पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

शनिवार, 18 जून 2011

सत्येन्द्र तिवारी : एक मानव-एक गीतकार

सत्येन्द्र तिवारी

जन्म: 26 दिसंबर 1947
शिक्षा: स्नातक 
संपर्क: 20/71 , गुप्ता बिल्डिंग, 
रामनारायण बाज़ार , कानपुर-208001. 
मो.09935366560
कृति: मौसम मौसम मन (प्रकाशन के इंतज़ार में). 
सम्मान: प्रथम पुरुष सम्मान , उत्तरायण, लखनऊ, उ.प्र.

मिल-जुलकर/ अंतरे उठाए
मुरकी से, मीड से सजाया
और की नहीं/ अपनी रची हुई
हमने हर बंदिश को गाया
कोमल गांधार की तरह
हम तुम मिले/ और गीत बन गये।

हम तुम यानी कि कवि और उसकी काव्य शक्ति दोनों का मधुर मिलन, अंतरों का बनना और बंदिश को गुनगुनाकर देखना- यह है गीत प्रक्रिया जिसका परिणाम है गीत का बन जाना। इस 'प्रोसेस' से उपजी रचना गीत ही होगी- ऐसा विश्वास है गीत पुरुष दादा माहेश्वर तिवारी जी का। गीत सृजन की इस प्रक्रिया से भलीभांति परिचित हैं गीतकार श्री सत्येन्द्र तिवारी जो अपने आपको अकिंचन मानते हुए कहते हैं-
जन्म दिया है माटी ने
दीपक हूँ माटी का प्यारे
उजियारे से लीप रहा हूँ
अपनी क्षमता भर चौबारे।
(प्रेस मेन, 26 दिसंबर 2009)

उजाला बांटना चाहता है यह गीतकारक। किन्तु उसे पता है अपनी सीमाओं का- अपनी क्षमताओं का। तभी तो वह अपनी उपमा दीपक से देता है। यद्यपि वह अपने आपको दीपक जैसा मानता है, वह अंधियारे के साम्राज्य को चीरने और उसे चुनौती देने का पूरा साहस रखता है। शायद इसीलिए उनके गीत आज के जीवन के इर्द-गिर्द घूमते हैं। रिश्तों में आयी छीजन और संवादहीनता उन्हें इस तरह से आहत करती है कि वह कह उठते हैं - 
प्रिय लगने वाले सब रिश्ते
लगता कोमा से जागे हैं
घुटन भरी कारा से छूटे
सुधियों के पथ पर आगे हैं
उन अपनों के मन भावों को
अब तो बस व्याकुल रहता हूँ।
(परमार्थ 12, जनवरी  2011)

सत्येन्द्र तिवारी की प्रबल इच्छा है  कि अपनों का स्नेह और सानिध्य मिलता रहे जिससे जीवन सुखद बना रहे। हाँ, इसके लिये कुछ प्रयासों की आवश्यकता को भी महसूस करते हैं आप। कुछ-कुछ मेरे अग्रज योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' की तरह ही-
बंद खिड़कियाँ दरवाजे सब
कमरों के खोलें
हो न सके जो अपने, आओ
हम उनके हो लें
ध्यान रहे, ये पुल कोशिश के
ना अधबने रहें।
(परमार्थ 12, जनवरी 2011)

आज की प्रतिकूल जीवन स्थितियों के कारणों को भलीभांति जानते हैं सत्येन्द्र तिवारी- कारण है जिन्दगी का बीमार होना, बगुला भगतों की बाढ़ आना, ऊहापोह  की स्थिति होना, शोषकों का फलना-फूलना आदि। उदहारण दृष्टव्य है-
पांव बंधे हैं चलने वाले
पड़ी समय की जंजीरें हैं
नागफनी राहों में फ़ैली
दर्द चुभन की तस्वीरें हैं
बगुलों के हाथों रख गिरवीं
ढोती रही करार जिन्दगी।
(समांतर, मार्च 11)

