पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

‘नयी सदी के नवगीत’ के वैचारिक अंतर्विरोध - नचिकेता


नयी सदी के नवगीत

संपादक : डॉ ओम प्रकाश सिंह 



नचिकेता
सूचना मिली है कि महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के वेबसाइट पर हिंदी साहित्य के ऐतिहासिक परिदृश्य पर नवगीत को भी एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थान दिया गया है और उसमें सन् 2016 में प्रकाशित एवं ओम प्रकाश सिंह द्वारा संपादित नवगीत के समवेत संकलन ‘नई सदी के नवगीत’ (तीनों भागों) को स्थान मिला है। इस सकारात्मक सूचना की खबर मिलते ही कुछ नवगीतकार अत्यधिक प्रसन्न और उत्साहित दिखाई दे रहे हैं। यह अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन यह उपलब्धि आकस्मिक और अप्रासंगिक भी नहीं है। अजीब इत्तफ़ाक है नवगीत को हिंदी की समकालीन आलोचना गंभीर काव्य मानने से ही इंकार कर रही है और समकालीन कविता के पाठ्यक्रमों से वहिष्कृत करके शनैः-शनैः आने वाले समय में विशाल पाठक वर्ग से दूर करने के षड़यंत्र में सफल होती जा रही है। इस स्थिति में हमारे सजग नवगीतकारों का यह दायित्व हो जाता है कि वे इस षड़यंत्र का पर्दाफाश करके सही स्थिति को जनता तक ले जायें, लेकिन नवगीतकार-समुदाय तो कवि-सम्मेलनों, दूरदर्शनों, रेडियों और एलेक्ट्रानिक माध्यमों में अपनी उपस्थिति और वहाँ से मिलने वाले तात्कालिक लाभ मात्र से ही फूला नहीं समा रहा है और इस तथ्य को नजरअंदाज कर दे रहा है कि जो राष्ट्रीय नहीं है और व्यापक बहुसंख्यक जन-सामान्य की पहुँच से काफी दूर है, वह अंतर्राष्ट्रीय बनकर भी क्या प्राप्त कर लेगा। दूसरी जरूरी बात यह है कि समकालीन नवगीतकारों को यह जानना चाहिए कि महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के वेबसाइट के द्वारा नवगीत के जिस ऐतिहासिक विकास को अंतर्राष्ट्रीय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है वह कितना वास्तविक, वस्तुपरक, वैज्ञानिक और तर्कसंगत है। सच्चाई तो यह है कि ‘नयी सदी के नवगीत’ में हिंदी नवगीत के ऐतिहासिक विकास को जिस अंदाज में जिन तथ्यों के द्वारा रेखांकित किया गया है वह काफी दोषपूर्ण, तथ्यहीन और अवैज्ञानिक है। इस प्रकार यह नवगीत को अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर विकृत और प्रदूषित रूप में प्रस्तुत करने की साजिश का फल है, इसलिए इस इतिहासविरोधी और खतरनाक प्रवृत्ति का जमकर विरोध होना चाहिए तथा नवगीत का सही इतिहास दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

आजकल कुछ अंधराष्ट्रवादी समुदायों व सांप्रदायिक शक्तियों के द्वारा भारतीय इतिहास को विकृत और प्रदूषित करने के नामाकूल और असफल प्रयत्न किये जा रहे हैं। यह आयोजन भी इसी षड़यंत्र की एक कड़ी दृष्टिगोचर होता है, क्योंकि नई सदी के नवगीत में नवगीत के इतिहास और भूगोल को बहुत ही फूहड़ और तत्थहीन ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इस खतरनाक प्रवृत्ति की जड़ में वस्तुतः प्रतिक्रियावादी शक्तियों के द्वारा नवगीत पर आधिपत्य जमाने और उसे वस्तुगत यथार्थ एवं ऐतिहासिक विकास के वास्तविक परिदृश्य से पददलित कर देने की नीयत सक्रिय दिखाई देती है। इसकी गहराई से छानबीन की जानी चाहिए।

नयी सदी के नवगीत के पहले भाग की छब्बीस पृष्ठीय भूमिका में नवगीत की संपूर्ण विकास-यात्रा को कुल चार काल-खंडों में विभाजित कर प्रस्तुत किया गया है- 1. अभ्युदय काल (सन् 1955 से 1975), 2. संघर्ष काल (सन् 1976 से 1990), 3. उत्कर्ष काल (सन् 1991 से 2006) और 4. नवोत्कर्ष काल (सन् 2006 से आज तक)। नवगीत की विकास-यात्रा का इन चार काल-खंडों में विभाजन कितना वैज्ञानिक, वस्तुपरक और तर्कसंगत है इसकी संजीदा जाँच-पड़ताल अत्यावश्यक जान पड़ती है।

कार्ल मार्क्स के शब्दों में मनुष्य की चेतना को सामाजिकता, सृजनशीलता और सौंदर्यबोध् की क्षमता का विकास सामाजिक विकास का परिणाम है। कला और साहित्य का विकास भी इसी का परिणाम है। सामाजिक परिवर्तन के साथ मनुष्य का सौंदर्यबोध बदलता है, सुन्दरता की कसौटी बदलती है। मनुष्य के सौंदर्यबोध का उसकी विश्वदृष्टि से घनिष्ठ संबंध होता है। मार्क्स के इस अभिकथन की संपुष्टि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन शब्दों में की है कि "जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के रूप में भी परिवर्तन होता चलता है।" निष्कर्षतः हम कह सहते हैं कि साहित्य के रूप में परिवर्तन के लिए उस देश की जनता की चित्तवृत्ति और समाज में तथा वहाँ के मनुष्यों की सामाजिक चेतना में परिवर्तन आना अनिवार्य है। इन तथ्यों के आलोक में हम जानना चाहेंगे कि सन् 1955, 1976, 1991 और 2006 में भारतीय समाज और उसकी सामाजिक चेतना या अंतर्राष्ट्रीय धरातल पर ऐसा कौन-सा परिवर्तन आया था जिसके प्रभाव से भारतीय जनता की चित्तवृत्ति बदल गयी थी; नतीजतन साहित्य के रूपों में या नवगीत के धरातल पर गुणात्मक तब्दीली आ गयी?

नवगीत की विकास-यात्रा के इतिहास में संजीदगी के साथ प्रवेश के पहले अति संक्षेप में यह समझ लेना जरूरी है कि नवगीत पारंपरिक गीत से किन-किन बिंदुओं पर अलहदा है। दरअसल नवगीत के उदय के पूर्व पारंपरिक गीत की मूल अवधारणा थी कि गीत नितांत निजी आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम है तथा गीत वैयक्तिक दुख-सुख तथा विरह-मिलन की घनीभूत अनुभूतियों, जीवन-दर्शन और मिलनोच्छवास की भावना को ही सही ढंग से व्यक्त कर सकता है, इसलिए गीत आत्मनिष्ठ होता है। नवगीत के उदय के बाद इस धरणा में परिवर्तन आया। नवगीत ने अपने अंतर्जगत में व्यक्तिनिष्ठता की जगह वस्तुनिष्ठता और नितांत निजी आत्मानुभूति की जगह सामाजिक चेतना के विविध् रूपों को अभिव्यक्त करने का जोखिम उठाया। नवगीत की इस सार्थक पहलकदमी ने पारंपरिक गीत की विषयवस्तु को ही नहीं बदला, उसकी अनुभूति की संरचना (भाषा, शिल्प, विचारधरा और अनुभूति का सम्मिलित रूप), अभिव्यक्ति-भंगिमा और रूपाकार को भी बदल दिया। और, यह अचानक किसी एक वर्ष में घटित नहीं हुआ; धीरे-धीरे और सामाजिक परिवर्तन को कदम-ताल देते हुए घटित हुआ।

