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| राम नारायण रमण |
“अरे! बुद्धिजीवी”
अरे! बुद्धिजीवी
भारत के कहाँ गये?
सच को सच कहने की
सारी हिम्मत टूट गई।
कविगण, लेखक वृन्द
और सब
कलाकार हैं मौन,
बस! दो-चार नाम
बलिदानी,
और बचा है कौन?
निरे गंवार
प्रतिष्ठित होते चले गये
छले गये जनसाधारण की
किस्मत फूट गई।
न्याय भागकर जान
के लिए
छिपता फिरता है,
अन्यायी का
राज तिलक
सिंहासन करता है।
तानाशाही के कारण
बर्बादी, बेचैनी
कुर्बानी से हासिल
वह आजादी छूट गई।
खून माँगती है
धरती
इतिहास खोलकर देख,
कभी नहीं मिटते
हैं बंदे
यह खूनी अभिलेख।
निरे स्वार्थ से
कोई जीत नहीं होती
हमको तुमको नंगी-सी
बेमानी लूट गई।
-- राम नारायण रमण
जाने-माने साहित्यकार राम नारायण रमण जी का प्रस्तुत नवगीत “अरे! बुद्धिजीवी” अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं, बौद्धिक निष्क्रियता और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के प्रति सजग चिंता व्यक्त करता है। रचना का मूल स्वर प्रतिरोध का है, किंतु उसके भीतर जनसरोकार, नैतिक बेचैनी और इतिहास-बोध की गहरी संवेदना भी प्रवाहित होती है। कवि का केंद्रीय प्रश्न बुद्धिजीवी वर्ग की सामाजिक भूमिका को लेकर है—जब समय सत्य के पक्ष में खड़े होने की माँग करता है, तब विवेकशील समाज की आवाज इतनी क्षीण क्यों दिखाई देती है?
गीत का आरंभ— “अरे! बुद्धिजीवी / भारत के कहाँ गये? / सच को सच कहने की / सारी हिम्मत टूट गई”—तत्काल पाठक का ध्यान अपनी ओर खींचता है। ‘अरे!’ का संबोधन रचना को संवादधर्मी और आत्मीय बनाता है, जबकि ‘बुद्धिजीवी’ यहाँ केवल शिक्षित वर्ग का संकेत न रहकर विवेक, सत्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक बन जाता है। ‘सच को सच कहने’ की हिम्मत का टूटना उस नैतिक साहस के संकट की ओर संकेत करता है, जो किसी भी स्वस्थ समाज की आधारभूमि होता है।
इसी भावधारा का विस्तार “कविगण, लेखक वृन्द / और सब / कलाकार हैं मौन” में मिलता है। कवि साहित्य और कला को केवल सौंदर्य-सृजन का माध्यम न मानकर सामाजिक चेतना का प्रहरी भी मानता है। “बस! दो-चार नाम / बलिदानी, / और बचा है कौन?” में प्रतिरोध की विरलता के प्रति कवि की व्यथा मुखर होती है। यह प्रश्न रचना को व्यक्तिगत शिकायत से ऊपर उठाकर व्यापक सामाजिक आत्ममंथन का रूप देता है। कथन की यह सीधी और स्पष्ट शैली नवगीत को जन-संवाद के निकट ले आती है।
“निरे गंवार / प्रतिष्ठित होते चले गये / छले गये जनसाधारण की / किस्मत फूट गई” में सामाजिक विडंबना और जनपीड़ा साथ-साथ उपस्थित हैं। यहाँ कवि उस स्थिति की ओर संकेत करते हैं जहाँ विवेक, योग्यता और जनहित की अपेक्षा बाहरी प्रतिष्ठा और प्रभाव को महत्व मिलने लगता है। इसके प्रतिफलस्वरूप जनसाधारण के छले जाने की अनुभूति सामने आती है। इन पंक्तियों में व्यंग्य के साथ आम आदमी के प्रति कवि की आत्मीय संवेदना भी स्पष्ट होती है।
गीत का एक अत्यंत सशक्त बिंब “न्याय भागकर जान / के लिए / छिपता फिरता है” में उभरता है। न्याय का मानवीकरण इसे जीवंत और प्रभावशाली बना देता है। इसके साथ “अन्यायी का / राज तिलक / सिंहासन करता है” व्यवस्था की उलटबाँसी को तीखे रूपक में व्यक्त करता है। न्याय का भयभीत होकर छिपना और अन्याय का प्रतिष्ठित होना एक ऐसी विडंबनापूर्ण स्थिति रचता है, जो पाठक को गहरे आत्ममंथन की ओर ले जाती है।
