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गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

कहते कुछ, करते कुछ हैं आज के रचनाकार - अवनीश सिंह चौहान


अवनीश सिंह चौहान

गूगल सर्च इंजन से साभार 
ये दिन मीडिया देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, व्यभिचार, अन्याय, अनीति आदि पर अपनी चिंता व्यक्त करता रहता है। उसकी यह चिंता राजनीति से लेकर अध्यात्म तक के क्षेत्रों में देखी-सुनी जा सकती है। (हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कई बार यह सब अपनी पब्लिसिटी / टीआरपी को बढ़ाने के लिए भी किया जाता है)। उसकी चिंता इस बात को लेकर अधिक रहती है कि आज चरित्र का पतन बड़ी तेजी से हो रहा है? शायद इसीलिए इसकी जांच-पड़ताल करने के लिए तमाम विद्वान, लेखक, विचारक सामने आ रहे हैं अपने भाषणों के साथ, अपने लेखों के साथ, अपनी चर्चाओं के साथ। जनता देख-सुन रही है, पढ़ रही है, प्रतिक्रिया भी कर रही है- ‘यह सब ठीक नहीं हो रहा है... यह सब कब तक चलेगा? या अब तो भगवान ही मालिक है!’ तत्पश्चात् इनमें से अधिकांश लोग अपने-अपने काम-धंधे में लग जाते हैं और अगली घटना के घटने तक उन्हें इन समस्याओं/ विकृतियों के निराकरण हेतु कुछ कर गुजरने की फुरसत ही नहीं मिलती! यदि घटना की पुनरावृत्ति हुई तो कोई मीडियाकर्मी, लेखक या बुद्धिजीवी पिछली घटना को नई घटना से जोड़ते हुए पुरानी ‘टीस’ का स्मरणभर करा देता है और बात आयी-गयी हो जाती है। 

चूंकि इस प्रक्रिया से एक साहित्यकार/ कलमकार भी सीधे तौर पर जुड़ा होता है, इसलिए वह भी अपनी लेखनी का भरपूर प्रयोग करने से नहीं चूकता। तब प्रसव पीड़ा के बाद सैकड़ों-हजारों रचनाएं जन्म लेने लगती हैं। कई बार तो एक ही थीम पर। पढ़ने बैठो तो लगेगा कि सब एक ही सुर में गा रहे हैं, ढोल बजा रहे, शब्दों की बाजीगरी दिखा रहे हैं। नतीजा? वही ढाक के तीन पात वाला। जनता मौन, जनसेवक मौन। न अर्जुन, न द्रोण। ऐसे में जनता में बदलाव आये तो कैसे? चेतना आए तो कैसे? नैतिक पतन पर फुल स्टॉप लगे तो कैसे? कहीं आइडियोलॉजी वीक तो नहीं हो गई है? जहां तक आइडियोलॉजी की बात है तो इस वैज्ञानिक युग में यह और भी अधिक तार्किक एवं पुष्ट हुई है। आजकल तो ‘आइडिया’ सर्वत्र उपलब्ध है- ‘गेट आइडिया, एट एनी टाइम, एट एनी प्लेस।’ तब दूसरा पहलू है आइडियोलॉजिस्ट यानि कि आइडिया देने वाला, जिसके बारे में जांच-पड़ताल करने की परम आवश्यकता है। 

आज के तमाम विचारक/ कलमकार बहुत चालाक हो गए हैं। वे अच्छी बात कह तो देते हैं पर उस पर अमल करते दिखाई नहीं पड़ते। पहले के तमाम विचारक/ कलमकार जो कुछ भी कहते-लिखते थे, उसका अनुसरण भी करते थे। यानि कि यदि वे किसी मूल्य या विश्वास को बनाए रखने की वकालत करते थे तो उसका अपने जीवन में भी अक्षरश: पालन करते थे। वे खुद से अधिक दूसरों को सुखी और प्रसन्न देखना चाहते थे। वे जीवमात्र से प्रेम करते थे और सभी का यथोचित सम्मान करते थे। उनकी वाणी मधुर और उनके व्यवहार में स्नेह झलकता था। सामने और पीछे एक-सा व्यवहार। दुर्व्यवसनों और सांसारिक चकाचौंध से कोसों दूर रहकर वे विश्व कल्याण के लिए सतत शब्द साधना में निमग्न रहते थे।