असल में, सन् 1940 के बाद ही भारतीय जनता को अँग्रेजी साम्राज्यवाद से मुक्ति की आहट सुनाई देने लगी थी, जिससे भारतीय साहित्य की अंतर्वस्तु और अनुभूति की संरचना बदलने लगी थी। इसकी अभिव्यक्ति सन् 1943 में ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन के रूप में हुई। सप्तकीय कवियों के अलावा उस दौर के प्रगतिशील कवियों, खासकर केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, शील, बंशीधर पंडा, बंशीधर शुक्ल, मलखान सिंह सिसोदिया, महेन्द्र भटनागर, शंकर शैलेन्द्र, मान सिंह राही, खेमचंद नागर, साहिर लुधियानवी आदि की कविताओं व गीतों की बनावट और बुनावट तथा संवेदना में स्पष्ट तौर बदलाव की प्रवृत्ति परिलक्षित हो रही थी तथा गीतों में आत्मनिष्ठ व्यक्तिवादिता की जगह वस्तुगत सामाजिकता का समावेश हो रहा था। गीत की विकास-यात्रा के लिहाज से देखें तो प्रगतिशील कवियों में केदारनाथ अग्रवाल ने इस दिशा में सर्वाधिक सार्थक प्रयोग किये, संवेदना, रूपाकार, लय-छंद-संरचना और भाषा-शिल्प- सभी धरातल पर। तात्पर्य है कि गीत-रचना की जमीन पर एक नये परिवर्तन की आहट सप्तकीय कवियों के गीतों एवं केदारनाथ अग्रवाल के लोकधर्मी, वस्तुनिष्ठ और प्रयोगधर्मी गीतों में सुनाई देने लगी थी। यह परिवर्तन निराला के परवर्तीे गीतों के रूपाकार, लय-संहति, विषय-वस्तु और संवेदना में भी दिखाई देने लगा था। हिंदी कविता में व्यक्तिवादी, अस्तित्ववादी और आधुनिकतावादी काव्य-चेतना के प्रसार-प्रचार से अनुशासित एवं अनुकूलित होकर बाद में समीक्षकों ने जब नवगीत के उदय की बीज-वस्तुओं की खोज-बीन शुरू की, तो प्रगतिशील कवियों के अवदान को बिल्कुल नकार दिया, जो सर्वथा एकांगी और असंगत व्यवहार था। यह कम हैरत की बात नहीं है आज तक नवगीत के जो भी समवेत संकलन प्रकाशित हुए हैं और जिनमें प्रगतिशील कवियों के गीतों को स्थान दिया गया है, उनमें उनकी क्रंतिकारी और जन-प्रतिरोध को अभिव्यक्ति करने वाले गीतों से किनाराकशी की गयी है। इस दौर के परिवर्तशील गीतों को विद्यानिवास मिश्र नयी कविता के गीत और अन्य कई लोग नये या नया गीत कहने लगे थे। गीत की रचना-दृष्टि, जीवन-दृष्टि और कला-दृष्टि का परिमाणात्मक परिवर्तन ही छलाँग लगाकर लिखित रूप में सन् 1958 में गुणात्मक परिवर्तन - नवगीत - में तब्दील हो गया।


सन् 1958 में ‘गीतांगिनी’ की भूमिका के जरिये राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ‘नवगीत’ की पहचान के लिए जो पाँचसूत्राी- जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्वबोध, प्रीति-तत्व और परिसंचय, प्रतिमान दिये, वे वस्तुतः पारंपरिक गीतों के कला-प्रतिमानों और विचार-दृष्टि का नया नामाकरण भर था। इस कारण सन् 1964 तक ‘नवगीत’ नाम की स्वीकृति को लेकर एक भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। तभी गीतकार महेंद्र शंकर द्वारा संपादित ‘बासंती’ (सन् 1960) में ‘नये गीतः नये स्वर’ स्तम्भ के अंतर्गत एक लेख-माला की शुरुआत की गयी, जिसमें गिरिजा कुमार माथुर, शंभुनाथ सिंह, त्रिलोचन शास्त्री, रामदरश मिश्र, केदारनाथ सिंह, वीरेन्द्र मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर आदि के विचारोत्तेजक आलेख प्रकाशित हुए। अतएव सन् 1958 से 1964 तक के दौर को हम नवगीत का प्रस्थान-बिन्दु मान सकते हैं। नवगीत पर गंभीर बहस का आरंभ यानी उसे व्यावहारिक एवं सैद्धांतिक आधार देने का काम ‘कविता-64’, जिसका प्रकाशन सन् 1965 में संभव हो सका, में प्रकाशित ठाकुर प्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय, रामदरश मिश्र, ओम प्रभाकर, भगीरथ भार्गव, देवेन्द्र कुमार, नईम, नरेश सक्सेना, छविनाथ मिश्र, महेन्द्र शंकर, सोम ठाकुर, शलभ श्रीराम सिंह के नवगीतों व शंभुनाथ सिंह, रवीन्द्र भ्रमर, रामदरश मिश्र और रमेश कुंतल मेघ के विचारोत्तेजक लेखों ने किया। अतः सन् 1940 से लेकर सन् 1964 तक के काल-खंड को नवगीत का अभ्युदय काल कहना अधिक वैज्ञानिक और तर्कसंगत है, क्योंकि यही काल-खंड नवगीत के अभ्युदय काल का द्योतक है और इसी काल-खंड में नवगीत को पारंपरिक गीत से अलहदा रचना-दृष्टि और रूपाकार तथा नाम हासिल हुआ।

ओम प्रकाश सिंह के अनुसार सन् 1976 से 1990 तक नवगीत का संघर्ष काल रहा है क्योंकि इस काल के आते-आते हमारे देश में सामाजिक एवं राजनीतिक उथल-पुथल के उपरांत स्थिरता आ चुकी थी। गोया कि जब किसी देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में स्थिरता होती है, तभी साहित्य में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है, संघर्ष या हलचल की स्थिति में नहीं; अर्थात् साहित्य सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों से निरपेक्ष होता है। यह बात कोई स्वस्थ मस्तिष्क का व्यक्ति नहीं बोल या लिख सकता है। वस्तुतः सन् 1965 से 1975 तक की कालावधि स्वतंत्र भारत का सर्वाधिक उथल-पुथल वाला और संघर्ष का काल रहा है। इस दरम्यान भारत और पाकिस्तान के बीच दो बार युद्ध हुआ। बंगला देश का उदय भी इसी काल में हुआ। इसी काल में नक्सलवादी किसान आंदोलन भी अस्तित्व में आया, जिसका भारतीय समाज, राजनीति और साहित्य पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। इसी दौरान प्रीभीपर्स का समापन, बैंकों, उर्जा-श्रोतों तथा यातायात के साधनों का राष्ट्रीयकरण सम्पन्न हुआ। पहले गुजरात में, तत्पश्चात बिहार में राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलन हुआ, जिसका नेतृत्व बाद में जयप्रकाश नारायण ने किया। जयप्रकाश आंदोलन के दमन के लिए आंतरिक गड़बड़ी की आशंका का बहाना बनाकर जनविरोधी आपातकाल की घोषणा की गयी, प्रेस-विधेयक लाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटा गया, एटामिक विकास तथा भौतिक विकास के वैज्ञानिक संसाधनों का विकास भी इसी दरम्यान हुआ।

इतने संघर्षशील और उथल-पुथल के वातावरण में ही नवगीत अपनी अस्मिता और अस्तित्व की स्थापना की लड़ाई लड़ रहा था। अपने लिए युगसापेक्ष भाषा, शिल्प, संवेदना एवं रूपाकार का सीमा-निर्धारण भी कर रहा था। इस काल में गीत के विरोध् में- गीत महज एक नारा है, गीत कविता का एक शिल्प भर है, अब गीत संभव नहीं रह गया है, गीत आधुनिक जीवन की संष्लिष्ट अनुभूतियों को व्यक्त करने में सर्वथा अक्षम हो गया है, गीत का अंत हो गया है, गीत मर गया है- जैसे दर्जनों नामाकूल फतवे जारी किये गये, गीत की शवपरीक्षा भी की गयी; जिनसे नवगीत को अनवरत संघर्ष करना पड़ा है और आज भी संघर्ष करना पड़ रहा है। इसी काल-खंड में पारंपरिक गीत से इतर गीतों को माहेश्वर प्रसाद ने ‘अगीत’, राजीव सक्सेना ने ‘एंटीगीत’, विद्यानिवास मिश्र ने ‘नयी कविता के गीत’, उदयभानु मिश्र ने ‘नया गीत’ तथा मोहन अवस्थी ने ‘अनुगीत’ जैसी नयी-नयी संज्ञाओं से विभूषित किया। किंतु अगीत, एंटीगीत, नयी कविता के गीत, नये या नया गीत, अनुगीत आदि ने पारंपरिक गीत या नवगीत से अलहदा रचना-दृष्टि, जीवन-दर्शन और कला-दृष्टि का स्पष्ट विभाजन नहीं किया और न ही उसका कोई सैद्धांतिक आधार ही निर्मित हो सका; अतएव ये सज्ञाएँ स्वतः ही निरस्त हो गयीं। परंतु नवगीत ने अस्तित्ववादी-आधुनिकतावादी जीवन-दर्शन को अपना वैचारिक आधार बना लिया। अपनी रचना-दृष्टि, जीवन-दृष्टि और कला-दृष्टि का निर्धरण कर लिया, इसलिए आधुनिक गीत का नया नाम ‘नवगीत’ हिंदी साहित्य में लगभग सर्वस्वीकृत हो गया। कहने का अभिप्राय है कि नवगीत का संघर्ष काल सन् 1976 से 1990 नहीं, प्रत्युत सन् 1965 से 1975 की कालावधि ही वैज्ञानिक, तर्कसंगत और वस्तुसंगत साबित होता है।

