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मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

साक्षात्कार : मनुष्यता को बचाये रखना ज़रूरी है-वेदप्रकाश अमिताभ


डॉ वेदप्रकाश 'अमिताभ'


०१ जुलाई १९४७ को अलीगढ़ (उ.प्र.) में जन्मे डॉ. वेदप्रकाश 'अमिताभ' का नाम हिंदी साहित्य जगत में स्थापित रचनाकारों में शुमार है। आपकी रचनाएँ प्रत्येक दृष्टि से अमानवीयकरण का विरोध दर्ज करतीं हुईं मनुष्यता की पक्षधर दिखाई पड़तीं हैं । आपके द्वारा सृजित 'बसंत के इंतजार में', 'कितनी अग्नि परीक्षाएं' आदि प्रमुख काव्य-संग्रह, 'दूसरी शहादत', 'दुःख के पुल से', आदि कहानी-संग्रह, 'तीसरी आजादी का सपना' व्यंग-संग्रह, 'उपन्यासकार जेनेन्द्र एवं उनका त्यागपत्र', 'हिंदी कहानी: एक अंतर्यात्रा', 'हिंदी साहित्य: विविध प्रसंग', ''राजेंद्र यादव: कथा यात्रा', 'हिंदी कहानी के सौ वर्ष', 'नयी कहानी: प्रतिनिधि हस्ताक्षर', 'समकालीन काव्य की दिशाएं', 'रामदरश मिश्र:रचना समय','समकालीन कविता का परिदृश्य','हिन्दी उपन्यास की दिशाएं','हिंदी कहानी का समकालीन परिदृश्य' आदि समीक्षात्मक ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं । आपने लगभग दो दर्जन कृतियों का संपादन किया है । आकाशवाणी के मथुरा, आगरा, रांची, जलगाँव, रीवा, दिल्ली आदि के केन्द्रों से आपकी वार्ताएं प्रसारित हो चुकी हैं । दूरदर्शन के कई कार्यक्रमों में आपकी भागीदारी रही है ।  चर्चित व स्थापित पत्रिका 'अभिनव प्रसंगवश' के आप संपादक हैं । आपके साहित्यिक अवदान के परिप्रेक्ष्य में आपको ब्रजसाहित्य संगम मथुरा द्वारा ब्रजविभूति, विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ द्वारा विद्यासागर की उपाधि, साहित्य श्री सम्मान (अलीगढ़),  तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। संपर्क - डी १३१, रमेश विहार, निकट ज्ञान्सरोवर, अलीगढ़ (उ.प्र.)- २०२००१, मो: ०९८३७००४११३। इस विख्यात रचनाकार से साहित्य  के अनछुए पहलुओं पर बातचीत की है अवनीश सिंह चौहान ने:-

 