लेकिन आज के तमाम रचनाकार शेर की खोल में सियार ज्यादा हैं। वे कहते कुछ हैं, करते कुछ है और दिखते कुछ और। वे केवल और केवल अपने आप को सुखी, संपन्न एवं सम्मानित देखना चाहते हैं। वाणी में दिखावटी प्रेम, ह्रदय में कपट। सामने प्यार-दुलार और मौका मिलते ही वार। दुर्व्यसनों और सांसारिक चकाचौंध को जीवन का आधार बनाकर चलने वाले ये लोग ग्लैमर में विश्वास रखते हैं। वे शब्द-साधना तो करते हैं लेकिन स्वार्थ साधने के लिए, और अपनी इस कीमियागीरी पर मन ही मन बहुत खुश भी हो लेते हैं। खुश क्यों न हो, वे जो हर जगह छाये रहते हैं। भले ही उनका छा जाना ‘हैंगिंग क्लाउड्स’ जैसा क्यों न हो। मसलन, कोई कार्यक्रम हो रहा हो तो वे मंच पर किसी न किसी बहाने चढ़ जाते हैं, विशेषकर तब जब फोटोग्राफर्स या रिपोर्टर्स कार्यक्रम का कवरेज लेने आये हों। या कुछ नहीं तो सभागार में जोर-जोर से ‘वाह-वाह’ या ‘क्लैपिंग’ कर छाने का प्रयास करते हैं। और कहीं माइक हाथ लग गया तो एक-दूसरे की ‘मटकी सैट' करने (इमेज बनाने) का उपक्रम कर छा जाते हैं और भूल जाते हैं कि इनका कलाउड्स जैसा होने से इनमें आसमान जैसी विशालता, एकरूपता, समरसता नहीं आ सकती। लेकिन एक फायदा तो जरूर मिल जाता है इन्हें- इनकी फोटो और नामों की चर्चा पत्र-पत्रिकाओं में छप जाया करती है। इतना क्या कम है? 

देखा यह भी गया है कि इनमें से कई साहित्यकार जब कभी मंचासीन होते हैं और जब उनका बोलने का नम्बर आता है तब वे जिस हेतु आमंत्रित होते हैं उस संदर्भ में कुछ भी नहीं कहते (न आलोचना में, न ही प्रशंसा में), बल्कि इधर-उधर की बातें करते रहते हैं, शायद यह मानते हुए कि ‘साइलेंस इज गोल्ड।’ कई बार तो पुस्तकों के लोकार्पण या सम्मान समारोह में इनकी कृपणता सिर चढ़कर बोलती है, इसीलिए नहीं कि जिस पुस्तक का लोकार्पण हो रहा है या जिस किसी का सम्मान हो रहा है, वह टिप्पणी करने के लिए उपयुक्त नहीं है, बल्कि इसलिए कि टिप्पणी करने से उनका व्यक्तिव एवं कृतित्व उभरकर कहीं सामने न आ जाए और वे स्वयं कहीं उनके सामने बोने न हो जाएं। अत: वे बड़ी लकीर न खींचकर विद्यमान लकीर को ही छोटा करने में अपनी ऊर्जा खपा देते हैं। वे मानकर चलते हैं कि बोलने और लिखने से ‘हाथ कट जाते हैं।’ 
गूगल सर्च इंजन से साभार 

कई बार भूमिका, समीक्षा या टिप्पणी लिखने के लिए जब उपरोक्त कलमकारों के पास कृतियाँ पहुंचती है तब यदि वे उम्दा हुईं या रचनाकार विजातीय हुये तो वर्षों कृतियां उनकी अलमारियों में सड़ती रहती हैं, पर वे उन पर एक पंक्ति भी लिखकर नहीं देते। वे यह नियम दूसरों पर तो लागू करते हैं अपने ऊपर नहीं। यानि कि दूसरों से अपनी पुस्तक पर साग्रह लिखवा भी लेते हैं और अपने बारे में बुलवा भी लेंगे। यदि अन्य लोग उनके बारे में लगातार अच्छा लिखते-बोलते रहते हैं तो उनसे बहुत खुश रहेंगे (हालांकि ताउम्र उनके लिये वे शायद ही कुछ अच्छा कर पाएं)। अन्यथा वे अपने चमचों के साथ चौकड़ी जमाकर निंदाशास्त्र रच डालते हैं। 

इसका मतलब यह नहीं कि आज अच्छे एवं सच्चे साहित्यकार होते ही नहीं है। होते तो हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है। बहुतायत ऐसे कलमकारों की है जिनके आचरण भ्रष्ट हैं। मजे की बात यह कि वे भ्रष्टाचार न करने, रिश्वत न लेने-देने आदि की जोरदार वकालत अपनी रचनाओं में तो करते हैं, परन्तु अपनी निजी जिंदगी में जमकर भ्रष्टाचार करते हैं, रिश्वत लेते हैं। कई तो बलात्कार जैसे 'समसामयिक टॉपिक्स’ पर आग उगलते देखे जा सकते हैं। किन्तु यदि कोई उनकी व्यक्तिगत जिंदगी में झांक सके तो पता चलेगा कि वे भी चरित्रहीन हैं- उन तमाम सांसदों, नेताओं, संतो-महन्तों, व्यवसायियों, अधिकारियों, टापोरियों की तरह ही जो ब्लू फिल्में देखते हैं और औरत को सिर्फ ‘टूल’ समझते हैं। 