या तो ओम प्रकाश सिंह को वैचारिक मोतियाबिंद के कारण वस्तुगत यथार्थ दृष्टिगोचर ही नहीं होता या वे हिंदी के बहुसंख्यक पाठकों और गीतकारों को निहायत अनपढ़ और बेबकूफ समझते हैं, अन्यथा वे यह हरगिज नहीं लिखते कि सन् 1991 से 2005 के बीच में बैंकों का राष्ट्रीयकरण, प्रिवीपर्स का समापन, बंगला देश का जन्म, नये अस्त्र-शस्त्र का निर्माण, एटामिक विकास, भौतिक उन्नति के वैज्ञानिक संसाधन, जहाजों, ट्रेनों के साथ अन्य मशीनरी का विकास, पाकिस्तान से युद्ध इत्यादि जैसी परिघटनाएँ हुईं। भारतीय समाज और इतिहास का अदना-सा विद्याार्थी भी जानता है कि ये सारी परिघटनाएँ सन् 1991 और 2005 के मध्य नहीं, वरन् सन् 1965 से 1975 के बीच घटित हुई हैं, जो नवगीत का ही नहीं पूरे भारतीय समाज का संघर्ष-काल था। हाँ, भारत का ‘कारगिल युद्ध’ जरूर इस दौरान हुआ है।

सन् 1976 तक आते-आते नवगीत की शक्ति, सामर्थ्य, स्वरूप और सीमा का निर्धारण-कार्य पूरा हो चुका था तथा सन् 1990 तक भारतीय समाज और इतिहास में कोई ऐसी घटना नहीं घटी जो साहित्य की दशा और दिशा को बदल दे। इस दरम्यान नवगीत की भाषा, शिल्प, लय, छंद और विषय-वस्तु में जितने विकासोन्मुख प्रयोग हुए उतने किसी दूसरे काल-खंड में नहीं हुए हैं। नवगीत के अधिकांश श्रेष्ठ रचनाकारों ने अपना श्रेष्ठ रचनात्मक योगदान इसी दौरान किया है। इस दौर के नवगीतों के भाषिक प्रयोग, संरचनात्मक प्रयोग और अनुभूति की संरचना की प्रतिछवि की उपस्थिति समकालीन नवगीतों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आज भी परिलक्षित होती है। व्यापक पैमाने पर नवगीतकारों के स्वतंत्र संग्रहों और समवेत संकलनों के प्रकाशन का कार्य इसी दरम्यान शुरु हुआ है।

‘अंतराल-4’ (सन् 1974) का प्रकाशन राष्ट्रव्यापी छात्र आंदोलन तथा आपातकाल की वजह से सन् 1976 में ही संभव हो सका, हालाँकि अंक सन् 1974 के आरंभ में ही प्रकाशनार्थ प्रेस को दे दिया गया था। इसी के जरिये गीत की जनवादी पृष्ठभूमि की खोज-बीन की शुरुआत हुई, जिसके परिणामस्वरूप जनवादी गीत या जनगीत का उदय हुआ। सन् 1989 में जनगीत का घोषणा-पत्र ‘सुलगते पसीने’ के रचनाकार-द्वय के आत्मकथ्यों के द्वारा घोषित हुआ। जनगीत का उदय, वस्तुतः नवगीत के यथास्थितिवाद के विरुद्ध असहमति, असंतोष, आक्रोश और प्रतिरोध के संकल्प, साहस और संघर्ष का परिणाम था। जनगीत की रचना-दृष्टि, वर्ग-दृष्टि, जीवन-दृष्टि, विश्व-दृष्टि, कला-दृष्टि और प्रभावसंगठक उद्देश्यों में नवगीत से काफी भिन्नता थी। इस दौर के रमेश रंजक, नचिकेता, अश्वघोष, गोरख पांडेय, शांति सुमन, ब्रजमोहन, महेंद्र नेह, बृजेन्द्र कौशिक, रामकुमार कृषक, देवेन्द्र कुमार आर्य आदि प्रमुख रचनाकार रहे हैं। इनके जनगीत खा-पीकर अघाये उच्च और मघ्यम वर्ग के मनोरंजन की वस्तु न होकर वर्ग-विभाजित समाज में शोषितों को अपने हक, इज्जत और आजादी के दीर्घकालीन संघर्ष का आह्वान थे। जनगीत नवगीत की तरह केवल भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को समझने का साहित्य नहीं था, वह उसे बदलने का साहित्य था। शायद भक्ति काल के बाद इस ‘जनगीत’-दौर के गीत ही सीधे-सीधे संघर्षशील जन-सामान्य और किसान-मजदूरों से जन-संस्कृति-मंच और विभिन्न लेखक-संगठनों के सार्थक हस्तक्षेप, नाट्य-गायन-मंडलियों, जनता के बीच जाकर किये गये काव्यपाठों, पत्र-पत्रिाकाओं और छोटे-छोटे काव्य-संकलनों के प्रकाशन और वितरण की बदौलत संवाद व संपर्क करने में सफल हुए तथा जुझारू जनता के द्वारा जन-आंदोलनों और जन-संघर्षों के दौरान इनका सार्थक इस्तेमाल भी किया गया, आज भी किया जाता है।

नवगीत के रचना-संसार के उन्नयन में तमाम सीमाओं और संकीर्णताओं के बावजूद शंभुनाथ सिंह का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने नवगीत दशक-एक, दो और तीन (क्रमशः सन् 1982, 83 और 84) एवं नवगीत ‘अर्धशती’ (सन् 1986) के जरिये नवगीत के समवेत-संकलनों के प्रकाशन का प्रारम्भ किया, जिसने नवगीत के रचना-संसार को अत्यधिक समृद्ध करने में अकूत मदद पहुँचायी। सच बात तो यह है कि नवगीत के विकास में शंभुनाथ सिंह द्वारा संपादित तीनों नवगीत दशकों का वही महत्त्व है जो महत्त्व नयी कविता के विकास में अज्ञेय द्वारा संपादित तीनों सप्तकों का है। नवगीत का रचना-संसार जितना अधिक इस काल में समृद्ध हुआ है उतना पहले या बाद के किसी काल-खंड में नहीं हुआ है। इसलिए सन 1976 से 1990 को ही नवगीत का उत्कर्ष-काल मानना ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होता है। इस काल को नवगीत का स्वर्णकाल कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।

इस दौर के नवगीतों के ऐतिहासिक विकास की पड़ताल करते हुए ओम प्रकाश सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि "हम डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा संपादित ‘गीतांगिनी’ (सन् 1958) की भूमिका से नवगीत के नामाकरण को स्वीकार कर लें तो इसी क्रम में वीरेन्द्र मिश्र की कृति ‘लेखनी वेला’ (सन् 1958) और रामनरेश पाठक की ‘क्वार की साँझ’ (सन् 1958) की कुछ रचनाओं को नवगीत की ओर उन्मुख एक कदम मान सकते हैं।” जहाँ तक मेरी जानकारी है, उसके अनुसार ‘क्वार की साँझ’ रामनरेश पाठक का एक गीत है जो उनके गीत-संग्रह ‘एक गीत लिखने का मन’ में शामिल है। इस नाम से उनका कोई संग्रह प्रकाशित नहीं है। इस गीत का एक भोंड़ा अनुकरण आलोचक नन्द किशोर नवल ने जरूर किया है और उनकी टेक की पंक्ति ‘महुए के पीछे से झाँका है चाँद/ पिया आ’ को हूबहू उन्होंने अपने गीत में स्वरचित बनाकर प्रस्तुत कर दिया है (अलाव, मई-अगस्त, 2015 के पृष्ठ-355-356 पर उद्धृत मदन कश्यप की टिप्पणी ‘नये प्रयोग हैं, लेकिन बहुत थोड़े’ उद्धरण के अनुसार)।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए ओम प्रकाश सिंह विस्तार से नवगीत के विकास को रेखांकित करने के लिए कुछ नवगीत-संकलनों एवं संग्रहों की चर्चा करते हैं। उनके अनुसार "तत्पश्चात् चंद्रदेव सिंह द्वारा संपादित ‘पाँच जोड़ बाँसुरी’, ठाकुर प्रसाद सिंह की कृति ‘वंशी और मादल’ (सन् 1959), केदारनाथ सिंह की कृति ‘अभी बिल्कुल अभी’ (सन् 1960), राजेन्द्र प्रसाद सिंह ‘आओ खुली बयार’ (सन् 1962), ‘रवीन्द्र भ्रमर के गीत’ (सन् 1963), उमाकांत मालवीय का गीत-संग्रह ‘मेहँदी और महावर’ (सन् 1963), ओम प्रभाकर द्वारा संपादित ‘कविता-64’ (सन् 1964), शंभुनाथ सिंह द्वारा संपादित कृति ‘नवगीत दशक 1, 2, 3 (क्रमशः सन् 1982, 83, 84), देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ की संपादित कृति ‘यात्रा में साथ-साथ’, मधुकर गौड़ द्वारा संपादित ‘गीत और गीत’ (सन् 1991, 94, 96), वीरेन्द्र आस्तिक द्वारा संपादित ‘धार पर हम’ (सन् 1998, 2010), कन्हैया लाल नन्दन द्वारा संपादित कृति ‘श्रेष्ठ हिंदी गीत-संचयन’ (सन् 2001), मधुकर गौड़ की संपादित कृति ‘हिंदी के श्रेष्ठ गीत’ (सन्2003), निर्मल शुक्ल द्वारा संपादित ‘नवगीतः नयी दस्तकें’ (सन् 2009), राधेश्याम बन्धु के संपादन में ‘नवगीत के नये प्रतिमान’ (सन् 2012), निर्मल शुक्ल द्वारा संपादित ‘शब्दायन’ (सन् 2012) नचिकेता के संपादन में ‘गीत-वसुधा’ (सन् 2013) इत्यादिय् के द्वारा नवगीत का रचना-संसार समृद्ध हुआ है। इतनी लम्बी सूची में भी ओम प्रकाश सिंह ने माहेश्वर तिवारी, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ एवं भगवान शरण भारद्वाज द्वारा संपादित ‘नवगीतः सर्जना और समीक्षा’ (सन् 1980), शंभुनाथ सिंह द्वारा संपादित 81 नवगीतकारों के दो-दो नवगीतों का समवेत संकलन ‘नवगीत अर्धशती’ (सन् 1986), जिसे वस्तुतः हिंदी का प्रथम् और एक हद तक मुकम्मल समवेत संकलन होने का गौरव प्राप्त है, राधेश्याम बंधु द्वारा संपादित ‘नवगीत और उसका युगबोध’ (सन् 2004) तथा ‘नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्यबोध’ (सन् 2015), राजेन्द्र वर्मा द्वारा संपादित ‘गीत-शती’ (सन् 2001) एवं निर्मल शुक्ल द्वारा संपादित ‘शब्दपदी’ (सन् 2006) जैसे महत्त्वपूर्ण नवगीत-संचयनों का जिक्र तक नहीं है। क्या ओम प्रकाश सिंह की जान-बूझकर की गयी यह हरकत नवगीत के इतिहास को विकृत या प्रदूषित करने की चेष्टा का प्रतिफल नहीं है?

