पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

कहते कुछ, करते कुछ हैं आज के रचनाकार — अवनीश सिंह चौहान


अवनीश सिंह चौहान

गूगल सर्च इंजन से साभार 
ये दिन मीडिया देश में व्याप्त अनीति, अन्याय, अशांति, अस्वास्थ्य, हिंसा, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, नशाखोरी, जुआखोरी आदि पर अपनी चिंता व्यक्त करता रहता है। उसकी यह चिंता रोटी से लेकर आवास तक, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक एवं राजनीति से लेकर अध्यात्म तक जैसे तमाम क्षेत्रों में देखी-सुनी जा सकती है। (हालांकि कई बार यह सब पब्लिसिटी/टीआरपी को बढ़ाने के लिए भी किया जाता है)। कई बार उसकी चिंता इस बात को लेकर अधिक रहती है कि वर्तमान में मनुष्य का चारित्रिक पतन बड़ी तेजी से हो रहा है? शायद इसीलिए तमाम मीडियाकर्मी, विद्वान, लेखक, विचारक अपने विचारों, लेखों, भाषणों के माध्यम से इसकी जांच-पड़ताल करने के लिए अपने-अपने ढंग से सामने आ रहे हैं। जनता देख-सुन रही है, पढ़ रही है, प्रतिक्रिया भी कर रही है— ‘यह सब ठीक नहीं हो रहा है', 'यह सब कब तक चलेगा?' या 'अब तो भगवान ही मालिक है!’ तत्पश्चात् इनमें से अधिकांश लोग अपने-अपने काम-धंधे में लग जाते हैं और अगली घटना के घटने तक इन्हें इन समस्याओं/ विकृतियों के निराकरण हेतु कुछ कर गुजरने की फुरसत ही कहाँ मिल पाती है? हाँ, यदि किसी घटना की पुनरावृत्ति हुई तो कुछ मीडियाकर्मी, लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी पिछली घटना को नई घटना से जोड़ते हुए पुरानी ‘टीस’ का स्मरण भर करा देते हैं। 

चूंकि इस प्रतिक्रियात्मक प्रक्रिया से एक साहित्यकार/ कलमकार सीधे तौर पर जुड़ा हुआ होता है, इसलिए वह भी अपनी लेखनी का भरपूर प्रयोग करने से नहीं चूकता है। तब उसकी तथाकथित 'प्रसव पीड़ा' के बाद सैकड़ों-हजारों रचनाएँ जन्म लेने लगती हैं— कई बार तो एक ही विषयवस्तु पर। पढ़ने बैठो तो लगेगा कि सब एक ही सुर में गा रहे हैं, ढोल बजा रहे, शब्दों की बाजीगरी दिखा रहे हैं। नतीजा? वही ढाक के तीन पात वाला। जनता मौन, जनसेवक मौन। न अर्जुन, न द्रोण। ऐसे में जनता में बदलाव आये तो कैसे? चेतना आए तो कैसे? नैतिक पतन पर फुल स्टॉप लगे तो कैसे? इस पर भी विचार करना पड़ेगा। विचार करने पर एक प्रश्न फिर उठ खड़ा होता है। कहीं हमारी आइडियोलॉजी कमजोर तो नहीं हो गई है? जहाँ तक हमें पता है तो इस वैज्ञानिक युग में हमारी आइडियोलॉजी और भी अधिक तार्किक एवं पुष्ट हुई है। कहते हैं कि आजकल तो ‘आइडिया’ सर्वत्र उपलब्ध है— ‘गेट आइडिया, एट एनी टाइम, एट एनी प्लेस।’ तब दूसरे पहलू पर यानि कि आइडियोलॉजिस्ट पर विचार करना ज्यादा समीचीन लगता है। 