शायद तभी देखने में आता है कि ऐसे विचारक/ साहित्यकार खडूस होने पर भी महिला रचनाकारों/ पाठकों के प्रति अच्छा बर्ताव करते हैं, जैसे- समय-समय पर उनके हाल-चाल पूछते रहना, उनके खाने-पीने, आने-जाने, रुकने-ठहरने की अत्यधिक फिक्र करना, उनकी प्रशंसा में पुल बांधना आदि। किन्तु मौका मिलते ही वे उनकी पीठ पर हाथ फेरने से भी नहीं चूकते। अगर उक्त महिला सब कुछ सह गयी, कुछ न बोली, तो बल्ले-बल्ले; नहीं तो कह देते हैं ‘बेटा' (बेटी नहीं), हम तो तुम्हें आशीर्वाद दे रहे थे। लो कर लो बात।

कुछ साहित्यकार ऐसे भी हैं जो अपने आपको 'हाईलाइट' करने की जुगत में लगे रहते हैं। जाहिर है वे नेटवर्किंग पर ज्यादा फोकस करते हैं। ये संपादकों-प्रकाशकों को पोटने-फुसलाने का ‘बंगाली जादू’ जानते हैं। जैसे, वार्षिक-आजीवन सदस्यता के नाम पर उन्हें चन्दा भेज दिया, उनकी झूठी तारीफ कर दी, उनको एसएमएस कर दिया, फोन पर बधाई दे दी, चिट्ठियां लिख दीं और गिफ्ट आदि भेज दिया। इससे भी काम न बना तो अपनी पॉवर (यदि है तो) का प्रयोग कर किसी से ‘एड’ या ‘फण्ड’ दिलवा दिया। यह भी फामूर्ला न चला तो संपादक को अपने शहर-कस्बे बुलाकर सम्मानित कर दिया। बचके कहां जाओगे बच्चू। तब सम्मानित संपादक उसको अपनी पत्र-पत्रिका में स्पेस देना प्रारम्भ कर ही देगा। यदि न भी किया तो कम से कम अपने सम्मान की न्यूज उसमें छापेगा ही या कहीं और छपवायेगा ही। तब उस न्यूज में ऐसे साहित्यकारों/ कलमकारों का नाम-पता भी छपना स्वाभाविक है। कुल मिलाकर, हो गए न ‘हाईलाइट’। इतना ही नहीं, यहां उनकी एक और हरकत देखी जा सकती है। उनके द्वारा लिखे गए उक्त समाचार में सम्मानित संपादक के बाद, वरिष्ठताक्रम में छोटे होने के बावजूद भी, वे अपना नाम पहले लिखेंगे फिर उनके चमचों-मुरीदों-नातेदारों का नाम होगा, ततपश्चात कहीं अन्य स्थानीय साहित्यकारों का नाम लिखा दिखाई देगा, वह भी तब जब सब कुछ ठीक बना रहे, अन्यथा वह भी नहीं। 

इन दिनों रचनाओं की चोरी का भी मुद्दा गरमाया रहता है। कभी-कभी तो यह यक्ष प्रश्न बनकर सामने आता है। इसके पीछे और आगे यही कलमकार हैं। ऐसे रचनाकार दूसरों की अच्छी रचनाओं की पंक्तियों को अपना बना लेना का विशेष हुनर रखते हैं।  यानि कि 'सब गोलमाल है'। उपन्यास से कहानी, कहानी से कविता, कविता से गीत, गीत से दोहा, दोहा से हाइकु, हाइकु से आलेख, आलेख से प्रश्न, प्रश्नों से साक्षात्कार, साक्षात्कार से भूमिका, भूमिका से शोधपत्र या कोई और तरीका अपनाकर लेखक बनने की तरतीबें भिड़ायी जा रही हैं। कुल मिलाकर, इन दिनों 'रिमिक्स' पर भी जबरदस्त काम चल रहा है।