सन् 1990 के बाद 1991 में सोवियत रूस के विघटन (26 दिसंबर, 1991) का विश्व राजनीति और अर्थनीति पर गुणात्मक प्रभाव पड़ा। अब शीतयुद्ध का अंत हो गया मान लिया गया और अमरीकी साम्राज्यवाद का पूरे विश्व पर निरंकुश वर्चस्व कायम हो गया। तत्पश्चात् गैट समझौता, डंकल प्रस्ताव एवं भूमंडलीकरण और विश्वग्राम की अवधारणा, भूमंडलीकृत विश्व-बाजार, उपभोक्तावादी अपसंस्कृति के प्रपंच के जरिये तीसरी दुनिया के अविकसित देशों और विकासशील देशों के शोषण की धार अत्यंत तीक्ष्ण हो गयी, जिसका प्रभाव दुनिया की सभी भाषाओं के साहित्य पर अपने-अपने ढंग से पड़ा। लेकिन भारत की समाज-व्यवस्था का चरित्र अर्धसामंती और अर्धऔपनिवेशिक बरकरार रहा, केवल शोषण के तरीके अधिक जटिल और खूँखार हो गये। भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक अमरीकी साम्राज्यवाद के मातहत हो गयी, जिससे महँगााई, बेरोजगारी, भुखमरी, मुफलिसी, बदहाली, अपराधीकरण, हत्या, दंगा, लूट, भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि अमानवीय दुर्गुणों के प्रसार में अत्यधिक इजाफा हुआ। एलेक्ट्रानिक मीडिया और सूचना प्रौद्यौगिकी के विस्तार से बाजारवाद और उपभोक्तावाद के खूँखार चँगुल में भारतीय जन-साधारण को फँसने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बावजूद भारतीय समाज की संरचना यथास्थितिवादी ही बनी रही।

ओम प्रकाश सिंह का खयाल है कि सन् 2006 से आज तक नवगीत का नवोत्कर्ष काल है, लेकिन इस काल-खंड को नवगीत का नवोत्कर्ष काल क्यों माना जाय इस सवाल का कोई मुनासिब उत्तर उनके पास नहीं है। मेरे विचार से नवगीत या समकालीन गीत का नवोत्कर्ष काल सन् 1990 के बाद से आज तक के काल को माना जाना ज्यादा समीचीन और तथ्यपरक है। इस दौरान नवगीत-रचना के क्षेत्र में एक नितांत नयी पीढ़ी का आगमन हुआ है और ये लोग काव्य-गोष्ठियों, पत्र-पत्रिकाओं से लेकर इंटरनेट, वाट्सेप, ट्युटर, फेस बुक, वेबसाइट आदि के उपयोग से नवगीत को अत्यधिक लोकप्रिय बनाने का महत्त्वपूर्ण काम भी कर रहे हैं। इस पीढ़ी के प्रमुख नवगीतकारों में रमाकांत, मनोज जैन ‘मधुर’, अवनीश सिंह चौहान, जय कृष्ण राय तुषार, ओमप्रकाश तिवारी, योगेंद्र वर्मा व्योम, रोहित रूसिया, प्रदीप शुक्ल, 
रामशंकर वर्मा, रविशंकर मिश्र रवि, सौरभ पाण्डेय, धीरज श्रीवास्तव, कृष्णनंदन मौर्य, चित्राांश वाघमारे, शुभम श्रीवास्तव ओम, रामचरण राग और पूर्णिमा वर्मन, यशोधरा राठौर, सीमा अग्रवाल, संध्या सिंह, मालिनी गौतम आदि का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके नवगीतों की विषय-वस्तु में काफी विस्तार तथा काव्यभाषा में एक नयी ताजगी दिखाई देती है।

दरअसल ‘नयी सदी के नवगीत’ के तीनों भागों की क्रमशः 26, 24 और 25 पृष्ठों की विस्तृत भूमिका वैचारिक अंतर्विरोधों और विवादास्पद तथ्यों और प्रसंगों का जखीरा है। उनके सभी विवादों और अंतर्विरोधों को हल करने के लिए एक पूरी पुस्तक लिखने की दरकार होगी, एक लेख में यह मुमकिन नहीं है, इसलिए मुझे उनके कुछ ही विवादास्पद अंतर्विरोधों के, जो गीत की समझ व इतिहास को विकृत एवं प्रदूषित करने वाले मुद्दों पर विचार करना मुनासिब लग रहा है। समकालीन कविता और नवगीत में प्रमुख साम्य दिखाते हुए ओम प्रकाश सिंह कहते हैं कि "इन दोनों में नव-मानववाद, अस्तित्ववाद, प्रकृतिवाद, क्षणवाद इत्यादि के दर्शन होते हैं।” अब इन्हें कौन समझाये ये सारे तत्व नयी कविता के जीवन-दर्शन में शामिल थे, ये समकालीन कविता के जीवन-दर्शन नहीं हैं। चूँकि "नवगीत नयी कविता का जुड़वाँ भाई है" (शंभुनाथ सिंह), इसलिए ये तत्व नवगीत का भी जीवन-दर्शन बन गये और आज भी बने हुए हैं। ओम प्रकाश सिंह की दूसरी स्थापना है कि (समकालीन कविता खड़ी बोली में अँग्रेजी शब्दों का बहुलता से प्रयोग करती रही है जबकि समकालीन गीत में आंचलिक शब्दों को भी स्थान दिया गया है।” हिंदी कविता का इतिहास गवाह है कि नवगीत के उदय के पूर्व से ही नयी कविता में आंचलिक या लोक शब्दावलियों के प्रयोग की प्रवृत्ति रही है और उचित जगह पर उचित अँग्रेजी के शब्दों के प्रयोग से नवगीत को भी परहेज कभी नहीं रहा है। ठाकुर प्रसाद सिंह के अनुसार "सन् 1950-51 में लोक-साहित्य का प्रभाव कविता के बाहरी कलेवर पर अधिक था। धीरे-धीरे उसने कविता की आत्मा में प्रवेश किया और आज वह नयी कविता के परिवेश में इस तरह भिद गया है और उसकी बुनावट का ऐसा अंश बन गया है जिसके चलते धूप-छाँही लहरें कविता में अपने आप स्पष्ट होने लगी हैं।" जाहिर है कि नवगीत के बनिस्बत नयी कविता में आंचलिक शब्दों के उपयोग की प्रवृत्ति पहले से ही रही है। कविता या समकालीन नवगीतों में अँग्रेजी शब्दों के सटीक प्रयोग से इनकी कहन-शैली में एक नयी चमक आयी है, नयी अर्थच्छटा विकसित हुई है, भाषा और अभिव्यक्ति का पाट अधिक चौड़ा हुआ है। इसे समझने के लिए समकालीन नवगीत के कुछ उदाहरण यहाँ द्रष्टव्य हैं- “सेक्स-क्राइम/ मीडिया-बाजार में/ जिस्म भी है/ डालरी व्यापार में" (वीरेन्द्र आस्तिक) या "एक से बढ़कर/ एक ब्रांड हैं/ यूथ नाम पर बिकते/ बड़ी उम्र के/ मुँह बिचकाते/ जैसे चिथड़े लगते/ स्टेटस के सिम्बल।” (ओम धीरज)