आज के तमाम विचारक/ कलमकार बहुत चालाक हो गए हैं। वे अच्छी बात कह तो देते हैं, किन्तु उस पर अमल करते दिखाई नहीं पड़ते। पहले के तमाम विचारक/ कलमकार जो कुछ कहते थे, उसका अनुसरण भी करते थे। यानि कि यदि वे किसी मूल्य या विश्वास को बनाए रखने की वकालत करते थे, तो उसका अपने जीवन में भी अक्षरश: पालन करते थे। वे खुद से अधिक दूसरों को सुखी और प्रसन्न देखना चाहते थे। वे जीवमात्र से प्रेम करते थे और सभी का यथोचित सम्मान करते थे। उनकी वाणी मधुर और उनके व्यवहार में स्नेह झलकता था। दुर्व्यवसनों और सांसारिक चकाचौंध से कोसों दूर रहकर वे विश्व कल्याण के लिए सतत शब्द-साधना में निमग्न रहते थे।

लेकिन आज के तमाम रचनाकार शेर की खोल में सियार ज्यादा हैं। वे कहते कुछ हैं, करते कुछ है और दिखते कुछ और। वे केवल और केवल अपने आप को सुखी, संपन्न एवं सम्मानित देखना चाहते हैं। वाणी में दिखावटी प्रेम, ह्रदय में कपट। सामने प्यार-दुलार और मौका मिलते ही वार। दुर्व्यसनों और सांसारिक चकाचौंध को जीवन का आधार बनाकर चलने वाले ये लोग ग्लैमर में विश्वास रखते हैं। वे शब्द-साधना तो करते हैं लेकिन स्वार्थ साधने के लिए, और अपनी इस कीमियागीरी पर मन ही मन बहुत खुश भी हो लेते हैं। खुश क्यों न हो, वे जो हर जगह छाये रहते हैं। भले ही उनका छा जाना ‘हैंगिंग क्लाउड्स’ जैसा क्यों न हो। मसलन, कोई कार्यक्रम हो रहा हो तो वे मंच पर किसी न किसी बहाने चढ़ जाते हैं, विशेषकर तब जब फोटोग्राफर्स या रिपोर्टर्स कार्यक्रम का कवरेज लेने आये हों; या कुछ नहीं तो सभागार में जोर-जोर से ‘वाह-वाह’ या ‘क्लैपिंग’ कर छाने का प्रयास करते हैं। और कहीं माइक हाथ लग गया तो एक-दूसरे की ‘मटकी सैट' करने (इमेज बनाने) का उपक्रम कर छा जाते हैं और भूल जाते हैं कि इनका कलाउड्स जैसा होने से इनमें आसमान जैसी विशालता, एकरूपता, समरसता नहीं आ सकती। तथापि इन्हें एक फायदा तो जरूर मिल जाता है— इनकी फोटो और नामों की चर्चा पत्र-पत्रिकाओं में छप जाया करती है। इतना क्या कम है? 

इनमें से कई साहित्यकार बड़े कृपण दिखाई पड़ते हैं। उदाहरणार्थ यदि उन्हें मंच पर जिस सन्दर्भ में उद्बोधन देने के लिए आमंत्रित किया गया हो तो वे उस संदर्भ में वे कुछ भी नहीं कहते (न आलोचना में, न ही प्रशंसा में), बल्कि उस दौरान वे इधर-उधर की बातें करते हैं— शायद इसलिए कि ‘साइलेंस इज गोल्ड।’ कई बार तो पुस्तकों के लोकार्पण या सम्मान समारोह में इनकी कृपणता सिर चढ़कर बोलती है— इसलिए नहीं कि जिस पुस्तक का लोकार्पण हो रहा है या जिस किसी का सम्मान हो रहा है, वह टिप्पणी करने के लिए उपयुक्त नहीं है, बल्कि इसलिए कि टिप्पणी करने से उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व उभरकर कहीं सामने न आ जाए और वे स्वयं कहीं उनके सामने बोने न हो जाएँ। वे यह भी मानकर चलते हैं कि बोलने और लिखने से ‘हाथ कट जाते हैं।’ 
गूगल सर्च इंजन से साभार 

