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गुरुवार, 4 जुलाई 2013

कहानी: पुअर लेनिन! हिटलर को डिनर पर बुलाओ! - डॉ. मनोज श्रीवास्तव

डॉ. मनोज श्रीवास्तव

ऊर्जावान रचनाकार डॉ. मनोज श्रीवास्तव का जन्म 8 अगस्त 1 9 7 0 को वाराणसी, उत्तरप्रदेश, भारत में हुआ। शिक्षा: काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. एवं पीएच.डी.। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं तथा वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रकाशित कृतियाँ: कविता संग्रह- पगडंडियाँ, चाहता हूँ पागल भीड़, एकांत में भीड़ से मुठभेड़। कहानी संग्रह- धर्मचक्र राजचक्र और पगली का इन्कलाब। व्यंग्य संग्रह- अक्ल का फलसफा। अप्रकाशित कृतियाँ: दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास), परकटी कविताओं की उड़ान (काव्य संग्रह) सम्मान: 'भगवत प्रसाद स्मृति कहानी सम्मान-२००२' (प्रथम स्थान), रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान-2012, ब्लिट्ज़ द्वारा कई बार बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक घोषित, राजभाषा संस्थान द्वारा सम्मानित। लोकप्रिय पत्रिका "वी-विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक और दिग्दर्शक। नूतन प्रतिबिंब, राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक। आवासीय पता: सी-६६, नई पंचवटी, जी०टी० रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत। सम्प्रति: भारतीय संसद (राज्य सभा) में सहायक निदेशक (प्रभारी- सारांश अनुभाग) के पद पर कार्यरत। मोबाईल नं: ०९९१०३६०२४९। ई-मेल पता: drmanojs5@gmail.com

रेड लाइट पर घोंघे की चाल से ट्रैफ़िक के सरकने की वज़ह से मिसेज़ भंडारी की नाक पर बैठा गुस्सा उनकी ज़ुबान पर उतर आया। ट्रैफिक पुलिस को चुन-चुनकर गालियाँ देते हुए वह बुरी तरह स्टीयरिंग पर अपने हाथ पटक रही थीं। जैसे ही इंजन बंद कर, उन्होंने बाहर का सूरते-हाल लेना चाहा, उनका मोबाइल बज उठा। वह वापस सीट पर बैठते हुए भन्ना उठीं, "किस हरामी के पिल्ले ने....।" 
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

बहरहाल, फोन उनके पति का था जो यह जानना चाह रहे थे कि आख़िर उनके वापस घर लौटने में और कितना समय लगेगा। मिसेज़ भंडारी ट्रैफिक पुलिस के बजाय अपने पति पर ही भौंक उठीं, "हाँ, सेमीनार से घंटे-भर पहले ही छूट चुकी हूँ; अब यहाँ मंडी हाउस की रेड लाइट पर आधे घंटे से मर रही हूँ। ट्रैफिक खुलते ही घर पहुंचूंगी। अब बार-बार फोन करके मुझे टॉर्चर मत करो।" 

जैसे ही उन्होंने मोबाइल बंद किया और कुछ मिनट बेचैनी में गुजारे, वैसे ही दोबारा रिंग बजने लगी। लेकिन तब तक ट्रैफिक खुल चुकी थी। इसलिए, उन्होंने एक हाथ से गेयर और दूसरे हाथ से स्टीयरिंग सम्हालते हुए कंधे और सिर के बीच मोबाइल को दबा दिया, "हैलो।" 

उधर से अपने पति मिस्टर आरके की आवाज़ दोबारा सुनकर उन्होंने बड़ी बेचैनी में अपनी नाक-भौंह सिकोड़ी। 

"आपको अभी घर आने की ज़रूरत नहीं है। जोशी जी का अभी-अभी फोन आया था। कह रहे थे कि मिसेज़ भंडारी इतनी ज़ल्दी घर कैसे चल गईं। शायद, आपका मोबाइल स्विच्ड आफ़ जा रहा था। इसलिए उनसे आपकी बातचीत नहीं हो सकी। बहरहाल, मंडी हाउस में पत्रकार आपका इंतजार कर रहे हैं। क्या जोशीजी ने बताया नहीं कि सेमीनार के बाद आपको प्रेस कान्फ्रेंस में भी शिरकत करनी है?" उनके द्वारा दिया गया आदेशात्मक निदेश मिसेज़ भंडारी को अच्छा नहीं लगा। 