ओम प्रकाश सिंह की एक महान स्थापना है कि "आक्रोश मानव-मन की ऐसी विकृति है जो अपने अधिकारों के लिए अन्याय और असमानता के विरुद्ध खड़ी होती है।” (नयी सदी के नवगीत, भाग-तीन, पृष्ठ-15) ऐसी ही जनविरोधी स्थापना यह भी है कि "महँगाई, भ्रष्टाचार, धार्मिक बदलाव, देश की सीमा पर घुसपैठ की आशंका, आतंक, विद्रोह, नक्शल पंथ और अनेक सांस्कृतिक विद्रोहों ने भारतीयता को कुचलने और राष्ट्रभक्ति में सेंध लगाने की मंशा बना ली है।” (वही, भाग-एक, पृष्ठ-17) गरज कि अपने अधिकारों के लिए अन्याय और असमानता का मुखालफत करना, उसके खिलाफ लामबंद विद्रोह करना मनुष्यों का मौलिक अधिकार नहीं, अपितु मानव-मन की विकृति है तथा धार्मिक बदलाव तथा नक्शल पंथ और अनेक सांस्कृतिक विद्रोहों में भारतीयता को कुचलने और राष्ट्रभक्ति में सेंध लगाने की मंशा रही है। ये देश की सीमा पर घुसपैठ की आशंका और आतंकवादी हमले की भाँति ही खतरनाक हैं। इतने क्रांतिकारी बयान किसी प्रगतिशील या डेमोक्रेटिक व्यक्ति का बयान नहीं हो सकता है, यह मनुष्यविरोधी, प्रतिगामी, प्रतिक्रयावादी, घोर दक्षिणपंथी, अंधराष्ट्रवादी और साम्प्रदायिक विचारधारा वाले व्यक्ति का बयान है। इन विचारों के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का प्रवक्ता मान लिया जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक संबद्धता को प्रखर ढंग से उजागर करने के लिए ओम प्रकाश सिंह ‘नयी सदी के नवगीत’ के तीसरे भाग के संपादकीय ‘नवगीत का वैश्वीकरण’ के पृष्ठ-29 पर नवगीत को व्यापक स्तर पर प्रचारित और प्रसारित करने वाली पत्रिकाओं में ‘राष्ट्रधर्म’ को शुमार करना नहीं भूलते। पता नहीं ‘पाँचजन्य’ और ‘सामना’ का उल्लेख करना क्यों भूल गये। इससे उनकी स्वामीभक्ति एवं राजनीतिक प्रतिबद्धता और अधिक पुख्ता ढंग से व्यक्त होती। ओम प्रकाश सिंह ने नवगीत को प्रचारित-प्रसारित करने वाली अच्छी-बुरी साठ-पैंसठ पत्रिकाओं की चर्चा की है, परंतु कविता, बासंती, वातायन, माध्यम, लहर, कल्पना, अंतराल, सांध्यमित्रा, अन्यथा, अनन्या, आइना, अंकन, गीत (संपादक-भूपेन्द्र कुमार स्नेही), गीत-गुंजन, नवगीत, नीरा, समिधा, समग्र-चेतना जैसी पत्रिकाओं का नामोल्लेख करने में उन्हें शर्म महसूस हुई, इन पत्रिकाओं ने ही नवगीत को बाँस-बल्ली लगाकर खड़ा किया तथा उसके विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। वर्तमान समय में अलाव, समय के दावेदार, पहला अंतरा, सार्थक आदि का जिक्र करना भी वे भूल गये जिनका नवगीत के प्रचार-प्रसार में अपूर्व योगदान है।

ओम प्रकाश सिंह के इन प्रतिक्रियावादी विचारों को जानकर कोई ताज्जुब नहीं होता, क्योंकि नवगीत आरंभ से ही गैर प्रगतिशील, गैरजनवादी और क्रांति-विरोधी काव्य-प्रवृत्ति रहा है, क्योंकि आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद और क्षणवाद नवगीत की वैचारिक अंतर्वस्तु रहा है और ये सारे प्रत्यय केवल जनविरोधी ही नहीं, मनुष्यविरोधी भी हैं। जार्ज लुकाच के शब्दों में कहें तो अस्तित्ववादी आधुनिकतावाद के लिए मनुष्य सामाजिक प्राणी न होकर एक खंडित, एकाकी और निरीह व्यक्ति मात्र है, जिसका कोई अतीत, वर्तमान और भविष्य नहीं है। इतिहास-शून्य निरीह मानव ही अस्तित्ववादी आधुनिकताबोध के केन्द्र में अवस्थित है। तमाम जनधर्मिता, जनसंबद्धता और जनपक्षधर होने का बार-बार ढोंग करने के उपरांत भी नवगीत जन-आंदोलन, जन-प्रतिरोध और क्रांतिकारी चेतना का विरोध करता रहा है। ‘नयी सदी के नवगीत’ के तीसरे भाग के पहले गीतकार अनिल कुमार के इस जनपक्षधर वक्तव्य को भी सुन लें-“नवगीत त्रषित जनसाधारण के आत्मालाप को इस सहजता से अभिव्यक्त करता है कि कहीं भी पीड़ा की असहनीय विवशता अपने अनावरण की स्थिति में क्रांति का कारण न बन जाये। क्योंकि गीत का स्वभाव यही है और उसी की व्याप्ति भी है। इसकी सबसे बड़ी मौलिकता उसकी लय है, जो अत्यंत स्वाभाविक है। यदि यह लय अपनी स्वाभाविकता छोड़ती है तो कविता की तरह क्रांति और संघर्ष के लिए तत्पर प्रतीत होगी, जो गीत का स्वभाव नहीं है।” (गीत-गागर, अंक-11, पृष्ठ-37) जाहिर है कि नवगीत में जन-संघर्ष, जन-प्रतिरोध और जनक्रांति की भावना की अभिव्यक्ति के लिए प्रवेशनिषेध है।

मनुष्यों के द्वारा मनुष्यों का शोषण क्या है इसकी ओम प्रकाश सिंह की समझ भी संकीर्णतावाद के शिकंजे में फँसी दिखाई देती है। उनके हिसाब से दुर्बलों, असहायों, स्त्रियों और दलितों का शोषण ही शोषण है। बहुसंख्यक किसान-मजदूरों के उजरती श्रम से उत्पादित वस्तुओं के मूल्य में उसके श्रम का उचित हिस्सा या मुआबजा नहीं देना और पूँजीपतियों के द्वारा जन-सामान्य का शोषण तथा साम्राज्यवादी देशों के द्वारा अविकसित और विकासशील देशों का शोषण संभवतः शोषण नहीं है। शोषण की प्रक्रिया को समझने के लिए उन्होंने देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ के नवगीत का यह अंश उद्धृत किया है, कदाचित उन्हें नक्शल पंथ और अनेक सांस्कृतिक विद्रोहों की भारतीयता को कुचलने और राष्ट्रभक्ति में सेंध लगाने की मंशा भी इसी में विन्यस्त दिखाई देती है- "मरु में चले आये/ नाव के टूटे हुए मस्तूल हैं/ जेब में कुछ रेत होते फूल हैं/ हंस पंखी/ प्यास वाले/ छंद पथराये।” इस गीतांश में शोषण कहाँ है और कौन किसका शोषण कर रहा है यह जानने के लिए एक जासूस की नियुक्ति करनी होगी।