उनकी यह वैचारिकी गीतकार ब्रजभूषण सिंह गौतम 'अनुराग' से काफ़ी मेल खाती है-
आवा जैसी सुलग रही है
भीतर घनी उदासी
बिना छांट के दुखी जिन्दगी
है प्यासी की प्यासी
हारे हुए जुवारी जैसे
हम हर पल पछताते।
(परमार्थ 11, दिसंबर 2010)

क्योंकि आज हमारा जीवन बाजारीकरण और शहरीकरण से बुरी तरह प्रभावित हो चला है। तभी तो सत्येन्द्र तिवारी कहते हैं- "ये शहर है नया या कि मैं अजनबी/ ये मुझे मैं इसे जानता ही नहीं।" बाजारवाद के बढ़ते दुष्प्रभावों को गीतकार आनंद कुमार 'गौरव' कुछ इस तरह से स्वीकार करते हैं- "बिकने के चलन में जहाँ/ चाहतें उभारों में हैं/ हम उन बाज़ारों में हैं।"

कुल मिलाकर, संबंधों को जीने वाले, मृदुभाषी एवं साहित्यसेवी सत्येन्द्र तिवारी के गीत न केवल मन को गुदगुदाते हैं, बल्कि प्रेरित भी करते हैं जीवन को जीवन की तरह जीने के लिए. तभी तो उनका यह प्रेरक स्वर आशा एवं विश्वास का संचार करता है-
गीत, छन्द/ अनुबंध, गंध
संबंध परागों के
अग्नि, अश्क/ अनुरोध वचन
संग बादल रागों के।
उलझन के अंधियारे में हम
ऐसे दीप लिए
होते रहे प्रवाहित
लय की धारा संग जिए।
(दैनिक जागरण, 1 जून 1997)

रविवार (19 जून)  को विप्रा साहित्य कला मंच (संयोजक- आनंद कुमार 'गौरव') श्री सत्येन्द्र तिवारी (साथ में श्री शचीन्द्र भटनागर) को सम्मानित करने जा रही है, अतः उक्त अवसर पर मेरे द्वारा यह आलेख पढ़ा जाना है और उनके सम्मान में उनके चार गीत आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ:-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
1. जब ख़त आते हैं

शब्दों से बतियाने वाले
सभी सिलसिले टूट रहे हैं
यदा-कदा जब ख़त आते हैं
सौ-सौ बार उन्हें पढ़ता हूँ।

पूछा जाना कुशल क्षेम का
प्रश्न स्वयं में अकुलाता है
उत्तर अंतर्पुर में गुपचुप
विगत याद कर अंसुआता  है
आख़र-आख़र बिम्ब उम्र के
दरके शीशे मैं मढ़ता हूँ।

प्रिय लगने वाले सब रिश्ते
लगता कोमा से जागे हैं
घुटन भरी कारा से छूटे
सुधियों के पथ पर आगे हैं
उन अपनों के मन भावों को
अब तो बस व्याकुल रहता हूँ।

उन्नति की आपाधापी में
ख़ुद की ही पहचान खो रही
चक्रव्यूह में चकाचौंध के
गाँव-घरों से दूर हो रही
दृष्टि नयन की रहे द्वार पर
सुखद प्रतीक्षा ही करता हूँ।

भूले बिसरे घर-द्वारे पर
पत्र डाकिया जब देता है
ऐसा लगता कोई अपना
मुझे बांह में कस लेता है
अहसासों में इन खुशियों के
सतरंगी धनु-सा रचता हूँ।

2. थके न अपने पाँव

तन यायावर, मन बंजारा
थके न अपने पाँव
न देखे धूप, न देखे छाँव।

मौसम-मौसम खेल खिलौने
लादे घूमें खूब
गीत प्रीत के गाता चलता
सुधि-धारा में डूब
बिन मांझी लहरों से जूझे
ढूँढ रही तट नाव।

