के स्तर पर, क्योंकि भारतीय मानस छंदबद्ध काव्य के लय से ही नहीं, बल्कि रागबोध से सदैव जुड़ा रहा है। लय, राग और संगीत सुरों से भरपूर संस्कृत साहित्य से संस्कारित और परिष्कृत हिंदी भाषा शब्द-स्वर अन्य भारतीय भाषाओं की भाँति घट-घट की अनुगूँज से समाहित है।
छंदबद्ध और छंदमुक्त कविता के दो पालों में बँटी हुई हिंदी कविता के मठाधीशों ने क्रमशः मंचीयता और पत्रकारिता की दो दलीय व्यवस्था खड़ी की, जिसके कारण संस्थागत मंचों पर छंदबद्ध कवियों और संस्थागत पत्र-पत्रिकाओं पर छंदमुक्त कवियों ने अपने पांव जमाए। छंदमुक्त रचनाकारों ने समय और परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए प्रशासनिक साहित्यिक संस्थानों और अकादमियों को भी अपनी मुट्ठी में ले लिया। उन्हें स्तरीय पुस्तकालय और वाचनालय मिले और उन्होंने सभी संस्थानों के पुरस्कारों का भी लाभ उठाया। इन संस्थानों की सरकारी सहायता से नियमित विकसित होने वाले पत्र-पत्रिकाओं पर उनका एकाधिकार हो गया। इन रचनाकारों ने उसी परिवेश के अनुकूल लेखन करते हुए रोजगार भी तलाशे और प्रकाशन की सुविधाएँ भी तलाशीं। परिणामस्वरूप रचनाओं को सरकारी संस्थाओं की बड़ी पत्रिकाओं में जगह नहीं मिल सकी और छंदमुक्त रचनाकारों को मंच पर।
सरकारी अनुदान और अन्य लेखकीय सुविधाएँ मिल पाने के कारण रोजगारविहीन छंदबद्ध कवि लोभ-सम्मान की चाह में मंचों पर ही खेमेबाजी के शिकार हो गए। उन्होंने अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा अलग पत्रकारिता का सहारा लिया, जिनकी अल्पायु ने उन्हें मजबूत आधार प्रदान नहीं किया। आज सामाजिक और राजनीतिक संधि बनाकर चलने वाले नवगीतकारों ने क्रमशः भेदनीति को ही तोड़ दिया। नवगीत को लिजलिजी भावुकता की कविता कहने वाले नवगीत की विविधता और बौद्धिक सामर्थ्य को देखकर उसके प्रशंसक होने लगे। अतः समकालीन या नयी कविता की संप्रभुता की टूटन और नवगीत की बढ़ती लोकप्रियता देखकर दीर्घजीवी संस्थानों की पत्रिकाओं ने विवश होकर उसे प्रकाशन के स्तर पर ही जगह नहीं दी; बल्कि मौलिक एवं लोकप्रिय नवगीतकारों को अपने साहित्यिक मंचों पर यथोचित सम्मान भी दिया। निश्चित ही, आजकल नवगीत की सशक्त उपस्थिति ने दीर्घकालिक पत्रिकाओं में अपने लिए सम्मानजनक जगह बना ली है।
अवनीश सिंह चौहान— कहते हैं कि 'साधना' के अतिरिक्त कोई 'शॉर्टकट' नहीं होता। किन्तु प्रश्न यह है कि यदि 'शॉर्टकट' नहीं होता तो 'साधना' किस प्रकार की हो कि सभी नये-पुराने नवगीतकारों को 'शॉर्टकट लिए बिना' लक्ष्य प्राप्त हो सके?
ओमप्रकाश सिंह— 'साधना' असीम और अनंत होती है और शायद उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम है। 'साधना' अपने आप में व्यापक अर्थ देती है। साहित्य लेखन की प्रक्रिया भी एक साधना है और साहित्य के द्वारा सत्य की खोज करना भी साधना है। लक्ष्य जो भी हो, किंतु साधना के बिना जीवन में कोई उपलब्धि संभव नहीं। मनुष्य के हर संकल्पित एवं समर्पित कर्म और उसके ध्येय के नियोजन में साधना ही सहायक है, जैसे— चंद्रमा तक पहुँचने के लिए पृथ्वी से चंद्रमा तक की यात्रा करनी होगी। फिर भी स्थूल जगत की दूरी नापने के लिए कोई 'शॉर्टकट' साधन की खोज विज्ञान कर भी सकता है, किंतु अंतर्जगत की सूक्ष्म यात्रा का 'शॉर्टकट' तलाशना टेढ़ी खीर है। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साधना ही माध्यम है, जो साध्य भी हो जाती है और साधन भी। कर्ता, कर्म और कारण का भेद मानसिक दुर्बलता कही गयी है। नवगीत की सृजन यात्रा में अपवादों को छोड़कर कोई 'शॉर्टकट' नहीं मिलता। साधक को लक्ष्यार्थ हेतु साधना तो करनी ही पड़ेगी। किसी को कोई पड़ा फल मिल जाए तो उसकी साधना का वह प्रतिफल नहीं है। हाँ, उसकी पृष्ठभूमि में किसी सृजनकर्ता की साधना जुड़ी हुई है।
प्रतिभा अपना आलम्बन स्वयं होती है। किसी भी साधना में प्रतिभा की हिस्सेदारी प्रमुख है। इसके लिए पूर्णतः समर्पण, त्याग और वैराग्य की आवश्यकता होती है। रचनाकार प्रतिभा और सामर्थ्य की दो पतवारें ही उसके लक्ष्य की नाव को निर्धारित केंद्र तक पहुंचा सकता है। सवाल यह भी है कि लक्ष्य कैसा है? वह स्थूल उपलब्धि के लिए है या सूक्ष्म-संवेदन के लिए। तपस्या या साधना के बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं।
अवनीश सिंह चौहान— नयी पीढ़ी के नवगीतकारों को सृजन-प्रक्रिया के बारे में क्या कोई सन्देश देना चाहेंगे?
ओमप्रकाश सिंह— हर पीढ़ी सृजन के स्तर पर संघर्षशील होती है और वह अपनी उपलब्धि को लेकर मूल्यांकन की प्रतीक्षा में अत्यंत शिथिल होने लगती है। साधक सम्मान के प्रति तटस्थ होता है, क्योंकि वह सोच के स्तर पर एक व्यक्ति न होकर समष्टि में व्याप्त हो जाता है। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'— इस मंत्र को स्वीकारते हुए नई पीढ़ी के नवगीतकार निष्काम भाव से सर्जनात्मक धरती पर ऊर्जावान रहें; समय उनका स्वयं उचित मूल्यांकन करेगा। प्रतिष्ठा माँगने से नहीं, कर्मयोग से ही प्राप्त होती है।
Interview: Omprakash Singh in Conversation with Abnish Singh Chauhan


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