कई बार भूमिका, समीक्षा या टिप्पणी लिखने के लिए जब उपरोक्त कलमकारों के पास कृतियाँ पहुंचती है तब यदि वे उम्दा हुईं या रचनाकार विजातीय हुये तो वर्षों कृतियाँ उनकी अलमारियों में सड़ती रहती हैं, पर वे उन पर एक पंक्ति भी लिखकर नहीं देते। वे यह नियम दूसरों पर तो लागू करते हैं, किन्तु अपने ऊपर नहीं। यानि कि दूसरों से अपनी पुस्तक पर साग्रह लिखवा भी लेते हैं और अपने बारे में बुलवा भी लेते हैं। यदि अन्य लोग उनके बारे में लगातार अच्छा लिखते-बोलते रहते हैं तो उनसे बहुत खुश रहेंगे (हालांकि ताउम्र उनके लिये वे शायद ही कुछ अच्छा कर पाएँ)। अन्यथा वे अपने चमचों के साथ चौकड़ी जमाकर निंदाशास्त्र रच डालते हैं। 

इसका मतलब यह नहीं कि आज अच्छे एवं सच्चे साहित्यकार होते ही नहीं है। होते तो हैं पर उनकी संख्या बहुत कम है। बहुतायत ऐसे कलमकारों की है जिनके आचरण भ्रष्ट हैं। मजे की बात यह कि वे अपनी रचनाओं में भ्रष्टाचार न करने, रिश्वत न लेने-देने, अनीति-अन्याय न करने आदि की जोरदार वकालत तो करते हैं, परन्तु अपनी निजी जिंदगी में जमकर भ्रष्टाचार करते हैं, रिश्वत लेते हैं, अनीति-अन्याय करते हैं ऐसे भी कई साहित्यकार हैं जो बलात्कार जैसे 'टॉपिक्स’ पर आग उगलते देखे जा सकते हैं। किन्तु यदि कोई उनकी व्यक्तिगत जिंदगी में झांक सके तो पता चलेगा कि वे भी चरित्रहीन हैं— उन तमाम नेताओं, संतो, महन्तों, व्यवसायियों, अधिकारियों, कर्मचारियों, टपोरियों की तरह ही जो दिन के उजाले में सीना तानकर ब्लू फिल्में देखते हैं और औरत को सिर्फ ‘टूल’ समझते हैं। 

शायद तभी ऐसे विचारक/ साहित्यकार महिला रचनाकारों एवं पाठकों के प्रति अच्छा बर्ताव करते हैं, जैसे— समय-समय पर उनके हाल-चाल पूछते रहना, उनके खाने-पीने, आने-जाने, रुकने-ठहरने की अत्यधिक फिक्र करना, उनकी प्रशंसा में पुल बांधना आदि, किन्तु मौका मिलते ही वे उनकी पीठ पर हाथ फेरने से भी नहीं चूकते। अगर उक्त महिला सब कुछ सह गयी, कुछ न बोली, तो बल्ले-बल्ले— नहीं तो कह देते हैं ‘बेटा' (बेटी नहीं), हम तो तुम्हें आशीर्वाद दे रहे थे। लो कर लो बात?