उनकी बात खत्म होने से पहले ही मिसेज़ भंडारी ने मोबाइल बंद कर दिया और अपनी कार को एम.जी. रोड पर हवा से बात करने के लिए उड़ा दिया। उन्हें लग रहा था कि अगर वह प्रेस कान्फ्रेंस में शामिल न हो सकी तो न जाने क्या ग़ज़ब हो जाएगा। वह मन ही मन कोहली साहब को कोसती जा रही थी, 'आख़िर, उन्होंने मुझे बताया क्यों नहीं कि सेमीनार के बाद प्रेस कान्फ्रेंस भी आर्गनाइज़ किया जा रहा है। शायद, ईर्ष्यावश ही, उन्होंने मुझे नहीं बताया होगा। कोहली को तो बस, अखबारों में अपना ही नाम सूर्खियों में पढ़ने की आदत पड़ी हुई है। मिसेज़ भंडारी के नाम और शक़्ल तक से उन्हें नफ़रत है। तभी तो वह मंच पर खड़े होने के बाद उनकी हर बात को निगेटिव लॉज़िक से काटने की कोशिश कर रहे थे। लिहाजा, उनकी लॉज़िक पर तो विरले ही लोगों ने ताली बजाई। हाँ, कुछेक मर्दों के साथ-साथ वर्मा जी उनकी हाँ में हाँ मिलाते जा रहे थे। चमचागिरी की भी कोई हद होती है। बड़े चले हैं नारी-विमर्श पर सेमीनार आर्गनाइज़ करने। टुच्चे स्साले मर्द...कुत्ते कहीं के...।' 

प्रेस हॉल में कदम रखते हुए मिसेज़ भंडारी ने बड़ी मुश्किल से अपने तमतमाए चेहरे पर बनावटी मुसकराहट बिखेरी। सामने कोहली जी उन्हें प्रेस कान्फ्रेंस के लिए तैयार देख, आश्चर्य में गोते लगा रहे थे जबकि मैडम ने चुटकी ली, "कोई बात नहीं, कोहली सा'ब। आपके नाम के नीचे अगर मेरा भी नाम आ जाए और आपकी फोटो के साथ एक कोने में मेरी भी फोटो छप जाए तो आपको कोई एतराज़ तो नहीं होगा।" 

कोहली मिसेज़ भंडारी का कटाक्ष नहीं पचा सके। 

"मिसेज़ भंडारी! आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं कि मैं आपको नज़रअंदाज़ कर रहा हूँ? मैं भले ही औरत नहीं हूँ; पर, औरतों के हक़ और उनके मुद्दों की मैं जितनी तरफ़दारी करता हूँ, उतना इस देश का कोई मर्द नहीं कर सकता...।" 

कोहली की बात अधूरी रह गई क्योंकि जोशीजी बीच में ही टपक पड़े। 

"मिसेज़ भंडारी! कहाँ चली गई थीं, आप? आपका मोबाइल भी स्विच्ड ऑफ़ जा रहा था। अगर आरके का नंबर नहीं मिला होता तो बेशक, आपके सभी किए-कराए पर पानी फिर जाता। जानती हैं आपके जाने के बाद यहाँ सबकी जुबान पर बस! आपका नाम था? वाह! औरतों की आज़ादी की हिमाकत में आपकी कही गई हर बात पर चर्चाओं का बाजार गर्म था। सारे पत्रकार तो आपको ढूंढ रहे थे। मैंने उन्हें बताया कि आप किसी ज़रूरी काम से बाहर गई हुई हैं। बस, आती ही होंगी। ख़ैर, आप आ गई हैं तो कान्फ्रेंस हॉल में तशरीफ लाइए..." 

जोशीजी के आमंत्रण पर मिसेज़ भंडारी कोहली साहब की बात अनसुनी करते हुए कान्फ्रेंस हॉल में मुखातिब हुईं जबकि कोहली के चेहरे पर अपराध-बोध के साथ-साथ हवाइयां साफ उड़ती नज़र आ रही थीं। हॉल में तो सारा माज़रा ही अलग था। स्टेज़ पर सारे कैमरों का मुँह मिसेज़ भंडारी की ओर था। सेमीनार के बाकी वक्ता एक-दूसरे का मुँह ताक रहे थे। कोहली साहब मन ही मन भुनभुनाते जा रहे थे--'ईट्स ऑल ए वन मैन शो। आइंदा मिसेज़ भंडारी को टोटली अवायड कर दूंगा..." 

'नारी चेतना न्यास' में हर तरह से फ़िसड्डी रहने वाले कॉमरेड यादव के लिए यह अच्छा मौका था। उन्होंने धीरे से कोहली साहब के कंधे पर हाथ रखते हुए कुछ फ़ुसफ़ुसाकर कहा और दोनों ही, पत्रकारों की आँख बचाकर बाहर खिसक लिए। किसी ने उन्हें जाते हुए देख, कटाक्ष किया, "जाओ, जाओ, यहाँ जिसकी तूती बोल रही है, वही रहेगा।" कोहली ने बार-बार अपना सिर घुमाकर उस शख्स को ढूंढने की कोशिश की जो उनके खिलाफ़ ऐसे फ़ितरे कस रहा था। 

बाहर पार्क में यादव और कोहली मिसेज़ भंडारी की निजी ज़िंदगी की बखिया उधेड़ने और उनके विरुद्ध बवंडर उठाने के लिए अपनी निर्माणाधीन टीम को बहुमत में लाने की चेष्टा कर रहे थे। यकीनन, कोई चार-पाँच आदमी भी, जो न्यास के ही सदस्य थे और मिसेज़ भंडारी को किन्हीं कारणों से नापसंद करते थे, उनके पीछे-पीछे आ गए। वे उनकी टीम में शामिल होने के लिए उनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए उनके वफ़ादार पिट्ठू होने की जी-तोड़ कोशिश में लगे हुए थे। 

