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शनिवार, 27 जुलाई 2013

सुशील कुमार की सात कविताएँ



संभावनाशील युवा कवि सुशील कुमार का जन्म 1978, झारखण्ड के हजारीबाग में हुआ शिक्षा- समाज सेवा में स्नातकोत्तर। अपनी कविताओं के बारे में आप कहते हैं: "लिखता हूँ कविता, बेचता नहीं हूँ/ इसलिए मौकापरस्त नहीं बल्कि/ ज़ुल्मों सितम की काली कोठरी में/ बग़ावत का चिराग़ हैं कवितायें मेरी।" आप वर्षों से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं लम्बे समय तक एच.आई.वी. / एड्स जागरूकता के लिए उच्य जोखिम समूह (यौन कर्मियों, समलैंगिकों व ट्रकर्स) के साथ कार्य का विशेष अनुभव रखने वाले सुशील जी जन सरोकार के मुद्दों के साथ सक्रियता से जुड़कर काम करते रहे हैं वर्तमान में दिल्ली स्थित एन. जी.ओ. कंसल्टेंसी कंपनी गोल्डेन थाट कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ चीफ कंसल्टेंट के रूप में कार्यरत है और कई सामाजिक, सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं (जैसे नाको, यूनिसेफ, वी.वी.गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान आदि) के साथ प्रशिक्षक, मूल्यांकनकर्ता व सलाहकार के रूप में सक्रिय जुडाव बना हुआ है 

संपर्क: ए-26 / ए, पहली मंजिल, पांडव नगर, 
मदर डेरी के सामने, दिल्ली-110092  
 ई-मेल: goldenthoughtconsultants@gmail.com  

1. गुंजाइशों का दूसरा नाम
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

लो वह दिन भी आ गया
जब हमारा खून गर्म तो होता है
लेकिन
उबलता नहीं है

सूख कर कड़कड़ाई हुई साखों में
रगड़ तो होती है मगर
अब वो चिंगारी नहीं निकलती
जिससे धू-धू कर
जंगल में आग लग जाती थी

आयरन की कमीं वाले हमलोगों नें
अपने खून में लोहे की तलाश भी छोड़ दी है
जिससे बनाए जाते थे खंजर

यह
उबाल रहित खून
आग रहित जंगल और
खंजर रहित विद्रोह का नया दौर है

फिर भी मजे की बात तो यह है कि
यहाँ समाजवाद
अजय भवन के मनहूस सन्नाटे में
आगंतुकों की बाट जोहती
कामरेड अजय घोष की मूर्ति नहीं
बल्कि
छांट कर रखी गयीं
पुस्तकालय की किताबों के चंद मुड़े हुए पन्नों में
बची गुंजाइशों का दूसरा नाम है 


2. सलीब

दिशाओं के अहंकार को ललकारती भुजाएं
और
चीखकर बेदर्दी की इन्तहां को चुनौती देतीं
हथेलियों में धसीं कीलें

एक-एक बूंद टपकता लहू
जो सींचता है उसी जमीन पर
लगे फूल के पौधों को
जहाँ सलीब पर खड़ा है सच
जब भी लगता है कि
हार रहा है मेरा सच
सलीब को देखता हूँ

लगता है कोई खड़ा है मेरे लिए
झूठ के खिलाफ 

3. कई बार लगा

कई बार लगा 
मैनें लाँघ दी सीमाएँ

कई बार लगा
हैसियत से ज्यादा बोल गया

कई बार लगा
मैं दायरों से बाहर निकल रहा हूँ

कई बार लगा
मैं खडा हूँ वहीं 
और दायरे मुझसे बाहर निकल रहे हैं  

4. गिरफ्त

तुम गिरफ्त में लेते हो
कुछ इस तरह
जैसे आकाश
पंक्षी को कैद करता है

उन्मुक्त रहने का
भ्रम भी रहे
और
बहार न निकल पाने की
असमर्थता भी।

5. पर्दा

न रौशनी रूकती है
न ठंढी हवाएं

अब तो इन
पर्दों को बदल डालो।

6. शहर में चांदनी

भागो कि सब भाग रहे हैं
शहर में
कंकड़ीले जंगलों में
मुंह छिपाने के लिए

चाँद
ईद का हो या
पूर्णिमा का
टी.वी. में निकलता है अब
रात मगर क्या हुआ

मेरी परछाई के साथ
चांदनी चली आई
कमरे में
शौम्य, शीतल,
उजास से भरी हुई

लगा मेरा कमरा
एक तराजू है
और
मै तौल रहा हूँ
चांदनी को
एक पलड़े में रख कर
कभी खुद से
कभी अपने तम से

लगा रहा हूँ हिसाब
कितना लुट चुका हूँ
शहर में !

7. मन का कारोबार

मन के कारोबार में
प्यार की पूंजी
दाव पर होती है

कोई बही-खाता नहीं होता
इसलिए
तुम्हारी शर्तें
सूद की तरह
चढ़ती गयीं मुझपर
जिसे चुकाते-चुकाते
अपने मूलधन को
खो रहा हूँ

तमाम मजबूरियों के बावजूद
मैं कारोबारी हो रहा हूँ 

Five Poems of Susheel Kumar

4 टिप्‍पणियां:

  1. कई बार लगा
    मैनें लाँघ दी सीमाएँ

    कई बार लगा
    हैसियत से ज्यादा बोल गया

    कई बार लगा
    मैं दायरों से बाहर निकल रहा हूँ

    कई बार लगा
    मैं खडा हूँ वहीं
    और दायरे मुझसे बाहर निकल रहे हैं ।



    तमाम मजबूरियों के बावजूद
    मैं कारोबारी हो रहा हूँ।

    कवितायेँ सातों एक से बढ़कर एक...
    तीसरी और सातवीं तो ...आते जाते ,बदलते जीवन का रूप है ...बहुत सुन्दर...और बहुत बधाई

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  2. एक सांस में पढी ये कविताएँ....सोचने को विवश करती हैं, सार्थक हैं.

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