जगजाहिर है कि सोवियत रूस के विघटन के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके सहयोगी विकसित या पूँजीवादी देशों के पिट्ठू दार्शनिकों, विचारकों और साहित्यकारों ने ‘अंतवाद’ की शुरुआत की। शीतयुद्ध का अंत, कविता का अंत, कहानी का अंत, उपन्यास का अंत, महानायक का अंत, विचारों का अंत, यहाँ तक कि इतिहास का अंत इत्यादि। उनका भारतीय संस्करण अगर यह मानता है कि "कुछ गीतकार जन आंदोलन की बात करते-करते खुद ही पटरी से उतर गये" अथवा "कुछ तो नवगीत की धरती पर जनवाद का नारा देते हुए अपने टाट समेट कर चल गये" जैसी जुमलेवाजी करता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। यह बात दीगर है कि राजेन्द्र प्रसाद सिंह के हवाले से वह स्वयं भी मानने के लिए विवश है कि "मनुष्य का व्यक्तित्वमूलक कोई भी निकाय कभी विनष्ट या नष्ट नहीं होता, उसका रूपान्तरण, दिशान्तरण और विकास ही होता है।” कभी-कभी यह प्रक्रिया उलट भी जाती है। जो अवसरवादी लोग समाज की अग्रगामी विचारधारा और शक्ति से गद्दारी करके पुनः प्रतिगामी, प्रतिक्रियावादी और जनविरोधी जमात में शरीक हो जाते हैं, वहाँ उनका विकास नहीं होता, प्रत्युत पतन होता है। सच बात तो यह है कि जिन गीतकारों ने जन-आंदोलनों में सकारात्मक शिरकत की थी वे पटरी से उतरे नहीं हैं और न ही नवगीत की धरती पर जनवाद का नारा देने वाले अपने टाट समेट कर कहीं चले नहीं गये हैं। उनका रूपान्तरण और विकास हुआ है, दिशान्तरण नहीं हुआ है। यह एक विडंबना ही है कि नवगीत स्वयं अपने को जनबोधी और जनपक्षधर होने का खोखला दावा प्रस्तुत करके उन्हीं की जमात में होना चाहता है जिन्होंने गीत की धरती पर जनवाद का नारा दिया था, जबकि नवगीत अपने आरंभ से ही गैरप्रगतिशील और जनविरोधी रहा है।

एक वरिष्ठ गीतकार से रचनाएँ मँगवा लेने, उनके आत्मकथ्य पर संपादकीय कैंची चलाकर अपने संशोधित प्रारूप पर रचनाकार की स्वीकृति ले लेने तथा प्रकाशन की संपादकीय स्वीकृति दे देने बाद भी उन्हें ‘नयी सदी के नवगीत’ से सिर्फ इसलिए विस्थापित कर दिया गया कि वे जनगीत या समकालीन गीत के हिमायती हैं और रहे हैं। ऐसी स्थिति में इस सर्वशुद्धतावादी दृष्टिकोण की पड़ताल और पर्दाफाश के लिए इस संकलन में शामिल नवगीतकारों की गीत-दृष्टि का एक संक्षिप्त जायजा यहाँ गैरजरूरी नहीं होगा। इस संकलन के पहले ‘नवगीतकार’ सत्यनारायण हैं जो अपने सबसे ताजा नवगीत-संग्रह ‘सुनें प्रजाजन, सुनें’ की रचनाओं को गीत, नवगीत, जनगीत या नुक्कड़ गीत कहने में शर्म महसूस करते हैं, उन्हें कविता कहते हैं। इस संकलन के दूसरे भाग के अंतिम नवगीतकार यश मालवीय ‘पहल’ पत्रिाका में अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने के उद्देश्य से अपने नवगीतों को कविता और गीतकारों को कवि कहे जाने की हिमायत या सिफारिश करते हैं। दूसरे ही भाग के एक अन्य नवगीतकार वीरेन्द्र आस्तिक की निष्पत्ति है कि फ्अब गीत नवगीत के अंतर भेद समाप्त हो जाने चाहिए और गीत नवगीत को समग्र रूप से गीत समझना चाहिए क्योंकि नवगीत होने लिए शर्त यही है कि वह पहले गीत हो।” (धार पर हम, पृष्ठ-10) वीरेन्द्र आस्तिक का एक उद्धरण ओम प्रकाश सिंह ने भी अपने संपादकीय में उद्धृत किया है, वह भी काबिलेगौर है। उनके अनुसार "गीत की समकालीनता उसकी आलोचना की चिंता और उसके पूर्वग्रहों से मुक्ति की चिंता का कुल अर्थ यही है कि गीत जो काव्य की मुख्य धारा में एक तरह से पुनः आ रहा है, उसे समीक्षाओं व आलोचनाओं के केंद्र में आ जाना चाहिए।” अगर कोई यह मान ले कि ओम प्रकाश सिंह ‘पूर्वाग्रहों से मुक्ति की चिंता का अर्थ’ का मतलब नहीं जानते तो ज्यादती नहीं होगी।

‘नयी सदी के नवगीत’ के तीसरे भाग के एक नवगीतकार विनय मिश्र ने अपने एक मात्र गीत-संग्रह ‘समय की आँख नम है’ को नवगीत-संग्रह नहीं, बल्कि समकालीन गीत-संग्रह कहा है और अपनी स्वगत भूमिका में यह भी लिखा है कि "अपने समय के स्वरों को साधने के लिए कभी गीत ने ‘नवगीत’ का परिधान पहना तो उस नाविन्यता का उन्मेष गीत के ऐतिहासिक चरण का साक्षी बना किंतु शीघ्र ही राजनीतिक स्वतंत्राता का उल्लास चढ़ते ज्वार की झलक दिखलाकर भाटे में तब्दील हो गया और ठगा हुआ भारतीय मन अपनी त्राासदी को ढोता फिर नये सूर्योदय की प्रतीक्षा में जीने के लिए विवश होता चला गया। इस उहापोह और निराशा में डूबे समय की उम्मीदों को स्वर देने के लिए ही समकालीन गीत नये रूपाकार में बेचैनी का ताप लेकर प्रकटे और इनकी निर्मिति उधार की विचार ऊर्जा से नहीं बल्कि अपनी माटी की भाव-सरणियों, विचार एवं विचारधाराओं के आलोड़न-विलोड़न का परिणाम थी।” कुमार शिव ने भी अपने ‘आत्मकथ्य’ में गीत की हिमायत की है नवगीत की नहीं। उनके आत्मकथ्य में दो स्थानों पर जो नवगीत शब्द का उपयोग हुआ है वह संपादकीय मेहरवानी का नतीजा दिखाई देता है, क्योंकि उक्त स्थलों पर गीत की जगह ‘नवगीत’ शब्द के प्रयोग का कोई औचित्य नहीं दिखता।

‘नयी सदी के नवगीत’ की चयन-दृष्टि को भी कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। हालाँकि इसके बचाव में ओम प्रकाश सिंह की प्रशंसिका यशोधरा राठौर का कहना है कि रचनाकारों को चयन करने की स्वतंत्रता और स्वायतता हर संपादक का अधिकार है। निससंदेह है, लेकिन संपादकीय नैतिकता और रचनात्मक ईमानदारी जैसी साहित्य में कोई चीज भी होती है। प्रश्न है कि नचिकेता अगर जनगीत और समकालीन गीत के पक्षधर और प्रवक्ता होने के कारण इस संकलन में शामिल होने से वंचित हो जाते हैं तो रामदरश मिश्र, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, विद्यानन्दन राजीव, श्यामलाल शमी जैसे शीर्ष नवगीतकार विनोद निगम, कृष्ण वक्षी, सुधांशु उपाध्याय, राम कुमार कृषक, महेन्द्र नेह, गणेश गंभीर, देवेन्द्र कुमार आर्य, सुभाष वशिष्ठ, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, शैलेन्द्र शर्मा, विनोद श्रीवास्तव, हरीश निगम, देवेन्द्र सफल, राजेन्द्र वर्मा, हरशिंकर सक्सेना, हृदयेश्वर आदि ने क्या पाप किया था जो इस संकलन में शामिल होने से वंचित हो गये? क्या इन लोगों का धनंजय सिंह, जिनका एक भी नवगीत संकलन अब तक प्रकाशित नहीं है और जो पत्र-पत्रिकाओं में भी दूज के चाँद की तरह कभी-कभी ही दिखाई देते हैं तथा मुकुट सक्सेना, जिनका अब तक एक मात्र गीत और गजल का साझा संकलन ‘शब्द यात्रा पर हैं’ प्रकाशित है और ये भी पत्र-पत्रिकाओं में यदा-कदा ही दृष्टिगोचर होते हैं, से भी नवगीत के विकास में कम योगदान है? संकलित गीतकारों में कई लोग हैं जिनके चयन को सवालों के घेरे में रखा जा सकता है। ताज्जुब है कि अरुणा दुबे और राजकुमारी रश्मि के नवगीतों पर मधु प्रसाद के नवगीत भारी पड़ गये- क्यों और कैसे? जबकि उनकी रचनाएँ मधु प्रसाद के नवगीतों से अधिक समयसापेक्ष, युगसापेक्ष और समयसापेक्ष एवं सुगढ़ हैं।