कोहली ने गुलमोहर के तने से अपनी पीठ सटाते हुए अपनी आँखें यादव जी समेत सभी के चेहरे पर टिका दीं, "मिसेज़ भंडारी को औरतों के वेलफेयर से कुछ भी लेना-देना नहीं है। वह तो 'नारी चेतना न्यास' की सदस्य इसलिए बनी क्योंकि वह अपने शौहर की सताई हुई है। दरअसल, उसकी मानसिकता मर्दों के ख़िलाफ़ है।" 

कॉमरेड यादव ने चुटकी ली, "अरे कोहली सा'ब! वो अपने पति की सताई हुई नहीं है, बल्कि उसका पति उसका सताया हुआ है। अब तुम्हें क्या बताऊं? उसके बदमिज़ाज़ रवैये के चलते उसके बेटे-बेटियों ने भी उससे हमेशा के लिए अपना पल्ला झाड़ लिया है। शर्मा जी तो कह रहे थे कि वह अपने पति के ख़िलाफ़ तलाक़नामा भी फाइल कर चुकी है। कुछ ही महीने में दोनों अलग होने वाले हैं।" 

शर्मा जी का नाम आते ही कोहली की आँखों में शरारत तिरने लगी, "अच्छा, अच्छा, अब समझा कि शर्मा उसका हमदर्द बना, उसके आगे-पीछे क्यों मंडराता रहता है। क्योंकि तलाक के बाद वही उसका ख़ैरख़्वाह बनने वाला है..." 

"अरे सा'ब! इस पूरे कारनामे के पीछे शर्मा का ही हथकंडा काम कर रहा है। उसी वाहियात आदमी ने तो पहले मिसेज़ भंडारी और आरके के बीच नफ़रत की दीवार खड़ी की। फ़िर, उनके बीच मन-मुटाव यहाँ तक बढ़ा दिया कि मिसेज़ भंडारी आरके को अपना पूर्व-जन्म का दुश्मन मानने लगी है और उसे यानी शर्मा को इस जन्म का अपना वफ़ादार फरिश्ता। वही तो उसे खींचकर यहाँ 'नारी चेतना न्यास' तक लेकर आया। आख़िर, शर्मा है भी तो एफीमिनेट, आशिक-मिज़ाज़।" कॉमरेड यादव मिसेज़ भंडारी की धज्जी-धज्जी उड़ा देना चाह रहा था। 

"यादव! मैंने तो सुन रखा है कि मिसेज़ भंडारी के दोनों बच्चे टेस्ट-ट्यूब के जरिए पैदा हुए थे," कोहली ने माहौल सूंघते हुए आरके की नामर्दी का सनद पेश करने के अंदाज़ में हर शब्द को चबा-चबा कर कहा। 

"हाँ, तभी तो उसके दोगली नस्ल के बेटे-बेटियों का मिज़ाज़ उनसे बिल्कुल नहीं मेल खाता। एक अंटापुर में तो दूसरा संटापुर में। सालों हो गए उन्हें आपस में मिले हुए। कहने को भंडारी दंपती पंडित हैं; लेकिन, उनके कर्म इतने गिरे हुए हैं कि कुछ कहते हुए जबान लड़खड़ा जाती है। अब देखो, बेटा यहाँ से अमेरिका कुआंरा गया था और वहीं किसी अंग्रेज़ भंगिन से ब्याह रचा बैठा। माँ-बाप को पूछा तक नहीं।" यादव ने भंडारी के घर का सारा काला चिट्ठा ही खोलकर रख दिया। 

"एक ऐसी औरत को 'नारी चेतना ट्रस्ट' का मेम्बर होने का कोई हक़ नहीं है, जिसका कोई कैरेक्टर ही नहीं है। अरे, उसकी तो अपनी बेटी तक से नहीं बनी। बात-बात में यह जुमला फेंकती है कि औरत ही औरत का दर्द जान सकती है, उसकी ख़ैर-ख़्वाह हो सकती है। पर, वह तो अपनी बेटी की ही गृहस्थी उजाड़ने पर तुल गई थी। अपने दामाद से कभी भी अपने बेटे की तरह पेश नहीं आई। शी इज़ ऐन इन्सेस्टुअस लेडी। तभी तो उसे उसके दामाद के साथ देखकर, आरके का मुंह हमेशा फुटबाल की तरह सूजा रहता था।" कोहली के मुंह में घृणा से थूक भर आया। 

"अब, देखो! सेमीनार में औरतों के लिए इतनी आज़ादी की तरफ़दारी करना जितना कि पच्छिम के मर्द भी नहीं कर सकते, किसी भी प्रकार से अच्छा लगता है क्या?" यादव उत्तेजित-सा हो गया। 

"वह ख़ुद भी पब्लिक के सामने कैसे बहुरुपिए की शक्ल में अधटंगी पोशाक में रू-ब-रू होती है। अरे, औरत के हक के लिए लड़ने आई हो तो सामने औरत के रूप में आओ। औरत की तहज़ीब और दस्तूर का ख़्याल रखो।" 