इन कलमकारों का यदि कुछ छप-छपा गया तो सम्मान / पुरुस्कार हथियाने के लिए इनके अत्याधुनिक हथकण्डे देखते बनते हैं। फिर चलता है एक अनवरत क्रम- चयन समिति से संपर्क बनाना, बड़े-बड़ों से दवाब डलवाना, जातिवाद या क्षेत्रवाद की दुहाई देना, तेल-मालिश करना और जाने क्या-क्या करने को तैयार रहते हैं ये लोग! बस किसी तरह उन्हें सम्मानित/ पुरस्कृत कर दिया जाए। लेकिन यहाँ भी हरकत करना बंद नहीं करते। इन्हें जब तक दूसरों से कुछ न कुछ मिलते रहने की आशा रहती है तब तक उनसे सम्बन्ध बनाये रखते हैं, तदुपरांत पहचानने से भी इंकार करते दिख जायेंगे। अर्थात आप उनके किसी काम के नहीं है तो आपसे 'क्या लेना-देना', और काम निकल जाने पर भी आपसे 'क्या लेना देना।' 

यहां पर एक वाकिया याद आ रहा है। एक साहित्यकार एक संपादक से उन्हें पत्रिका में विशेष स्थान पर प्रकाशित करने का आग्रह बार-बार करते रहे। जब संपादक ने उनकी रचनाएं प्रकाशित कर दीं और पत्रिका उनके पते पर रजिस्टर्ड डाक से भेज दी, तो महीनों उन्होंने उन संपादक को न तो फोन किया न ही पत्र लिखकर सूचना दी। कुछ दिनों बाद जब सम्पादक ने उन्हें कई बार फोन लगाया तो उन्होंने फोन भी नहीं उठाया। जब संपादक ने किसी दूसरे नंबर से उन्हें फोन लगाया तो उन्होंने फोन उठा लिया। बात हुई। संपादक ने पूछा क्या पत्रिका मिल गई? जवाब मिला, ‘पिछले दिनों बड़ी व्यस्तता रही, सो पत्रिका खोलकर देख नहीं पाया। हां श्रीमतीजी ने बताया तो था कि पत्रिका आई है।’ इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उक्त साहित्यकार कितना सच बोल रहा है? 

बातें बहुत सी हैं। जनता सब जानती है। इसीलिए शायद हमारे समाज का साहित्य से भरोसा उठता जा रहा है। इस सबके बावजूद, मीडिया और सभ्य एवं सजग समाज चुप बैठा हैं। वे ऐसे तथाकथित लोगों (लेखकों, विचारकों, उदघोषकों, उपदेशकों, जनसेवकों, सम्पादकों आदि) का पर्दाफाश क्यों नहीं करते, यह एक बड़ा प्रश्न है? हो सकता है कि कई लोग मेरी इन बातों-विचारों से सहमत न हों, तो क्या मेरा यह कहना गलत है?

Writers of Today....Dr Abnish Singh Chauhan

5 टिप्‍पणियां:

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  2. भई बहुत सही व्यंग्य किया आपने...भद्रजन हाईलाइटेड फ़ील्ड्स पर विशेष गौर फरमाएं और आत्मावलोकन करें !!

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  3. कुछ भी गलत नहीं कहा आपने ... हर तरह के लोग हर जगह हैं ... और साहित्य भी अछूता नहीं है मानवीय विकारों से ...

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  4. @@@@@@@@ किसका करें विश्वास अब @@@@@@@@

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    सोचता है क़ुछ,बोलता है क़ुछ ,करता है क़ुछ ,पर लिखता है क़ुछ |

    इन्सान की फितरत है कैसी ,होता है क़ुछ , पर दिखता है क़ुछ ||

    दहेज को दानव कहने वाला ,दहेज दुगना लेता है |

    वफा की कसमें खाने वाला ,खुद ही धोखा देता है ||

    पोल खोल कर जो दूजों की ,तहलका मचाता है |

    लिफ्ट के चेम्बर में वो ,"जबर-रास" रचाता है ||

    सदाचार सीखाने वाला ,क्यों दुराचार फैलाता है ?

    "रास"रचा कर "गोपियों" से ,"कन्हैया"जो बन जाता है ||

    मासूम सी दिखती बाला पर ,क्यों दिल मेरा ये आता है ?

    विश्वास करता है क्यों उस पर ,जब हर बार धोखा खाता है ||

    चोरी करने वाला ही ,यहाँ ज्यादा शोर मचाता है |

    जीत कर विश्वास नारी का ,फिर "रति-रास"रचाता है ||

    "हीर"पाने के चक्कर में ,दण्ड मुझे मिल जाता है |

    निकल जाता है पीतल वो ,जो सोना नजर आता है ||

    किसका करूँ विश्वास अब ,यह नहीं समझ में आता है |

    देख कर दशा दुनिया की ,दिल मेरा घबराता है ||

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