कुछ साहित्यकार ऐसे भी हैं जो अपने आपको 'हाईलाइट' करने की जुगत में ही सदा लगे रहते हैं। जाहिर है वे नेटवर्किंग पर ज्यादा फोकस करते हैं और संपादकों-प्रकाशकों को पोटने-फुसलाने हेतु ‘बंगाली जादू’ करते हैं। यह जादू कुछ इस प्रकार से चलता है— पत्रिका या संस्था की वार्षिक-आजीवन सदस्यता के नाम पर संपादकों-प्रकाशकों को चन्दा देना, उनकी झूठी तारीफ करना, उनको एसएमएस/व्हाट्सएप्प करना, सोशल मीडिया, फोन आदि के माध्यम से बधाई देना, चिट्ठी-पत्री लिखना, गिफ्ट/पुरस्कार आदि देना। इससे भी काम न बना तो अपनी पॉवर (यदि है तो) का प्रयोग कर किसी से ‘एड’ या ‘फण्ड’ दिलवा दिया। यह भी फामूर्ला न चला तो संपादक को अपने शहर-कस्बे बुलाकर सम्मानित कर दिया। बचके कहाँ जाओगे बच्चू? तब सम्मानित संपादक/प्रकाशक साहित्यकार महोदय को अपनी पत्र-पत्रिका में 'स्पेस' देना प्रारम्भ कर ही देगा। यदि न भी किया तो कम से कम अपने सम्मान की न्यूज उसमें छापेगा ही या कहीं और छपवायेगा ही, तब उस न्यूज में ऐसे साहित्यकारों/ कलमकारों का नाम-पता भी छपना स्वाभाविक है। कुल मिलाकर हो गए न ‘हाईलाइट’। इतना ही नहीं, यहाँ उनकी एक और हरकत देखी जा सकती है। उनके द्वारा लिखे या लिखवाये गए उक्त समाचार में सम्मानित संपादक के बाद, वरिष्ठताक्रम में छोटे होने के बावजूद भी, वे अपना नाम पहले लिखेंगे फिर उनके चमचों-मुरीदों-नातेदारों का नाम होगा, तत्पश्चात कहीं अन्य स्थानीय साहित्यकारों का नाम लिखा दिखाई देगा, वह भी तब जब सब कुछ ठीक बना रहे, अन्यथा वह भी नहीं। 

इन दिनों रचनाओं की चोरी का भी मुद्दा गरमाया रहता है। कभी-कभी तो यह मुद्दा यक्ष प्रश्न बनकर उलझन में डाल देता है। इस मुद्दे के पीछे और आगे यही कलमकार हैं। ऐसे रचनाकार दूसरों की अच्छी रचनाओं की पंक्तियों को अपना बना लेना का विशेष हुनर रखते हैं। यानि कि 'सब गोलमाल है'— उपन्यास से कहानी, कहानी से कविता, कविता से गीत, गीत से दोहा, दोहा से हाइकु, हाइकु से आलेख, आलेख से प्रश्न, प्रश्नों से साक्षात्कार, साक्षात्कार से भूमिका, भूमिका से शोधपत्र या कोई और तरीका अपनाकर लेखक बनने की तरतीबें भिड़ायी जा रही हैं। कुल मिलाकर इन दिनों 'रि-मेक' पर भी जबरदस्त काम चल रहा है।

इन कलमकारों का यदि कुछ छप-छपा गया तो सम्मान/ पुरुस्कार हथियाने के लिए इनके अत्याधुनिक हथकण्डे देखते बनते हैं। फिर चलता है एक अनवरत क्रम— चयन समिति से संपर्क बनाना, बड़े-बड़ों से दवाब डलवाना, जातिवाद या क्षेत्रवाद की दुहाई देना, तेल-मालिश करना और जाने क्या-क्या करने को तैयार रहते हैं ये लोग! बस किसी तरह उन्हें सम्मानित/ पुरस्कृत कर दिया जाए। लेकिन यहाँ भी हरकत करना बंद नहीं करते। इन्हें जब तक दूसरों से कुछ न कुछ मिलते रहने की आशा रहती है तब तक उनसे सम्बन्ध बनाये रखते हैं, तदुपरांत पहचानने से भी इंकार करते दिख जायेंगे। अर्थात आप उनके किसी काम के नहीं है तो आपसे 'क्या लेना-देना' और काम निकल जाने पर भी आपसे 'क्या लेना-देना'? 