"अरे, कोहली सा'ब! मिसेज़ भंडारी तो एकदम नंगी औरत है और दुनियाभर की औरतों को नंगी बनाने पर तुली हुई है।" 

"ठीक कहते हैं।" 

"उसकी ग़ैर-मौज़ूदगी में उसके लैपटॉप पर एक बार यूं ही मैंने माउस घुमाया तो मेरा जी मतला गया। अरे, मुझे आश्चर्य हुआ। उस पर लाइव ब्लू फिल्म चल रही थी। तौबा-तौबा! नारी-विमर्श पर इतने जोश-खरोश से शिरकत करने वाली औरत की ऐसी फ़ितरत! उसके पर्स को खोलकर देखो, उसमें किस्म-किस्म के कंट्रासेप्टिव्ज़ मिल जाएंगे..." 

"खास तौर से तब जबकि वह शर्मा के साथ कहीं जा रही हो--किसी बुद्धा गार्डेन में या ताल कटोरा पार्क में।" कोहली ने सीना चौड़ा करते हुए यादव की अधूरी रह गई बात पूरी की। 

इसी बीच उनकी बात में हाँ में हाँ मिलाने वाले पाँचों आदमी गेट से बाहर आती भीड़ को देख, जिसमें मिसेज़ भंडारी और सारे पत्रकार थे, अचानक जाने लगे तो कोहली और कॉमरेड यादव भी सिर के बाल खुजलाते हुए अलग-अलग दिशाओं में बढ़ गए। जोशी जी ने आगे-आगे तेज गति से दोनों को पकड़ लिया। 

"अरे, आप लोग कहाँ गुम गए थे? कान्फ्रेंस हॉल में सारे पत्रकार मिसेज़ भंडारी के बारे में न्यास के वरिष्ठ सदस्यों की राय लेना चाह रहे थे।" 

कोहली ने कहा, "कोई बात नहीं, उनसे कह दो कि वे इंटरनेट चेक कर लेंगे। मैं अपनी राय सभी अख़बारों में इ-मेल कर दूंगा और फ़ेसबुक पर भी डाल दूंगा।" 

"मैं भी..." यादव ने भी कोहली के नक्शे-कदम पर चलते हुए प्रतिक्रिया की। 

कोहली और यादव तेज कदमों से अपनी-अपनी कारों की तरफ़ बढ़ गए। 

रात के कोई ग्यारह बजे मिसेज़ भंडारी ने अपने घर में कदम रखा तो उनका पालतू कुत्ता--हिटलर उनके पैरों से लिपटकर उनका जींसपैंट चाटने लगा। वह सीधे ड्राइंग रूम में दाख़िल हुई--टेबल पर अपना पर्स फेंकते हुए। उन्हें ताज़्ज़ुब हुआ कि बेडरूम से आरके अपने बेटे मुसोलिनी से बातें कर रहे थे और उसके परसों अमेरिका से इंडिया लौटने के कार्यक्रम पर खुशी का इज़हार कर रहे थे। 

मिसेज़ भंडारी ड्राइंगरूम से ही लगभग चींखती हुई बोल उठीं, "अरे ओ लेनिन! देखो, मैं कितनी थक गई हूँ-- मुसोलिनी से बातें बाद में करना। पहले, मुझे पानी पिलाओ!" 

वह अपने पति को आमतौर से लेनिन ही कहकर पुकारती है। दरअसल, उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के नाम ख़ासतौर से तानाशाहों के नाम पर रखे है क्योंकि उन तानाशाहों के नाम से अपने घर के सदस्यों को पुकारकर उन्हें एक ख़ास किस्म का सुकून मिलता है। 

कुछ पल बाद आरके गिलास लिए हाजिर हुए, "डार्लिंग! अपना बेटा मुसोलिनी परसों घर आ रहा है। यह तो एक चमत्कार जैसा है। अभी दो माह पहले ही तो वह यहाँ से स्टेट्स गया था। अब भला! इतनी जल्दी-जल्दी इंडिया आएगा तो उसके बज़ट का क्या होगा?" 

"कोई बात नहीं। अपना बेटा हमसे इतना प्यार करता है तो यह हमारे लिए कितनी अच्छी बात है। वरना, विदेश जाकर वहाँ के ऐशो-आराम में बच्चे तो अपने माँ-बाप को भूल ही जाते हैं।" मिसेज़ भंडारी ने पूरी तन्मयता से अपनी आवाज़ में मिठास घोलने का प्रयास किया। 

"कह रहा था कि इस बार हम दोनों को भी कुछ समय के लिए अमेरिका ले जाएगा।" आरके ने उनसे झिझकते हुए आँखें मिलाईं। 

"अच्छा, ये बताओ, मिस्टर लेनिन! आज क्या-क्या किया?" मिसेज़ भंडारी ने कड़क अंदाज़ में बात बदलते हुए अपनी आँखें उन पर जमा दीं। 