“तानाशाही के कारण / बर्बादी, बेचैनी / कुर्बानी से हासिल / वह आजादी छूट गई” में वर्तमान की बेचैनी इतिहास की स्मृति से जुड़ जाती है। ‘आजादी’ यहाँ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का बोध नहीं कराती, बल्कि उन लोकतांत्रिक, मानवीय और नैतिक मूल्यों का भी प्रतीक बनती है जिन्हें असंख्य बलिदानों से अर्जित किया गया। इस प्रकार कवि स्वतंत्रता को एक जीवित मूल्य के रूप में देखता है, जिसकी रक्षा निरंतर सामाजिक जागरूकता से ही संभव है।
अंतिम अंतरे में “खून माँगती है / धरती / इतिहास खोलकर देख” जैसी पंक्तियाँ रचना के चेतावनीपूर्ण स्वर को और गहरा करती हैं। इसके बाद प्रयुक्त “खूनी अभिलेख” का बिंब विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इतिहास यहाँ महज बीती घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक जीवंत साक्ष्य बन जाता है। संघर्ष, अत्याचार और बलिदान की स्मृतियाँ मिटती नहीं—यह भाव पाठक को इतिहास के प्रति सजग रहने और उससे सीख लेने की प्रेरणा देता है।
समापन में “निरे स्वार्थ से / कोई जीत नहीं होती” गीत की वैचारिक परिणति के रूप में सामने आता है। कवि स्वार्थ को किसी स्थायी विजय का आधार नहीं मानता और सामूहिक मूल्यों के क्षरण को व्यापक मानवीय क्षति के रूप में देखता है। “हमको तुमको नंगी-सी / बेमानी लूट गई” में ‘लूट’ का भाव केवल भौतिक क्षति तक सीमित न रहकर उन साझा मूल्यों और विश्वासों के क्षरण तक विस्तृत हो जाता है, जो समाज को भीतर से जोड़ते हैं। अंतिम बिंब की अर्थ-व्यंजना अपेक्षाकृत खुली है, जिससे पाठक उसे अपनी संवेदना और संदर्भ के अनुसार ग्रहण कर सकता है।
भाषा की दृष्टि से यह नवगीत सरल, सहज, जनोन्मुख और संवादपरक है। कवि ने अनावश्यक शब्दाडंबर से बचते हुए ‘बुद्धिजीवी’, ‘सच’, ‘न्याय’, ‘आजादी’, ‘तानाशाही’ और ‘स्वार्थ’ जैसे प्रचलित शब्दों को वैचारिक ऊर्जा प्रदान की है। प्रश्नवाचकता, संबोधन, व्यंग्य, मानवीकरण और बिंब-विधान इसके प्रमुख शिल्पगत आधार हैं। विशेषतः “न्याय भागकर…”, “आजादी छूट गई” और “खूनी अभिलेख” जैसी अभिव्यक्तियाँ गीत की स्मृति में देर तक बनी रहती हैं। कहीं-कहीं कथन की प्रत्यक्षता विचार को काव्य-संकेत से अधिक प्रमुख बना देती है, किंतु नवगीत की जनपक्षधर और संवादधर्मी प्रकृति में यही स्पष्टता इसकी संप्रेषणीयता को सुदृढ़ करती है।
समग्रतः “अरे! बुद्धिजीवी” एक जागरूक, प्रतिबद्ध और समय-सापेक्ष नवगीत है, जिसमें कवि ने अपने समय की विडंबनाओं को केवल दर्ज नहीं किया, बल्कि उनके प्रति प्रतिरोध और आत्ममंथन की चेतना भी जगाई है। इसकी प्रमुख शक्ति इसके जनसरोकार, नैतिक आग्रह, इतिहास-बोध, तीखे व्यंग्य और सहज अभिव्यक्ति में निहित है। रचना पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि साहित्य, कला और बुद्धि की सार्थकता केवल सृजन में नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सत्य के पक्ष में खड़े होने में भी है। इसी चेतना के कारण यह नवगीत अपने समय से संवाद करता हुआ एक सार्थक और प्रासंगिक साहित्यिक हस्तक्षेप बन जाता है।
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की जीवन-दृष्टि को आत्मसात करने वाले डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून 1979) हिंदी और अंग्रेजी के द्विभाषी कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक एवं संपादक हैं। वे ‘पूर्वाभास’ और ‘क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज्म’ के संपादक तथा आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वर्तमान में वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत ‘नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति’ के मास्टर ट्रेनर भी हैं।


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