चित्र गूगल से साभार 
आपने क़लम का सफ़र कब और कैसे शुरू किया था?
जहाँ तक याद आता है लिखने की शुरूआत 1964-65में हुई। तब मैं डिग्री कॉलेज गाजीपुर में पढ रहा था। मेरे गुरुजन-जितेन्द्रनाथ पाठक तथा डॉ. विवेकीराय तब रचनाकार के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनसे बहुत प्रेरणा मिली। सार्वजनिक रूप में जो पहली रचना याद आती है वह एक कहानी थी। हाँ उस पर मुझे द्वितीय पुरस्कार मिला था। बाद में मथुरा आया तो यहाँ होने वाली गोष्ठियों ने उकसाया। कई मुक्तक और गीत लिखे गए।
जीवन जगत की अनुभूतियों को रचनाओं में पिरोने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
मेरे गाजीपुर स्थित आवास में पुस्तकों की एक अलमारी थी। उसमें कुछ साहित्यिक पुस्तकें भी थीं। याद आता है कि भारत भारती थी और प्रेमचन्द का एक कहानी संग्रह भी। इन्हें पढकर कुछ लिखने का मन बनता था। आज जीवन जगत से प्राप्त अनुभवों-विचारों से प्राप्त कोई उत्तेजना कोंध या खरोंच किसी रचना की नींव बन जाती है। प्रेरणा अधिकतर परिवेश से मिलती है, कुछ भूमिका आत्ममंथन की भी होती है। शुरू में गोपालदास नीरज, सोमठाकुर, भारतभूषण आदि गीतकारों ने आत्मकथा की अभिव्यक्ति के लिए गीतविधा की ओर उन्मुख किया था। बाद में प्रेमचंद, प्रसाद, जैनेन्द्र, यशपाल, अमृतलाल नागर जैसे ग्रेट मास्टर्स ने भी रास्ता सुझाया। अब लगता है कि बिना लिखे नहीं रहा जा सकता है। लेखन अनेक प्रकार के तनावों से मुक्ति देता है।
क़लम के प्रारंभिक प्रयोग से लेकर एक सफल क़लमकार बनने तक में आपको किस तरह का संघर्ष करना पड़ा?
सफल क़लमकार बना कि नहीं यह विवाद का विषय है। लेकिन इस रचना-यात्रा में बहुत खट्टे-मीठे अनुभव मिले है। यदि आप किसी विचारधारा विशेष के अंध अनुगामी है या किसी राजनीतिक दल या लेखक संगठन के बंधुआ मज़दूर है तो शुरू में जड़ें ज़माने में मदद मिलती है। हालांकि प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास ही भविष्य में काम आते हैं। शुरू में लघु पत्रिकाओं में भी रचनाएँ नहीं छपती थीं। अध्यापक था तो समीक्षायें लिखने लगा। ‘समीक्षा’में डॉ. गोपालराय ने और ‘संचेतना‘ में महीप सिंह ने छापकर आलोचक होने का संतोष दिया । अब दर्जनों किताबें हैं कई सौ पुस्तक समीक्षायें हैं लेकिन कई जगह से अब भी रचनायें लौट आती है। कहें तो लौटाने का तो प्रचलन और शिष्टाचार शायद बचा ही नहीं है। महीना दो महीना बीतने पर समझ लेता हूँ कि रचना अस्वीकृत हो गयी है। जहाँ सम्पादक कतई परिचित नहीं है वहाँ रचना के स्तर और मूल्य के बूते पर छपना अच्छा लगता है। विश्वास होता है कि कुछ लोग वस्तुनिष्ठ हैं, ईमानदार हैं। पुस्तकों के प्रकाशन का हाल बहुत ख़राब है। मेरे एक मित्र प्रकाशक हैं वे कृपा करके किताबें छाप देते है किसी तरह की रायल्टी न देने की शर्त है। बड़े प्रकाशक महत्व नहीं देते। मझोले प्रकाशक भी उम्मीद करते हैं कि लेखक अपने पैसों से पुस्तक छपवायें और वे उन रुपयों के बराबर मूल्य की पुस्तकें देकर उसे धन्य करें। इन्हीं स्थितियों में मुझे अपनी कविता पुस्तक ‘कितनी अग्निपरीक्षायें‘ ख़ुद प्रकाशित करनी पड़ी थी।
आपने अपना अमूल्य समय शिक्षण और साहित्य सेवा में खपाया है और अब अस्वस्थ के बाबजूद भी सर्जना-विवेचना का दांडी मार्च कर रहें हैं। ऐसा कैसे संभव है?
मैनें कहा न कि और कोई व्यसन तो मेरा है नहीं । मुझे पढना-लिखना अच्छा भी लगता है। एक पत्रिका ‘अभिनव प्रसंगवश’भी निकालता हूँ। यह अवश्य है कि भौतिक उपलब्धियों के मामले में पिछड़ गया। लेकिन साहित्य सेवा थोडा भारी और गौरवपूर्ण शब्द है। डांडी मार्च तो और भी अनुपयुक्त है। मैं तो इस अध्ययन-लेखन के मार्ग पर लड़खड़ाता हुआ ही आगे बढ रहा हूँ। कोई बड़ी उपलब्धि-सर्जनात्मक और कोई जोख़िम मेरे खाते में नहीं है।