आरके ने बड़ी गहरी सांस ली जैसेकि गहरी साँस लेने से उसकी सारी थकावट मिट जाएगी।। 

"मैडम, आफिस में बहुत थक गया था। टाइपिस्ट और स्टेनो को छोड़ सारे असिस्टेंट सी.एल. पर थे। सो, खुद मैंने सारी फाइलों पर नोटिंग-ड्राफ्टिंग की और उन्हें प्रोसेस किया। स्टेनो ने डिक्टेशन लेने से मना कर दिया और टाइपिस्ट भी दोपहर बाद हाफ़ सी.एल. लेकर घर चला गया। क्या जमाना आ गया है? अफ़सर नाम का जीव अब सबार्डिनेट के तलवे चाटने लगा है। लिहाजा आफ़िस से घर लौटकर पहले मैंने किचेन की सफाई की और बर्तन मांजे। फिर, एक कप चाय बनाई और पी। उसके बाद, ड्राइंगरूम से बेडरूम तक झाड़ू लगाया। गंदे कपड़े वॉशिंग मशीन में डाले और तुम्हारे कपड़ों पर इस्तरी की। कोई आठ बजे, किचेन में घुसा और मूली के पराठे और गोभी-आलू की रस्सेदार सब्जी बनाई। उसके बाद, मैंने आपको फोन किया; तब आप ट्रैफ़िक में फंसी हुई थी। ईश्वर का शुक्रिया अदा करो कि जब आप मंडी हाउस से बहुत दूर नहीं गई थी कि तभी मुझे जोशी जी ने फोन किया और उन्होंने तुरंत आपको पत्रकार सम्मेलन में बुलाया।" 

आरके द्वारा एक सांस में दिए गए काम के ब्योरे को सुनकर मिसेज़ भंडारी ने मुंह बिचकाया, "डियर लेनिन! तुम कितने काहिल हो गए हो? मैंने सुबह जाते समय तुम्हें हिदायत दी थी की तुम आफिस से लौटते ही घर के सभी परदे उतारकर साफ़ कर देना। लेकिन, तुम्हें तो कुछ याद ही नहीं रहता। बिल्कुल कुंजेहन हो गए हो। साठ से पहले ही सठिया गए हो। तुम्हारा मगज़ तो कुछ काम ही नहीं करता। अच्छा! जो कपड़े तुमने वॉशिंग मशीन में डाले हैं, उन्हें साफ किया या नहीं..." 

आरके ने बड़ी मायूसी से अपना सिर नकारात्मक में हिलाया, "नो, मैडम!" 

मिसेज़ भंडारी अपना सिर पीटते हुए बिफ़र उठीं, "क्या करते हो, लेनिन? एक अदद यह भी काम नहीं कर सके? अच्छा, हिटलर को भी न तो नहलाया, न उसके बालों में कंघी की। बाहर जब वह मुझसे लिपटकर मेरा वेलकम कर रहा था तो उसके बदन से इतनी बदबू आ रही थी कि उसे प्यार करने का जी ही नहीं किया। उसे प्यार न कर पाने का कोफ़्त मुझे कितना हो रहा है, यह तुम जैसे संवेदनशून्य आदमी को क्या पता?" 

आरके बड़े अपराध-बोध से अपना सिर झुकाकर कान खुजलाने लगे, "ठीक है मैडम! कल से इस बात का पूरा ध्यान रखूंगा।" 

बेचैनी और तनाव से पीड़ित, मिसेज़ भंडारी सिर पकड़कर सोफ़े पर पसर गई। आरके सोफ़े के नीचे पड़ी उनकी शूज़ ड्राइंग रूम के बाहर शू-रैक में रखकर वापस आए और उनके सिरहाने बैठ गए। 

"डार्लिंग! कहो तो सिर दर्द के लिए कोई एनालजेसिक दे दूं!" उन्होंने पूरी हमदर्दी से उनका सिर सहलाया। 

"नो,नो, कोई एनालजेसिक नहीं। बस, थोड़ा-सा सिर दबा दो।" उसके आदेश में निवेदन की बू तक नहीं थी। 

आरके ने पूरी तन्मयता से सिर दबाते हुए अपना मुंह उनके कान से सटा दिया, "डार्लिंग! कुछ उखड़ी-उखड़ी सी लग रही हो। आज दिन-भर का प्रोग्राम कैसा रहा?" 

"कुछ खास नहीं रहा, लेनिन।" वह बुदबुदाकर रह गई। 

"कहीं आज फिर आपको कोहली ने हर्ट तो नहीं किया? उस उल्लू के पट्ठे को आपसे जलन होना स्वाभाविक है। आखिर, आप हिंदुस्तानी नारी की एक नायाब मिसाल जो ठहरी। देश-भर को बस आपकी तरह होना चाहिए। जब आप मंच पर औरतों के मुद्दों पर बोलना शुरू करती हो तो अच्छे-अच्छों के होश उड़ जाते हैं। आपके डायनेमिक आचार-विचार के तो हम भी बेहद कायल हैं। भगवान ने आपको औरतों की किस्मत का कायाकल्प करने के लिए ही इस धरती पर भेजा है।" 