यहाँ पर एक संस्मरण रखना चाहूँगा। कई वर्ष पहले की बात है। एक साहित्यकार एक प्रतिष्ठित पत्रिका में विशेष रूप से प्रकाशित होने की जुगत में थे। अतः उन्होंने उस पत्रिका के संपादक से बार-बार आग्रह किया। संपादक को दया आयी और उनकी बात मान ली। उन्होंने उनकी रचनाएँ प्रकाशित कर पत्रिका उनके पते पर रजिस्टर्ड डाक से भेज दी। कई महीने बीत गये। उन्होंने उक्त संपादक को न तो फोन किया और न ही इस सन्दर्भ में पत्र लिखकर उन्हें कोई सूचना दी। एक अरसे बाद जब सम्पादक ने उन्हें अपने फोन से संपर्क किया तो उन्होंने उनका फोन रिसीव नहीं किया। उक्त संपादक ने जब अपने मित्र के फोन से उन्हें फोन लगाया तो उन्होंने वह फोन रिसीव कर लिया। बात हुई। संपादक ने पूछा क्या पत्रिका मिल गई? जवाब मिला— "पिछले दिनों बड़ी व्यस्तता रही, सो पत्रिका खोलकर देख नहीं पाया। हाँ, श्रीमतीजी ने बताया तो था कि पत्रिका आई है।" इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उक्त साहित्यकार कितना सच बोल रहा है? 

बातें बहुत-सी हैं। जनता सब जानती है। शायद इसीलिए हमारे समाज का साहित्यकारों से भरोसा उठता जा रहा है। इस सबके बावजूद हमारा सभ्य एवं सजग समाज चुप बैठा हैं। आज ऐसे तथाकथित लेखकों, विचारकों, उदघोषकों, उपदेशकों आदि का पर्दाफाश क्यों नहीं होता, यह एक बड़ा प्रश्न है? हो सकता है कि कई लोग मेरे इन विचारों से सहमत न हों, तो क्या मेरा यह कहना गलत है?

Writers of Today....Dr Abnish Singh Chauhan

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

    जवाब देंहटाएं
  2. भई बहुत सही व्यंग्य किया आपने...भद्रजन हाईलाइटेड फ़ील्ड्स पर विशेष गौर फरमाएं और आत्मावलोकन करें !!

    जवाब देंहटाएं
  3. कुछ भी गलत नहीं कहा आपने ... हर तरह के लोग हर जगह हैं ... और साहित्य भी अछूता नहीं है मानवीय विकारों से ...

    जवाब देंहटाएं
  4. @@@@@@@@ किसका करें विश्वास अब @@@@@@@@

    *******************************************************************

    सोचता है क़ुछ,बोलता है क़ुछ ,करता है क़ुछ ,पर लिखता है क़ुछ |

    इन्सान की फितरत है कैसी ,होता है क़ुछ , पर दिखता है क़ुछ ||

    दहेज को दानव कहने वाला ,दहेज दुगना लेता है |

    वफा की कसमें खाने वाला ,खुद ही धोखा देता है ||

    पोल खोल कर जो दूजों की ,तहलका मचाता है |

    लिफ्ट के चेम्बर में वो ,"जबर-रास" रचाता है ||

    सदाचार सीखाने वाला ,क्यों दुराचार फैलाता है ?

    "रास"रचा कर "गोपियों" से ,"कन्हैया"जो बन जाता है ||

    मासूम सी दिखती बाला पर ,क्यों दिल मेरा ये आता है ?