आस पास के जीवन ढर्रे और उसके किलकारते कराहते स्वरों को मुखरित करती आपकी कविताएँ जहाँ पाठक से आत्मीय संवाद करती हैं वहीं आपकी समीक्षात्मक रचनाएँ चिंतन को नया आयाम देती है। आप दोनों में तालमेल कैसे बिठाते हैं।
चाहें कविताएँ हों या कहानियाँ मैने उनका कथ्य अपने आस-पास से ही जुटाया है। मेरे ‘भूकंप’, ‘कितनी अग्निपरीक्षायें’, ‘प्रश्न कंकड़ी’आदि में स्त्री की नियति ग़रीबी आदि कुरूपतायें मिलेंगी। ‘दंगा’, ‘नरक’जैसी कविताओं में स्पष्ट साम्प्रदायिकता निषेध है। कविताओं में किसी तरह की जटिलता नहीं है, न विषयवस्तु में न रूपबंध में। इसलिये पाठक के साथ संवाद की स्थिति बनने में सुविधा होती है। जहाँ तक समीक्षाओं का प्रश्न है मेरा आग्रह वस्तुनिष्ठ विवेचन पर रहता है। न मैं तेजाब में क़लम डुबाकर लिखता हूँ न शहद से। कोशिश होती है कि कृति और कृतिकार के सकारात्मक पक्ष सामने आएँ। दोंनों में तालमेल इसलिए बैठ जाता है कि कोई पूर्वग्रह या मतवाद लेकर लिखना मेरी प्रकृति नहीं है। मैं उत्तेजक मुहावरे नहीं उछालता। संवेदना और वैचारिकता की संश्लिष्टता आपको मेरे लेखन में बराबर मिलेगी चाहे सर्जना हो या समीक्षा।
जहाँ विश्व की कई भाषाएँ मर रही हैं वहीं हिन्दी अपना मौलिक स्वरूप रखने में कहाँ तक सक्षम है?
हिन्दी के साथ ऐसा कुछ होने वाला नहीं। हिन्दी जन सामान्य की भाषा है जन संघर्ष का स्पंदन है। यह अमरबेल की तरह नहीं बढी और वही यह कभी शासन सत्ता की मुखापेक्षी ही रही है। इसने अपना रास्ता धीरे-धीरे प्रशस्त किया है और अपनी जडे़ं बहुत गहरी जमायी हैं। साथ ही इसमें समयानुकूल चीज़ों को आत्मसात करने की अपूर्व क्षमता भी है। चूँकि आज बदलाव हर क्षेत्र में हो रहे हैं इसलिए हिन्दी के मौलिक स्वरूप में थोडा बहुत रूप परिवर्तन संभव है। किन्तु इसका यह परिवर्तन-परिष्करण हमारी भाषा के लिए हितकारी ही होगा।
आज विश्व में भाषाओं के क्षेत्र में व्यापक बदलाव देखा जा रहा है। भारत में भी अँगरेज़ी भाषा का क्षेत्र पहले से कहीं अधिक बढा है ऐसे में हिन्दी भाषा के सामने कौन सी चुनौतियाँ हैं?
यह सच है कि विश्व में असरदार भाषाओं जिनमें अँगरेज़ी भी एक है का क्षेत्र बढा है। इसके बाबजूद भी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली दस शीर्ष भाषाओं में हिन्दी भी शामिल है। इसका अपना क्षेत्र है अपना प्रसार है। यह अँगरेज़ी या अन्य किसी भाषा की विरोधी नहीं है। यह तो सबके साथ सामंजस्य स्थापित करके चलने वाली भाषा है। और जहाँ तक हिन्दी के लिये चुनौतियों की बात है तो आज हिंग्लिश के बढते प्रभाव से हिन्दी की लिपि को सबसे बडी चुनौती है। कहीं एस.एम.एस. और कम्प्यूटर पर इंग्लिश के बढते चलन के कारण हिन्दी लिपि की उपेक्षा न होने लगे। हालाँकि अँगरेज़ी कम्प्यूटर एवं तकनीकी क्षेत्र की ज़रूरी भाषा बनी हुई है, हिन्दी का भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महत्व बढ़ा है। फिर भी ज़रूरत इस बात की है कि हिन्दी भाषी लोग अपनी भाषा पर पूर्ण विश्वास रखते हुए ऐसा संकल्प लें जिससे विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में भी इस भाषा का रचनात्मक प्रयोग हो सके और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारी हिन्दी अन्य शीर्ष भाषाओं की बराबरी कर सके।
हिन्दी के प्रचार प्रसार में हिन्दी दिवस (14सित.) और हिन्दी सप्ताह (14से 20सित.) मनाने का कितना औचित्य है?
इसे हमें हिन्दी के राष्ट्रीय पर्व के रूप में देखना चाहिए और इसमें प्रत्येक हिन्दी भाषी को अपनी सहभागिता ख़ुद ही सुनिश्चित करनी चाहिए। मेरा तो मानना यह है कि इस हेतु एक ही दिवस या सप्ताह क्यों? वर्ष भर हमें उसी भावना उसी सोच से काम करना चाहिए, ताकि हिन्दी भाषा के शब्द एवं संसार से हिन्दी प्रेमियों को पूरी आत्मीयता एवं विश्वास के साथ जोडे रखा जा सकें।