मिसेज़ भंडारी ने अपने भाव-शून्य चेहरे के साथ करवट बदली, "कॉमरेड यादव और कोहली दोनों के पागल होने में अब ज़्यादा दिन नहीं लगेंगे। कोहली को तो अपना सारा तिगड़म लगाकर, मुझे नीचा दिखाने में ही मज़ा आता है। पता नहीं, वह किस मिट्टी का बना है? और यादव? अरे, वो स्साला तो उसका एक नंबर का चमचा है। मुझे लगता है कि पिछले जन्म में वह कोहली की वाईफ़ रहा होगा। वो शिखंडी का बच्चा, कोहली की खुशामद करके 'नारी चेतना न्यास' के बैनर तले अपनी तूती बोलवाने के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है।" 

आरके के नथुने गुस्से में फड़फड़ाने लगे, "किसी दिन आप मुझे उनके पास ले चलो। उन हरामियों को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि उन्हें छट्ठी का दूध याद आ जाएगा। मैं अपनी देवी जैसी बीवी की तौहीनी करने वालों को पल-भर के लिए बरदाश्त नहीं कर सकता।" 

मिसेज़ भंडारी फ़िस्स से हंस पड़ी, "पुअर लेनिन! तुमसे एक छोटी-सी गृहस्थी तो सम्हलती नहीं, उन बेशऊर, ढीठ शातिरों को कैसे सबक सिखाओगे?" 

आरके का चेहरा एकदम से उतर गया। उन्हें मिसेज़ भंडारी से ऐसी प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी, क्योंकि वह लगातार उनकी चंपी-मालिश कर रहे थे। 

कुछ मिनट सन्नाटा पसरा रहा। फिर, वह अचानक बोल उठे। 

"डार्लिंग! हाथ-मुंह धो लो तो खाना लगा दूँ।" उन्होंने उनकी खुशामदी लहज़े में बदन छुआ। 

इसी बीच वह बड़ी तत्परता से बाथरूम में तौलिया, सोप केस, हेयर ऑयल आदि रख आए। 

फिर, वह डाइनिंग टेबल पर खाना लगाकर काफ़ी देर तक तसल्ली से इंतज़ार करते रहे। बड़ी देर बाद मिसेज़ भंडारी सोफ़े से उठी और बाथरूम में घुस गईं। कोई आधे घंटे तक बाथरूम में ही रहीं। जब वह आई तो आरके ने उनके आगे आहिस्ता से खाने की थाली सरका दी। उन्हें शांत बैठा देख, वह बोल उठे, "आज ज़्यादा कुछ तो नहीं बना सका..." 

"क्या बनाया, क्या नहीं बनाया, इस बारे में तो मैं कुछ पूछ नहीं रही हूँ।" वह चिड़चिड़ा उठीं। 

"तो?" आरके के चेहरे पर से खुशामदी मुसकराहट की लकीरें मिटने का नाम नहीं ले रही थीं। 

वह झौंझिया उठी, "डायनिंग टेबल का गुलदस्ता कहाँ खा गए? लेनिन! तुम्हें तो पता ही है कि जब तक डाइनिंग टेबल पर करीने से गुलदस्ता न सजाया गया हो, मैं खाने का एक कौर तक मुंह में नहीं डाल सकती..." 

आरके हड़बड़ा उठे। "अरे, हाँ, गुलदस्ता धो-धाकर आँगन में ही छोड़ दिया।" बहरहाल, उनके द्वारा टेबल पर गुलदस्ता रखे जाने के बाद भी जब मिसेज़ भंडारी ने खाने को हाथ नहीं लगाया तो वह कुछ याद करते हुए बोल उठे, "ओह, हिटलर को तो खाने पर बुलाना ही भूल गया।" 

वह बेतहाशा चींख उठीं, "पुअर लेनिन! तुम्हारे पत्थर-दिल में जानवरों के लिए ज़रा-सा भी दर्द नहीं है। बेचारा हिटलर! च्च,च्च, च्च, कहीं भूखों न मर जाय। हिटलर को तत्काल डिनर पर बुलाओ!" 

हिटलर का नाम लेने से पहले ही वह दुम हिलाता हुआ सामने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहा था। आरके की नज़रें जैसे ही हिटलर से मिलीं, अपराध-बोध से उनका चेहरा मुरझा गया, "सॉरी यार, अब सठिया रहा हूँ ना। अरे, तुम तो जवान हो। जब मुझसे कोई चूक हो तो मुझे याद दिला दिया करो।" 

हिटलर ने अपनी आँखें मिचमिचाई जैसेकि उसे सब कुछ समझ में आ गया हो। 

मिसेज़ भंडारी से रहा नहीं गया, "स्टुपिड लेनिन! हिटलर तुमसे कहीं ज़्यादा समझदार है। आख़िर, तुम आफ़िस में अपने सबआर्डिनेट से किस तरह पेश आते होगे?" 