    विश्वास करता है क्यों उस पर ,जब हर बार धोखा खाता है ||

    चोरी करने वाला ही ,यहाँ ज्यादा शोर मचाता है |

    जीत कर विश्वास नारी का ,फिर "रति-रास"रचाता है ||

    "हीर"पाने के चक्कर में ,दण्ड मुझे मिल जाता है |

    निकल जाता है पीतल वो ,जो सोना नजर आता है ||

    किसका करूँ विश्वास अब ,यह नहीं समझ में आता है |

    देख कर दशा दुनिया की ,दिल मेरा घबराता है ||

    ######################################

    जवाब देंहटाएं
  5. पूर्णतः सहमत हूँ मैं इन सारी बातों से। काफी वक्त निकल गया इस आलेख को आए हुए, स्थितियाँ अब भी वैसी ही हैं। लोगों का चारित्रिक पतन बढ़ा ही है। मुद्दा जस का तस। बहुत जरूरी है इस पर सोचना। कम से कम साहित्यकार बिरादरी को तो यह पहल करनी ही चाहिए।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत बढ़िया बात कही। इसमे आपने जो एक बात कही की लोग अपने आपको चमकाने के लिए नए नए हथकंडे अपनाते हैं वो सही कहा। जाति भेद भाव ने दूसरे लोगो को साहित्य और पत्रकारिता के कहीं दूर पीछे धकेल दिया है। जिसका नुकसान पूरा साहित्य वर्ग को उठाना पड़ रहा है।

    जवाब देंहटाएं
  7. अवनीश जी ..तो क्या यह कहना गलत है? शीर्षक से आप का आलेख पढ़ा।सच कहूँ तो यह आलेख जितना सामयिक है उतना ही जोखिम भरा है।युवा पीढ़ी में आप पहले कवि हैं,लेख में उद्धृत मुद्दों को उठाने वाले. विगत में भी सच्चाई पर जम गई काई की पर्तों को उधेड़ने के लिए ऐसे आलेख,वक्तव्य और पुस्तकें चर्चा में रहे हैं।विवेकानंद,ओशो जैसे विश्व प्रसिद्ध संत लेखक खरी खरी बात कहने के जाने जाते हैं।देश की बीमारी की शल्य क्रिया करने में विवेकानंद कम नहीं थे किन्तु उनका वह साहित्य अवसरवादियों ने दबा दिया।दैनिक जागरण अखबार में शायद 1982 के आसपास एक स्तम्भ निकलता था-खरी बात' जिसमें राजनीति और साहित्य इत्यादि की जोखिम भरी भाषा में गन्दगी हटाने के बात कही जाती थी, जिसके लेखक उस दौर के चर्चित रचनाकार हुआ करते थे।मैं इन आलेखों को पढ़ने में विशेष रुचि लेता था।इस स्तम्भ में मैनें उमाकांत मालवीय जैसे साहित्कारों को पढ़ा है। दिल्ली से निकलने वाली पत्रिका-संचेतना'(सं.दिलीप सिंह) में साहित्यकारों और कवियों के काले गोरखधन्धों को मैंने खूब पढ़ा है।स्वयं मैं भी अपने पत्रों में दो टूक बात कहने के लिए ख्यात रहाहूँ, संकल्परथ,आजकल और संचेतना जैसी पत्रिकाओं में मेरे लेख छपते रहे हैं। कहने का आशय ये कि यह इतिहास हमारे सामने है, लेकिन मैं यह नहीं कहूँगा कि इन सब का मौजूदा परिदृश्य पर प्रभाव नहीं पड़ता है।हाँ प्रभाव का प्रतिशत नगण्य है।अर्थात हमें ऐसे प्रयत्न करते रहना चाहिए।यह जोखिम भरा कार्य सबके वश का नहीं, कोई सच्चा और वास्तविक रचनाकार ही यह बीड़ा उठा सकता है. इस दृष्टि से इस आलेख के लिए मैं बहुत बहुत बधाई देता हूँ।इस तरह के आलेख बार बार लिखे जाने चाहिए... पुनः बधाई..

    - वीरेंद्र आस्तिक, कानपुर

    जवाब देंहटाएं
  8. आचरण के दोहरे पन की पड़ताल करता आलेख।

    - रमाकांत, रायबरेली

    जवाब देंहटाएं

आपकी प्रतिक्रियाएँ हमारा संबल: