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बुधवार, 22 मई 2013

दूसरी दुनिया यानी औरत की दुनिया- पार्ट 2: डॉ. संवेदना दुग्गल


डॉ. संवेदना दुग्गल

"कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो"- दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों से प्रेरणा लेने वाली डॉ संवेदना दुग्गल ने साहित्य और समाज का फ़लसफ़ा अपने पिता दिनेश पालीवाल से जाना-समझा। पिता जाने-माने कथाकार एवं लेखक और माँ समझदार गृहणी। संवेदना जी का जन्म 25 अक्टूबर 1 9 6 9  को इटावा, उ प्र में हुआ। आपने आगरा विश्विद्यालय से पीएच डी की। शीर्षक था "सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों में शिल्प, भाषा और कथ्य।" वर्तमान में आप दिल्ली पब्लिक स्कूल, द्वारका, दिल्ली में हिन्दी की प्रवक्ता हैं। फेसबुक: http://www.facebook.com/samvedna.duggal

1. हम औरतें क्या करती और क्या सोचती हैं?
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
माना जाता है कि हम औरतें न कुछ करती हैं, न कुछ सोचती है। सिर्फ जीती हैं। बेमतलब, बेमकसद, बेअर्थ, निरर्थक। धरती पर बोझ हैं हम। धरती की नमक। बंजर जमीनों पर बिखरी हुई रेवटे की सफेद चादर। नहीं उगने देती जो धरती पर एक तिनका भी। हम सिर्फ खाती हैं। खोती हैं। देश और समाज के विकास और उत्पादन में हमारा कोई योगदान नहीं है। कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है। हम सिर्फ सुविधाजीवी हैं। अपने लिए, अपनों के लिए ही जीती-मरती हैं। समाज से हमारा कोई सरोकार नहीं है। दीन-दुनिया से हमें कोई मतलब नहीं है। राजनीति की हमें समझ नहीं है। अर्थशास्त्र से हम पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। योज्ञता में हम पिछड़ी हुई हैं। बुद्धि से हम हेटी, कम अक्ल, बेवकूफ और बुद्धू होती हैं। हम रेशम की वह कीट हैं जो अपने चारोंतरफ रेशम के  महीने धागे की कोकून बुनती रहती है और अंततः उसी कोकून में हम बंद हो कर बेआवज, बेशिकायत, बेमतलब, बेमकसद मर जाती हैं। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?
हम औरतें अपनी नसों, रक्त वाहनियों के धागों से दिनरात जिंदगी की उदासियों को, चिंताओं को, दुखों को, पीड़ाओं और परवशताओं को, अपने निविड़ अकेलेपन को, अपने लिए कफन की चादर की तरह बुनती रहती हैं। बनाती रहती हैं हम सर्दियों से बचने के लिए गरम भावनाओं-संवेदनाओं की रुई भरी रजाइयां। दबाए रखती हैं अपनी इच्छाएं, आकांक्षाएं, सपने, खुशियां। घर, पति, बच्चे, परिवार ही होती है हमारी दुनिया। उससे बाहर बहुत कम सोचती हैं हम। घरेलूपन हमारी रग-रग में बसा रहता है। रोमरोम में बसा होता है हमारा अपना घर-संसार। हमारा चौका-चूल्हा, हमारा पूजाघर! उसमें बैठे देवी-देवता, तीजें, व्रत और त्यौहार! बच्चों की इच्छाएं और पतियों की आकांक्षाएं!
सुबह से शाम तक हम परोसती रहती है अपनी पसीने से पकाई रोटियां। दाल-साग-सब्जी। थकानों और हताशाओं के बावजूद हम मुस्कुराती हैं प्रकटतः। उठते रहते हैं तमाम तरह के विचार, खयाल, दिन में भी देखती हैं हम अजीब-अजीब सपने। लेकिन बाहर वहशी दुनिया डरा-धमका कर हमें कर देती है खौफजदा। प्याज की गंठिया की तरह पर्त दर पर्त हम छिपाए रखते हैं अपने को, अपनी भावनाओं को। अपनी मंशाओं, तमन्नाओं, इच्छाओं और सपनों को। भीतर ही भीतर होती है हमारी पूरी दुनिया। अपने में उलझी हुई। अपने में छिपी, अपनी उधेड़-बुन में खोई हुई। बिस्तर पर बिछी चादर की तरह इस्तेमाल होती हैं हम। मैली-कुचैली होने पर फेंक दी जाती हैं, बाथरूम में या फिर वाशिंग मशाीन में। हमारी इच्छाओं को समेट कर , सुखा कर , तहा कर रख दिया जाता है फिर कभी बिछाने के लिए! घिस जाने पर, पुरानी हो जाने या फट जाने पर, हमें पोंछा बना लिया जाता है चमकते फर्शों केा पोंछने केे लिए! बर्तनों में लगी जूठन की तरह मांज कर बहा दिया जाता है हमें नाली में। कचरे की तरह झाड़न से झाड़ कर हमें डाल दिया जाता है कचरेदान में, फेंके जाने के लिए!
थकान बसी होती है हमारे पोर-पोर में। नींद से बोझिल होती हैं हमारी बारंबार मुंदती जा रही पलकें। पर कर्त्तव्यों का कोल्हू हमें न लेटने की अनुमति देता है, न सोने की। न कमर सीधी करने की। चकरघिन्नी बनी मैं सुबह से रात तक नाचती या नचाई जाती रहती हूं सारे घर में सारे लोगों के लिए, फिर भी कहा जाता है, क्या करती रहती हो दिनरात घर में पड़ी-पड़ी! सोती रहती हो या टीवी पर वाहियात सीरियल देखती रहती हो सास-बहू के झगड़ों-टंटों वाले और दिमाग का करती रहती हो कबाड़ा। कचरा भरती रहती हो अपने दिल-दिमाग में! कुछ सोचती भी हो तुम लोग दीन-दुनिया के बारे में ?       

2. गैंगरेप की शिकार सहेली से बातें

नाम नहीं बताऊंगी। मेरे साथ रोज वह चार्टर्ड बस से अपनी नौकरी पर जाती थी। मेरे दफ्तर से बहुत पहले उसका बुक स्टोर आ जाता था। हंसमुख, खुशदिल, हर गम से बेपरवाह। जिंदगी को कभी गंभीरता से न लेने वाली, एक अदद बिंदास लड़की। मैं अक्सर उसके लिए अपनी बगल वाली सीट बस में रिजर्व रखती थी। वह भी बिना ना-नुकुर, बिना किसी औपचारिक धन्यवाद का ज्ञापन किए, मेरी बगल में आराम से बैठ जाया करती थी। कंधे पर लटका बैग गोद में रख लेती। जींस-टाप और बॉब कट वालों उस के चेहरे आकर्षक बनाते थे। लिपस्टिक लगे अधरों पर हर वक्त एक मोहक मुस्कान बिखरी रहती। मुझे अचरज होता, यह लड़की आज के इन भयावह हालातों में भी इतनी खुश कैसे रह लेती है? मेरे बुझे-बुंझे चिंतित चेहरे पर हमेशा एक आतंक, एक परेशानी-सी तारी रहती थी। अपने हाथ के अखबार पर लिखा एक सूक्त वाक्य उसे पढ़वाया--किसी पर विश्वास मत करो। और पुरुष पर तो कतई नहीं! उसी सूक्म्ति के नीचे तमिलनाडु के कांचीपुरम की अदालत का फैसला दिया हुआ थ। न्यायाधीश ने किसी रेप और हत्या के मामले में अपराधी को आजीवन कारावास की सजा देते हुए कहा था--औरत और मर्द को कभी एक साथ अकेले में नहीं रहना चाहिए, भले ही उनके बीच कोई भी रिश्ता हो। अकेले में उनके बीच सेक्स संबंध नहीं होंगे, इसकी आशा हमें नहीं करनी चाहिए। यह अकेले में ही संग रहना अनेक सेक्स अपराधों का कारण बनता है।..