आरके ख़ामोश रहे। उन्होंने कभी मिसेज़ भंडारी से ज़बानज़दगी की ही नहीं। लिहाजा, डिनर के बाद, हिटलर बरामदे में चला गया जबकि आरके पीछे किचेन गार्डेन में आकर टहलने लगे। बेडरूम से मिसेज़ भंडारी के खाँसने की आवाज़ बार-बार आ रही थी। आरके को अच्छी तरह एहसास हो रहा था कि मिसेज़ भंडारी को नींद क्यों नहीं आ रही है। वह उन्हें बेड पर बुलाने के लिए तब तक खाँसती रहेंगी जब तक कि वह वहाँ चले नहीं जाएंगे। पर, आरके का मन जुगुप्सा से भरा हुआ था। कुछ भी करने का जी नहीं कर रहा था। वह तो ड्राइंगरूम में ही सोने का मन बना रहे थे। लेकिन, जब मिसेज़ भंडारी डाँटने के अंदाज़ में खाँसने लगीं तो आरके के मन में डर समाने लगा। वह ख़ुद से ही भुनभुनाने लगे, "बहादुर लेनिन! बच्चू अब तेरी ख़ैर नहीं। जंग लड़ने के लिए तैयार हो जा।" 

वह एक झटके से लाइट बुझाते हुए बेडरूम में घुस गए। बेड की चरर-मरर उनके भीतर की बूढ़ी होती हड्डियों की चरमराहट बयां कर रही थी। 

तीसरे दिन। 

आरके के चेहरे पर सारी रात जगने की थकान के निशान साफ़ नज़र आ रहे थे। मिसेज़ भंडारी अमेरिका से आई अपनी बहू मार्ग्रेट थैचर के साथ सुबह से ही ड्राइंग रूम में बैठी निहायत ज़रूरी गप्पशप्प कर रही थीं। आरके घर्र-घर्र चल रही वॉशिंग मशीन में धुलते हुए कपड़ों की निगरानी करते हुए बार-बार किचेन में से आ-जा रहे थे। मुसोलिनी के दोनों बच्चे--बेटा हाउन्ड और बेटी टाइग्रेस आरके की पीठ पर उछल-उछल कर उनसे पिठकुइयां घुमाने के लिए ज़िद कर रहे थे। आरके बार-बार दोनों को तसल्ली देते जा रहे थे, "अभी ज़रूरी काम से फ़ारिग हो जाऊँ तो तुम दोनों को अपने कंधे पर बैठाकर सारे बाज़ार की सैर करा दूंगा।" 

तभी ड्राइंगरूम से मिसेज़ भंडारी की तड़क आवाज़ से आरके स्तब्ध हो गए। 

"अरे, लेनिन! अभी नाश्ते में और कितना टाइम लगेगा?" 

"बस, मैडम! आप डाइनिंग रूम में तशरीफ़ लाइए, मैं नाश्ता लगाने जा रहा हूँ।" 

कुछ देर बाद, डाइनिंग रूम शोरगुल से भर गया। मुसोलिनी बार-बार आरके से डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाना खाने के लिए आग्रह कर रहा था, "डैड! आप भी साथ आ जाओ ना।" लेकिन, आरके कहते जा रहे थे, "आज, तो मैं सी.एल. ले लूंगा क्योंकि अभी तो मैडम को ताज पैलेस के लिए रुख्सत करना है।" 

मिसेज़ भंडारी की निग़ाहें आरके के साथ-साथ टहल रही थीं। आरके को देखते हुए वह बिल्कुल सहज नहीं हो पा रही थी। 

"लेनिन! तुम्हें कोई सी.एल. वी.एल. लेकर मस्ती मारने की ज़रूरत नहीं है। पहले, मेरा काम निपटाओ और कार से मुझे मेट्रो स्टेशन तक लिफ़्ट दो और वापस आकर आफ़िस को निकलो। हाँ, आफ़िस जाते हुए मुसोलिनी, हाउन्ड और टाइग्रेस को भी साथ लेते जाना। अपने सबआर्डिनेट को घुड़क देना कि वे तुम्हारे मेहमानों का ख़्याल रखें वरना मैं तुम्हारी सी.आर. खराब कर दूंगा। वे मेरे बच्चों को दिल्ली का सैर-सपाटा करा देंगे और तब तक तुम वापस घर आकर रात के डिनर की तैयारी कर देना..." 

आरके पल-भर को सोचने के बाद गिड़गिड़ाने लगे, "डार्लिंग! एक गुजारिश है। घर के काम के लिए एक फुल टाइम मेहरी रख लो तो तुम्हारी और बढ़िया ख़िदमत हो जाएगी।" 

"अरे, लेनिन! तुम मर्दों की फ़ितरत मैं अच्छी तरह समझती हूँ। उधर मैं बाहर खून-पसीना एक करूं और इधर तुम आफ़िस से शार्ट लीव लेकर घर में मेहरी के साथ गुलछर्रे उड़ाओ।" मिसेज़ भंडारी गुस्से में चूर हुई जा रही थीं। 

आरके झेंप गए। पल-भर के लिए उन्होंने बहू मार्ग्रेट को देखा। फिर, हँसते हुए खुद को संयत किया--'हि-हि, हि-हि। मैं तो यूं ही मजाक कर रहा था।" 

"मजाक भी सामने वाले की औक़ात देखकर किया जाता है। अच्छा! मेरे पर्स में कुछ हजार-पाँच सौ के रुपए डाल दो। आज मेरे साथ मार्ग्रेट भी रहेगी। भले ही वह बिलायती लड़की है, मुझे उसे आदर्श हिंदुस्तानी औरत के सारे गुर सिखाने हैं।" 

