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गुरुवार, 9 जुलाई 2026

जन्मदिवस पर : समय के सच को शब्दों में रचने वाले राजेंद्र राव — अवनीश सिंह चौहान


हिंदी के वरिष्ठ कथाकार, उपन्यासकार और साहित्यिक पत्रकार राजेंद्र राव का जन्मदिवस उनके बहुआयामी साहित्यिक अवदान को स्मरण करने तथा उनकी दीर्घ, निरंतर और सृजनशील यात्रा के मूल्यांकन का अवसर है। इस अवसर पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ एवं स्वस्थ, दीर्घायु और सक्रिय रचनात्मक जीवन के लिए मंगलकामनाएँ।

9 जुलाई 1944 को राजस्थान के कोटा में जन्मे राजेंद्र राव की प्रारंभिक पहचान भले ही एक मेकैनिकल इंजीनियर के रूप में रही, लेकिन उनकी मूल संवेदना साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ी रही। तकनीकी शिक्षा और प्रबंधन के व्यावहारिक अनुभवों ने उनके रचनाकार व्यक्तित्व को एक विशिष्ट दृष्टि प्रदान की। सातवें दशक में लघु उद्योगों से अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत करने के बाद उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में तकनीकी प्रशिक्षण, प्रबंधन और प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन किया। इसी जीवनानुभव ने उनके साहित्य को वह व्यापक सामाजिक धरातल दिया, जहाँ मनुष्य, व्यवस्था और समय के अंतर्संबंधों को गहराई से समझा जा सकता है।

राजेंद्र राव का साहित्यिक अवतरण किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि उनके भीतर निरंतर विकसित होती संवेदना और अभिव्यक्ति की स्वाभाविक परिणति थी। उनकी पहली कहानी ‘शिफ्ट’ के प्रकाशन के साथ उनकी कथा-यात्रा का औपचारिक आरंभ हुआ। इसके बाद ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘कहानी’, ‘रविवार’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ, धारावाहिक उपन्यास, कथा-शृंखलाएँ, रिपोर्ताज और स्तंभ प्रकाशित होते रहे। उनकी लेखकीय यात्रा की विशेषता उसकी निरंतरता, गंभीरता और अनुभव-संपन्नता रही है। उन्होंने साहित्य को केवल रचना का माध्यम नहीं, बल्कि समय और समाज को समझने का एक संवेदनशील उपकरण माना।

राजेंद्र राव की कथा-सृष्टि का केंद्र मनुष्य और उसका जीवन-संघर्ष है। उन्होंने हिंदी कथा-साहित्य को जीवन के ठोस यथार्थ, सामाजिक अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं से गहरे स्तर पर जोड़े रखा। उनकी कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन की जटिलताएँ, सामाजिक अंतर्विरोध, बदलते पारिवारिक और मानवीय संबंध तथा समय की विडंबनाएँ सहज रूप में अभिव्यक्त होती हैं। वे किसी पूर्वनिर्धारित वैचारिक आग्रह या साहित्यिक खेमेबंदी के बजाय जीवन के वास्तविक अनुभवों और मनुष्य की आंतरिक स्थितियों को अपनी रचना का आधार बनाते हैं। यही कारण है कि उनका साहित्य समय विशेष का दस्तावेज होने के साथ-साथ व्यापक मानवीय अनुभवों का प्रतिनिधि भी बन जाता है।

उनकी कथा-दृष्टि की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता साधारण जीवन-स्थितियों में छिपे असाधारण मानवीय पक्षों को पहचानने की क्षमता है। उनकी रचनाओं में न तो कृत्रिम नाटकीयता दिखाई देती है और न ही भाषा का अनावश्यक अलंकरण। उनकी भाषा सहज, पारदर्शी और आत्मीय है, जो पाठक को कथा-संसार से जोड़ते हुए उसे अपने समय, समाज और स्वयं के भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है। उनकी रचनात्मकता अनुभव की प्रामाणिकता और अभिव्यक्ति की विश्वसनीयता पर आधारित है। कुलमिलाकर राजेंद्र राव का साहित्य इस विश्वास को पुष्ट करता है कि एक संवेदनशील रचनाकार अपने समय को केवल शब्दों में दर्ज नहीं करता, बल्कि उसकी अनकही आवाजों, अंतर्ध्वनियों और मानवीय प्रश्नों को भी पहचानता है। उनकी रचनाएँ अनुभव की प्रामाणिकता, भाषा की सहजता और सामाजिक सरोकारों के कारण हिंदी कथा-साहित्य में विशिष्ट स्थान रखती हैं।

राजेंद्र राव की साहित्यिक उपलब्धियाँ उनके प्रकाशित कथा-संग्रहों और उपन्यासों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। ‘असत्य के प्रयोग’, ‘नौसिखिया’, ‘दूध के दांत’, ‘सूली ऊपर सेज पिया की’ और ‘कोयला भई न राख’ जैसे कथा-संग्रह उनकी व्यापक जीवन-दृष्टि और कथा-कौशल के प्रमाण हैं। ‘ना घर तेरा ना घर मेरा’ जैसे उपन्यास में उन्होंने सामाजिक संबंधों, मानवीय आकांक्षाओं और जीवन की जटिलताओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। अब तक प्रकाशित उनके एक दर्जन से अधिक कथा-संग्रह, उपन्यास और कथेतर कृतियाँ उनकी निरंतर सृजनशीलता, व्यापक जीवन-दृष्टि और हिंदी साहित्य के प्रति गहरी प्रतिबद्धता की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।

साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में भी राजेंद्र राव का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं से जुड़कर उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता को गंभीर दृष्टि, वैचारिक विस्तार और रचनात्मक ऊर्जा प्रदान की। बाद के वर्षों में दैनिक जागरण में साहित्य संपादक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने साहित्य और समाज के बीच संवाद को मजबूत किया तथा नए रचनाकारों और साहित्यिक गतिविधियों को व्यापक मंच प्रदान किया।

उनके जन्मदिवस पर हम उनके बहुआयामी साहित्यिक अवदान का अभिनंदन करते हैं और कामना करते हैं कि उनकी लेखनी भविष्य में भी समाज, समय और मनुष्य के विविध अनुभवों को इसी संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करती रहे। 








समाचार प्रस्तुति :
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की सूक्ति को अपने जीवन में आत्मसात करने वाले द्विभाषी साहित्यकार डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून, 1979) आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वे वर्तमान में मास्टर ट्रेनर (नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति), भारतीय ज्ञान परंपरा–विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत कार्यरत हैं। 

On His Birthday: Rajendra Rao — The Writer Who Shapes the Truths of Time Through Words — Abnish Singh Chauhan

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