जानबूझ कर यह सब अखबार में मैंने उस बिंदास लड़की को पढ़ाया था। पढ़ कर वह लापरवाही से हंस दी थी--कोई खडू़स होगा फैसला देने वाला! दूसरों के साथ ऐसा होता होगा। मेरे साथ कभी इस तरह अकेलेपन में अपराध नहीं हो सकते। खूब अपने बॉयफ्रेंड के साथ घमती हूं और मस्ती मारती हूं। आजतक कभी ऐसा-वैसा कुछ नहीं हुआ। मैं कहना चाहती थी, आजतक जो नहीं हुआ, वह कल नहीं होगा, इस अनिश्चय से भरी दुनिया में, इसकी क्या गारंटी है? पर उस हवाहवाई लड़की से यह सब कहना बेकार था।

कई दिन वह अपनी नौकरी पर जाने के लिए हमारी बस में नहीं आई तो चिंता हुई। कहां चली गई? बीमार पड़ गई क्या? कोई हादसा तो उसके साथ नहीं हो गया? शाम को आठ बजे लौटती थी वह अपनी किताबों की दूकान से। फिर अपने दोस्त के साथ पार्क में घूमने चली जाती थी। उसके साथ वहां कुछ हल्का-फुुल्का खाती-पीती थी। फिर अपने घर की बस पकड़, घर जाती थी। पता नहीं उसके मां-बाप उसे रोकते‘टोकते क्यों नहीं थे? मुझे अगर जरा देर हो जाती थी तो पतिदेव और बच्चों के दनादन कॉल्स आने लगते थे।

एक दिन अचानक वह मेरी बस में चढ़ी तो मैंने उसे अपनी बगल वाली सीट पर हमेशा की तरह जगह दिलाई--कहां रहीं तुम इतने दिन? और यह क्या हुलिया बना रखी है तुमने? बीमार थीं क्या? मुझे फोन नहीं कर सकती थीं क्या? गले में फंसा कुछ निगलती रही वह काफी देर तक। उसकी आंखें छलछला आईं--बहुत बुरा हुआ दीदी मेरे साथ। वह धीमें स्वर में मेरे कान के पास फुसफुसाई--अपने दोस्त के साथ रोज की तरह एकांत में उस पार्क में बैठी थी कि अचानक चार गुंडे चाकू-कट्टों से लैस, खूंखार चेहरे लिए वहां आ धमके। दोस्त को मारपीट कर वहां से भगा दिया। मेरी दुर्गति कर डाली उन दुष्टों ने। वे तो मुझे जान से मारने की फिराक में थे। मैंने ही उनके हाथ-पांव जोड़े। मानवी होने का वास्ता दिया। यह विश्वास तक दिलाया कि वे लोग जब भी कहेंगे, उनके लिए इसी पार्क में आ जाया करूंगी पर मेरी जान बख्श दें। तीन राजी नहीं थे मेरे प्रस्ताव पर। एक राजी हो गया। उसने तीनों को मना लिया। मेरी जान बच गई। इतने में दोस्त पुलिस को संग लिवा लाया। चारों भागे पर एक पकड़ गया। पकड़ा गया अपराधी वही था जिसने मेरी जान बख्शी थी। पुलिस ने मुझसे पूछा तो मैंने कह दिया--जो भाग गए, असली अपराधी वही थे। इसने तो मेरी सहायता की है। मुझे बचाया है। यह निर्दोष है। उस दिन से मेरा दोस्त अब मुझसे नहीं मिलता। हमारे संबंध समाप्त हो गए हैं। पुरुष ऐसे क्यों होते हैं दीदी? मनुष्य क्यों नहीं होते सारे पुरुष?

The Present Condition of Women- Part 2  by Dr Samvedana Duggal

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा ............!!
    पूरी कहानी दो बार पढ़ गया, मन भर आया ! अभिव्यक्ति जाहिर करने में असमर्थ पा रहा हूँ, अपने आप को ! वैसे भी कुछ अवस्था में शब्दों का मिल पाना काफी कठिन हो जाता है !
    जीवन की कई घटनाएँ चल-चित्र की भांति नज़रों के सामने से गुजरती चली गई ! उपयोगिता तो आखिर फिर भी थी ! ये दीगर बात है कि कोई समझ पाया और कोई नहीं ।संस्कारों के बंधन में बँधी नारी,,,,,,,,!!

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  2. स्त्री जीवन और स्‍त्री मन इस गहराई से ही पढ़ा जाना चाहिए। इन आलेखों में बनावट नहीं, जीवन की बुनावट है इसी से इन्‍हें समझा और देखा जाना चाहिए। मार्मिक प्रस्‍तुति के लिए साधुवाद

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