"आपने तो मेरी मुंह की बात छीन ली। अगर मार्ग्रेट जूनियर मिसेज़ भंडारी बन जाए तो इससे अच्छी बात क्या होगी?" आरके मिसेज़ भंडारी के जाते-जाते उन्हें खुश करने में कोई कसर बाकी छोड़ना नहीं चाहते थे। 

वह फिर, बोल उठे, "जब मैं किचेन में रोटियाँ सेंक रहा था तो उस नामुराद शर्मा का फोन आया था। पूछ रहा था कि आज मैडम का कहाँ अप्वाइंटमेंट है। मैंने बता दिया कि आज ताज पैलेस में 'तलाक में पत्नियों की निर्दोषिता' विषय पर मैडम बोलने वाली हैं।" 

"लेनिन, तुम कितने भोले इंसान हो! मेरे बारे में सभी को सब कुछ साफ़-साफ़ बता देते हो। यह भी नहीं सोचते कि इससे तुम्हारी बीवी के लिए खतरा भी पैदा हो सकता है। ख़ैर, शर्माजी तो अपने आदमी हैं। उनसे डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन, जब कोहली का फोन आए तो उन्हें बता देना कि वे फ़िज़ूल में हमारे खिलाफ़ अफ़वाहें न फैलाएं। बेचारे शर्माजी को भी वह नहीं बख्श रहे हैं।" 

"डार्लिंग! अब क्या कहें? दुनिया कितनी बुरी है! आखिर, भले-मानस लोग जाएं तो कहाँ जाएं?" आरके उनके प्रति हमदर्दी जताते हुए कार की ओर बढ़ने लगे। कार का दरवाज़ा खोलकर उन्होंने पहले मैडम को लिफ़्ट दी, फिर मार्ग्रेट थैचर को; फिर, खुद आकर ड्राइविंग सीट पर बैठ गए। जैसे ही उन्होंने कार स्टार्ट की, उनका मोबाइल बज उठा। 

फोन पर शर्माजी थे। 

"आरके! यहाँ ताज पैलेस में सेमीनार का सारा इंतज़ाम हो रखा है। मैडम को तत्काल यहाँ तक पहुंचने का बंदोबस्त कर दो।" 

तभी मैडम का भी मोबाइल घनघना उठा, "मैडम भंडारी! आपका सेमीनार कहाँ होने जा रहा है? यहाँ मैं कॉमरेड यादव के साथ ताज पैलेस के जी.एम. से पूछ चुका हूँ। ऐसा कोई भी कार्यक्रम यहाँ आज नहीं होने जा रहा है।" 

कोहली की छानबीन पर, मैडम झुंझला उठी, "अरे, उल्लू के पट्ठों! अब तुम्हें क्या बताऊं--यह सेमीनार बुद्धा गार्डेन में होने जा रहा है--जहाँ बस, मैं होऊंगी और शर्माजी।" 

मैडम गुस्से में क्या कह गईं, इसका उन्हें खुद ख्याल नहीं रहा। गुस्से में उनके मुंह से सच बात फूट जाती है। पर, आरके उन्हें टुकर-टुकुर देखते हुए ऐसी भाव-भंगिमा बना रहे थे जैसेकि उन्होंने कुछ सुना ही नहीं या सुना भी तो उन्हें कुछ समझ में नहीं आया। पर, सच्चाई यह है कि जब मैडम बहुत गुस्से में उन्हें डाँट पिलाती हैं तो उन्हें उनकी बात बिल्कुल सुनाई नहीं देती। वह नाक पर अपनी ऐनक ऐडजस्ट करते हुए बस उनका चेहरा देखते रह जाते हैं। मैडम की बात समाप्त होने के बाद, आरके कुछ समय बाद फ़ुरसत में उनसे पूछते हैं, "मैडम, उस वक़्त आप नामुराद कोहली से क्या फ़रमा रही थीं, ज़रा फ़िर से तो कहना।" 

"आरके! कभी तो अपनी ज़बान को लगाम दिया करो! बेवज़ह के बकवास में अपना सिर क्यों खपा रहे हो?" 

उनकी घुड़की सुनकर आरके ने बड़ी मासूमियत से अपने सिर को अपने कंधों में गड़ा दिया, "हि-हि-हि-ही! कोई बात नहीं, कोई बात नहीं..." 

बहरहाल, नारी चेतना ट्रस्ट के शर्माजी भंडारी दंपती के खिलाफ़ लाख अफ़वाहें फैलाते रहें, उनका दाम्पत्य जीवन खूब फल-फूल रहा है क्योंकि वे बने ही एक-दूजे के लिए हैं।  


A Hindi Story of Dr Manoj Sreevastav

1 टिप्पणी:

  1. अत्यंत मार्मिक और प्रासंगिक कहानी है। भाषा में नाटकीयता है। स्त्री दंभ को अच्छे ढंगे से वर्णित किया गया है। यह भी इस दौर की आवश्यकता है। स्त्रियाँ भी पुरुषों का शोषण कर रही हैं।
    --डॉ. ज्योत्स्ना

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