नदी अनमनी व्यथा तटों की
बांचे चंचल प्रीत
झूम-झूम बरखा संग सावन
गाये सोंधे गीत
बादल-बादल रहा भटकता
दिये नियति न दाँव।

सुखद समीरण संस्पर्शों के
सिहरन भरे प्रसंग
रात जुन्हाई हरसिंगार की
पाती पढ़े उमंग
मिली न अब तक सघन चांदनी
खुशबू वाला गाँव।

अधरों पर प्यासे पलाश की
दहकी मृदुल लगन
तपन ओढ़कर मरु में झिलमिल
रूपित रहें सपन
मन-मृग मचल रहा छौने-सा
मिले न निश्छल ठाँव।

3. बीमार ज़िन्दगी

कर्तव्यों की गठरी बाँधे
टूटी झुकी पीठ पर लादे
घिसट रही बीमार ज़िन्दगी।

पाँव बंधे हैं चलने वाले
पड़ी समय की जंजीरें हैं
नागफनी राहों में फैली
दर्द चुभन की तस्वीरें हैं
बगुलों के हाथों रख गिरवीं
ढोती रही  करार ज़िन्दगी।

नये शिखर नित चढ़ती जाती
लुटी हाँथ की अपनी रोटी
साँस उखड़ती चलना मुश्किल
पहुंचेगी जाने किस चोटी
फिसल न जाएँ डर गिराने का
डाकू रहे डकार ज़िन्दगी।

आँसू झलक रहे आँखों से
फिर भी मरा आँख का पानी
कौन कहे किससे ये पीड़ा
हम सब ने की है नादानी
नाव पड़ी मझधार हमारी
है टूटी पतवार ज़िन्दगी।

4. बैठी फिर बूढ़ी माँ

अपने घर के ठीक सामने
लेकर बैठी फिर बूढ़ी माँ
हरे-हरे मकई के भुट्टे।

देख-देख कर सेंक रही है
जाने क्या खिड़की में घर की
शायद तुमको देख रही है
भरी-भरी मधु-प्रीत नज़र की
मेघ घिरे मुस्काई बिजली
लगे बरसने गगन-नैन के
हैं प्रसंग सब मीठे-खट्टे।

पावस के इस प्रिय मौसम में
जाने क्या-क्या भींग गया है
करके क्रूर मज़ाक समय ही
मन का आँगन लूट गया है
छत पर भींग रहे हैं बच्चे
बना पकौड़ी कौन कहे माँ
पीस रहे सूधिया सिल-बट्टे।

इन्द्रधनुष यादों का अंबर
धीरे-धीरे घेर रहा है
सपनों की आँखों को नम कर
अंगुली छुपकर फेर रहा है
ममता का आँचल लहराकर
छटने लगे दर्द के बादल
पिघल-पिघल कर हट्टे-कट्टे।

Four Geet of Satyendra Tiwari

5 टिप्‍पणियां:

  1. Satyendra tewari ji mujhe rubaru mile bina hi sahitya ke madhyam se mere dost ban gaye hain.unka vyaktitva to prerak hai hi,aaj is blog par unhe aur karib se janane ka bhai avnish ne muje suawsar diya.main lekhak-bloger dono ka abhari hun.tewari ji ko saduvad/badhai.aise hi srijanrat rahen aur gyan ki ganga bahate rahen.
    ---RAGHUNATH MISRA,ADVOCATE
    3-k-30,TALWANDI,KOTA-324005(RAJASTHAN)
    Mobile. 09214313946
    E-mail.raghunathmisra@ymail.com

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  2. बहुत प्रभावी रचनाएं हैं सत्येन्द्र जी की ... शुक्रिया इन्हें पढवाने का ...

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  3. namaskaar !
    satyedraa jee ki umdaa rachnaye poadhawane ke liye , aap ko aahbar , aur sadhuwad satyaa jee ko .
    sadar

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