सूचना एवं संचार क्रांति के इस युग में कविता-गीत आदि की प्रवृत्तियाँ कौन सी हैं और कितने वजन के साथ उदघाटित हो रही हैं?
वर्तमान में कविता का कैनवास और व्यापक हुआ है क्योंकि उत्तर-आधुनिकता, भूमंडलीकरण, नवपूँजीवाद, बीभत्स बाज़ारवाद आदि ने कवि को अनेक नयी चिंतायें सौंप दीं हैं। हिन्दी कविता विमर्शों के जकड़न से छूटने की कोशिश में है, लेकिन मूल समस्याओं से उसका ध्यान हटा नहीं है। आज भी लोकतंत्र का वर्तमान रूप सर्वाधिक चिंतित करता है। कुछ भी लिखा जाए मनुष्यता की चिंता से वह अलग नहीं होगा। राधेलाल बिजधावने की एक कविता की कुछ पँक्तियाँ गवाह हैं कि आज के कवि चीज़ों को कुछ अलग ढंग से देख रहें हैं-‘जब भी मैं बांध का पानी पीता हूँ/मुझे अंदर ही अंदर महसूसता है कि/डूब में आये ज़मीन के मालिकों का/खून पसीना पी रहा हूँ‘।
समीक्षकों-समालोचकों को परजीवी कहा गया है। आपको क्या लगता है?
इसमें संदेह नहीं है कि आलोचना सर्जना पर आश्रित है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह मत सही है कि सर्जना ही सत्य है। लेकिन आलोचकों को परजीवी कहना कुछ सख्त बात है। आलोचक सर्जक का ख़ून तो नहीं चूसता है न। सैडिस्ट किस्म के आलोचकों को जानें दें तो प्रायः आलोचक की भूमिका रचना के हित में होती है। मल्लिनाथ न हुए होते तो कालिदास की रचनाओं का सौन्दर्य पाठकों-आस्वादकों तक कुछ कम ही पहुँचता। निराला के महत्व को रामविलास जी ने उजागर किया। क्या उन्हें परजीवी कहा जा सकता है? आलोचना भी एक तरह की सर्जना ही है तो सर्जना और आलोचना के बीच संवाद का संबंध है न कि विवाद का।
जो रचेगा वही बचेगा की जगह जो बिक्रेगा वही टिकेगा की धुन इन दिनों ख़ूब सुनायी दे रही है। यह कितनी प्रासंगिक है?
बाज़ारवाद में ईमान, विचार, संवेदना सबके बिक जाने की स्थितियाँ पैदा कर दी हैं। साहित्य इस प्रवृत्ति से कहाँ तक बचेगा? हैरी पॉटर ख़ूब बिका। हालाँकि यह निश्चित नहीं है कि उसे ख़रीदने वालों ने उसे पढ़ा भी कि नहीं। वैसे यदि साहित्य को बाज़ार मिल जाए तो मुझे ख़ुशी होगी। आज तो स्थिति यह है कि नए रचनाकारों को अपनी जेब ढीली करके पुस्तकें छपवानी पड़ती हैं। प्रकाशक कृपा करके छाप देते हैं तो रायल्टी नहीं देते। कुछ समय पहले निर्मल वर्मा की कृतियों की रायल्टी का मुद्दा उठा था। जब निर्मल जी का यह हाल हुआ था तो साधारण लेखक की क्या नियति है अंदाज़ा लगा सकते हैं।
नयी पीढी के क़लमकारों के लिए आपका संदेश?
नयी पीढी समय-समाज के प्रति सजग हों, प्रतिरोध-प्रतिवाद के लिए सक्षम हों, रचना में और जीवन में भी लेकिन अपनी संवेदनशीलता अर्थात मनुष्यता को बचाना उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए। मूल्यों में दृढ विश्वास और सकारात्मक जीवन दृष्टि का होना बहुत ज़रूरी है।


 डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ
डी- 131, रमेश विहार, निकल ज्ञानसरोवर
अलीगढ़ (उ.प्र.) - 202001
मो.- 9837004113
 
 अवनीश सिंह चौहान
ग्राम/पो.-चन्दपुरा (निहाल सिंह),
जनपद-इटावा (उ.प्र.)-206127

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Dr Ved Prakash Amitabh-Interview
uhan@gmail.com

 

2 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ वेद प्रकाश अमिताभ से यह साक्षात्कार बेहद पसंद आया. बहुत सारी जानकारियाँ मिलीं हिन्दी साहित्य के बारे में.

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  2. साक्षात्कार प्रेरणास्पद है लेखक ने जिस सरलता और सहजता से विचार रखें.वह प्रभावित कर गया.

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