यह देखकर हैरत होती है कि ‘नयी सदी के नवगीत’ के तीनों भागों में संकलित कुल पैंतालिस नवगीतकारों के कुल चार सौ पचास नवगीत में विषय-वस्तु, संवेदना, अनुभूति और रूपाकार-शिल्प के धरातल पर ऐसा एक भी नवगीत नहीं मिलता, जिसमें उस विषय-वस्तु, संवेदना, अनुभूति और रूपाकार-शिल्प का प्रयोग पिछली शताब्दी में न हुआ हो। संपादक ने नयी सदी के नवगीतों की विषय-वस्तु और संवेदना की विशिष्टता बतलाते हुए उसमें वैश्वीकरण या भूमंडलीकरण, उदारीकरण, इतिहास-बोध, वैज्ञानिक-बोध, अप संस्कृति, भ्रष्टाचार, महँगाई, नारी विमर्श, दलित विमर्श और शोषितों पर कलम चलाने का समर्थन किया है। क्या ये सारे तत्व पिछली शताब्दी के गीतों की वैचारिक अंतर्वस्तु में समाहित नहीं थे? ओम प्रकाश सिंह को मेरे कहे पर विश्वास नहीं हो तो वे वीरेन्द्र आस्तिक द्वारा संपादित ‘धार पर हम’ (सन् 1998) के संपादकीय ‘कबीराना साध’ पर एक सरसरी नजर डाल लें। सन् 1994-95 में लिखे गीतों के संकलन ‘कोई क्षमा नहीं’ की समीक्षा लिखते हुए भरत सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि इस संग्रह के गीतों में "मुक्त बाजार-व्यवस्था, उदारीकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण, पेटेंटीकरण, कमजोर तबकों को दी जाने वाली सहायता राशि की समाप्ति, विदेशी आयातों का मुक्तागमन और उसके साथ ही बेकारी, अशिक्षा, भूख, गरीबी, महँगाई, बढ़ती आवादी, जानलेवा बीमारियों का आयात, आतंकवाद, असुरक्षा, अपसंस्कृति, विदेशी मुद्रा-भंडार के नाम पर कर्ज का पहाड़, धर्म, जाति, क्षेत्रा के मिथ्या भेदों-उपभेदों को बढ़ावा, आत्महत्याओं का सैलाब, स्त्री को यौन-वस्तु में बदल डालना, प्रकृति ही नहीं मानसिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक प्रदूषण का बेतहाशा बढ़ते जाना, अमानवीयकरण, पाश्वीकरण, क्रूरता, विवेकहीन हिंसा, युवा पीढ़ी का अपराध और नशे में गर्क होते चले जाना और यौनाचारग्रस्त होते जाना आदि कारण हैं, जो डंकल की कोख से बहुत तेजी के साथ रक्तबीज राक्षस-शिशुओं की तरह उग रहे हैंय् का अंकन है। इन गीतों में नवगीत की तरह सिर्फ इन अमानवीय घटनाओं का उद्घाटन भर नहीं है, बल्कि तमाम अमानवीय स्थितियों के खिलाफ जनता को लामबंद होकर दीर्घकालीन संघर्ष चलाने का आह्नान भी है क्योंकि फ्हकीकत इतनी है कि जब वे (जनगीतकार) भूख के मारे किसानों को देखते हैं, गरीबों, मुफलिसों, बेकसों, बेसहारों को देखते हैं, सिसकती नाजनीनों और बेसहारा नौजवानों को देखते हैं, जब वे देखते हैं अमीरों के अहंकार को, हुकूमत के अत्याचार को, फटे-चिथड़े में लिपटे मजलूमों को और लुटेरे गद्दारों के शाहंशाही खजाने को, तब उनका हृदय बेकाबू हो जाता है, वे लाख चाहकर भी ख्वाब-भांवर के तराने नहीं गा सकते।” (भरत सिंह)

आधुनिकतावाद, अस्तित्ववाद, क्षणवाद और यथास्थितिवाद की कसौटी से जाँच करने पर ‘नयी सदी के नवगीत’ के अधिकांश गीत सौ कैरेट सोने की तरह खरे हैं। माहेश्वर तिवारी, सत्यनारायण, शांति सुमन, वीरेन्द्र आस्तिक, बृजनाथ श्रीवास्तव, अश्वघोष, मधुसूदन साहा, ओम धीरज, मधुकर अष्ठाना आदि के गीतों में अपने समय के सामाजिक यथार्थ से साक्षात्कार करने की चिंता झलकती है। सामाजिक अंतर्विरोधों की विसंगतियों, आर्थिक विषमताओं, राजनीतिक विद्रूपताओं और सांस्कृतिक विडम्बनाओं की निभिन्न परतों को उघारने की मंशा भी है इनमें। इन गीतों की बनावट और बुनावट में कहीं-कहीं कुछ कमियाँ अवश्य दिखायी देती हैं, इस पर गहराई से विचार करने के लिए अभी पर्याप्त अवसर नहीं है, कभी बाद में आवश्यकता हुई तो बातचीत की जायेगी। इन गीतों का संपूर्ण रचना-संसार शिकवा-शिकायत का मुखर दस्तावेज है। इनमें अपने समय के सामाजिक यथार्थ को समझने व उद्घाटित करने की नीयत भी दृष्टिगोचर होती है, अगर कुछ नहीं है तो वह है इस अमानवीय और वर्ग-विभाजित समाज को बदल कर अधिक मानवीय और शोषणमुक्त बनाने की चिंता, संघर्षशील शक्तियों को संगठित होकर अमानवीय व्यवस्था को बदलने का संकल्प और साहस उत्पन्न करने वाली प्रेरणा।

यह देखकर आश्चर्य होता है कि चार सौ पचास नवगीतों के इस संकलन में प्रतिरोध की कोई चहट सुनाई नहीं देती। अश्वघोष जैसे जनगीत से जुड़े गीतकार में, शांति सुमन जैसे भूतपूर्व जनगीतकार और जनवादी लेखक संघ से जुडे़ राम सेंगर में भी नहीं। पूरे संकलन में सिर्फ एक जगह पर, बृजनाथ श्रीवास्तव के एक गीत में प्रतिरोध की अनुगूँज सुनाई देती है-“चलो बदलें/ फटी चादर व्यवस्था की।” वैज्ञानिक जीवन-दृष्टि और परिवर्तकामी राजनीतिक चेतना के अभाव में उनका यह प्रतिरोध भी एक विभ्रम में फँसकर निष्क्रिय हो जाता है। गीत के अंत में, जहाँ गीत की अनुभूति को सर्वाधिक घनीभूत होकर एक निर्णायक मोड़ पर पहुँच जाना चाहिए था, वहाँ वे यह कहकर चुप हो जाते हैं कि "रोगिया चादर/ बदल कर हम नयी लायें/ फूल सुन्दर/ टाँक कर हम विश्व महकायें/ हमें होने/ लगी चिंता सुरक्षा की।” भरतीय जनता तो हर पाँच साल के बाद और कभी-कभार तो दो-ढाई साल में ही देश की रोगिया चादर बदल कर सुन्दर फूलों से विश्व को नहीं तो अपने देश और समाज को महकाने का प्रयत्न करती है, लेकिन क्या उनका सपना पूरा हो पाता है? आज की जटिल परिस्थितियों में केवल रोगिया चादर को बदलने की नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था को बदलने की जरूरत है और इस जरूरत की पूर्ति के लिए अपनी सुरक्षा की चिंता छोड़कर अपना संपूर्ण ध्यान समाज को बदलने वाले दीर्घकालीन संघर्ष पर केन्द्रित करने की आवश्यकता है।

नवगीत का प्रतिरोध अपनी तमाम आक्रामकता के बावजूद यथास्थितिवाद की निष्क्रियता में क्यों फँस जाता है, इसकी गंभीरता से छान-बीन होनी चाहिए। यह, दरहकीकत नवगीत का जीवन-दर्शन और यथास्थितिवादी रवैये में अंतर्निहित है। राजेन्द्र गौतम तो खुले आम घोषित करते हैं कि "फूल खिले हैं/ तितली नाचे/ आओ इन पर गीत लिखें हम/ भूख, गरीबी या शोषण से/ कविता-रानी को क्या लेना।” वामपंथ को गुमराही के अँधेरे में ढकेलने वाले हिंदी के शिखर आलोचक नामवर सिंह भी मानते हैं कि "गीत (लिरिक) में आप दुख, दर्द, वियोग की वेदना को और जीवन-दर्शन को अच्छी तरह व्यक्त कर सकते हैं और मिलनोच्छावास की भावना को अच्छी तरह व्यक्त कर सकते हैं। किंतु जब उसमें गरीबी, उत्पीड़न और आक्रोश की बात की जाती है तो उसकी गेयता नष्ट हो जाती है और वह लिरिक के बजाय ‘सांग’ बन जाता है।” राजेन्द्र गौतम दिल्लीवासी हैं। उन्हें नामवर सिंह की सलाह माननी ही चाहिए, इसलिए वह भी अनुशंषित कर देते हैं कि कविता-रानी को भूख, गरीबी या शोषण से कोई वास्ता नहीं रखना चाहिए। उसे अपनी कविता में तितलियों को लुभाने वाले सुन्दर फूलों के सौन्दर्य-चित्राण जैसे अति महत्त्वपूर्ण कार्य ही करना चाहिए।

राजेन्द्र गौतम के अन्य सहकर्मी योगेन्द्र दत्त शर्मा को महसूस होता है कि "आस्थाएँ हिलीं, सत्यनिष्ठा हिली/ प्यार, विश्वास, श्रद्धा, समर्पण हिले/ गीत के नाम पर, खुरदुरे शब्द कुछ/ गद्य की पंक्तियों में समाहित मिले।” ये सारे तत्व उन्हें कहाँ मिले, स्पष्ट बताना चाहिए। लेकिन इस सत्य के उद्घाटन-क्रम में उनकी इस गीत-रचना की लयात्मक तरलता, काव्यात्मकता और संगीतात्मक प्रवाह कितना क्षतिग्रस्त हुआ है, इसका अहसास उन्हें शायद नहीं है। इस गीत को पढ़ने पर ये गीत की पंक्तियाँ कम एक भोंड़ा वक्तव्य अधिक दृष्टिगोचर होती हैं। क्या ऐसे नामाकूल प्रयोगों से नवगीत को परहेज नहीं करना चाहिए?

देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ के विचार से अपने समय की सामाजिक "समस्याओं पर कोई नवगीतकार लिखेगा तो बिम्बों का सहारा लेगा और जब जनगीतकार लिखेगा तो सीधी-सपाट लट्​​ठमार शैली अपनायेगा। नवगीतकार हर मूल्य पर रचना में कला-तत्वों की रक्षा करना चाहेगा तो जनगीतकार अपने कथ्य-सम्प्रेषण के लिए कला-तत्वों की बलि देने में संकोच नहीं करेगां।” (नवगीत और उसका युगबोध, पृष्ठ-46) देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ के इस अभिकथन की सत्यता की परख के लिए हम ‘नयी सदी के नवगीत’ की अंतर्यात्रा कर सकते हैं। अपने समय के समाजिक यथार्थ की असंगतियों से साक्षात्कार ओम प्रकाश सिंह इन शब्दों में करते हैं-“खाली चूल्हा/ खाली चकिया/ खाली लोटा थाल/ भूख निगोड़ी/ काट रही है/ सिकुड़-सिकुड़े गाल/ खैनी खाकर/ मरी बुढ़ौती/ रामदास के द्वार।” सर्वशुद्धतावादी लोग तथा प्रयोगशील नव्यता और टटकी बिम्बधर्मिता को किसी गीत-रचना की खातिर नवगीत होने की पहली शर्त मानने वाले लोग अगर इसे नवगीत मानने से ही इंकार कर दें तो कोई अचरज नहीं होगा। दूसरी ओर इंदिरा गाँधी के बीस-सूत्री कार्यक्रम के ‘पक्के इरादे’ जैसे राजनीतिक प्रत्यय के खोखलेपन को उजागर करते हुए जनगीतकार रमेश रंजक लिखते हैं कि "कागजी पक्के इरादे/ चीड़ के झीने बुरादे/ की तरह झड़ जायेंगे/ जब किनारेदार/ लोहे की सतह पर आयेंगे।” अवसरवादी और छद्म मार्क्सवादियों की पोल खोलते हुए और उनकी बेरोजगारी की भयंकर मार से पिसती विवशता का मजाक उड़ाते हुए राजेन्द्र गौतम कहते हैं कि "कल तक लाल किताबें थे/ दाबे जो बगलों में/ मार्क्स जुगाली करते हैं/ अब डिंकल के बंगलों में/ सत्ता के गलियारे में ही/ लगते उनके फेरे।” इसी अंतर्विरोध का खुलासा करते हुए जनगीतकार (जो आजकल नवगीतकार कहलाने को लालायित हैं) अश्वघोष कहते हैं कि "मौसम इतने/ सर्द हो गये/ गुलमोहर के चेहरे देखो/ अमलतास-से जर्द हो गये।” अब देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ स्वयं तय करें कि कथ्य-संप्रेषण के लिए कौन कला-तत्वों की बलि दे रहा है और कौन सीधी-सपाट और लट्ठमार शैली का इस्तेमाल कर रहा है?

अंतिम बात। किसी समवेत संकलन में रचनाकार को सूचीबद्ध करने के चार तरीके आम व्यवहार में हैं- वयक्रमानुसार, रचनाकार के नाम के वर्णानुक्रमानुसार, विषयानुसार अथवा रचनाओं के स्तरानुसार। क्या ओम प्रकाश सिंह जगदीश श्रीवास्तव, मधुकर अष्ठाना, मधुसूदन साहा, मयंक श्रीवास्तव, राधेश्याम शुक्ल, भगवत दुबे, वीरेन्द्र आस्तिक, निर्मल शुक्ल, रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ आदि से भी उम्र में बड़े हैं या इनके नाम का वर्णानुक्रम इनसे आगे है अथवा इन लोगों से ओम प्रकाश सिंह के नवगीत ज्यादा स्तरीय हैं? आखिर किस आधार पर उनकी मौजूदगी ‘नयी सदी के नवगीत’ पहले भाग में दर्ज है? क्या उन्हें मालूम नहीं है कि वे इस संकलन के आरंभ में उपस्थित होते और उनकी रचनाएँ अगर डिजर्व नहीं करतीं तो लोग उन्हें याद भी नहीं करते और उनकी रचनाएँ अगर उन्हें आज के सर्वोत्तम नवगीतकार कहलाने का हकदार बनातीं तो वे बीच में कहीं भी रहकर या सबसे अंत में रहकर भी अपनी चमकदार उपस्थिति दर्ज करने में कामयाब होते। फिलहाल इतना ही।

- नचिकेता
आनंद विहार कालोनी, मौर्या ग्लासेज के दक्षिण,
पत्रालय-बहादुरपुर हाउसिंग कालोनी, पटना-800026.
मो. सं.-09471050921 और 09835260441.               


Nayi Sadi Ke Navgeet by Dr Om Prakash Singh. Reviewed by Nachiketa, Patna, Bihar

13 टिप्‍पणियां:

  1. कृष्ण नन्दन मौर्य27 अगस्त 2016 को 8:47 pm

    यथार्थपरक चिंतन

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  2. 'नई सदी के नवगीत'
    वेबपत्रिका 'पूर्वाभाष' में डॉ ओमप्रकाश सिंह द्वारा तीन खण्डों में सम्पादित 'नई सदी के नवगीत' नामक समवेत नवगीत संकलन की प्रख्यात नवगीतकार नचिकेता द्वारा विस्तृत आलोचनात्मक टिप्पणी को प्रकाशित किया गया है। नचिकेता जी ने नवगीत के उद्भव ,विकास ,प्रस्थापनाओं ,सम्पादकीय दृष्टि आदि विषयक डॉ ओमप्रकाश सिंह की वैचारिकी पर प्रश्न चिन्ह लगाए हैं तथा नवगीत के समकालीन परिदृश्य पर अपनी मान्यताओं को व्यक्त करते हुए अनेक ऐसी टिप्पणियां की हैं जिन पर अनेक लोगों की असहमति हो सकती है। मैंने इन समवेत संकलनों को देखा भी नहीं है अतः उनकी विषयवस्तु पर अपना विचार व्यक्त करना मेरे लिए सही नहीं है किन्तु नचिकेता जी ने जिन बिंदुओं पर अपने विचार व्यक्त किये हैं उन पर भी सर्वसम्मति संभव नहीं है। मैं स्वयं भी नवगीतकार होने का शायद भ्रम पाले हुए था कि मैं भी स्तरीय नवगीत लिखता रहा हूँ किन्तु न तो डॉ ओमप्रकाश सिंह और न ही नचिकेता जी के संज्ञान में मेरे नवगीतकार होने की कोई वास्तविकता आई। यहाँ यह व्यक्तिगत उल्लेख करना आवश्यक समझता हूँ मुझसे आदरणीय दादा माहेश्वर तिवारी जी ने उक्त संकलन के लिए नवगीत भेजने के लिए कहा था किन्तु मैंने विनम्रतापूर्वक इतना ही कहा था कि यदि डॉ ओमप्रकाश सिंह मुझसे कहेंगे तो मैं भेज दूंगा। आदरणीय तिवारी जी ने कुछ दिन बाद मुझे फिर याद दिलाया कि क्या रचनाएं भेज दी हैं मेरा उत्तर भी पूर्ववत था। मेरा डॉ ओमप्रकाश जी से न तो कभी साक्षात्कार हुआ और न ही फोन पर कोई संवाद हुआ है। नचिकेता जी ने मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'सुनो मुझे भी' की रचनाएँ पढ़ने के बाद मुझे फोन किया था तथा उनके द्वारा सम्पादित समवेत संकलन 'गीत वसुधा' के नए संस्करण में सम्मिलित करने के लिए नवगीत माँगे जिन्हें मैंने अपने दूसरे नवगीत संग्रह 'निषिद्धो की गली का नागरिक' की प्रति के साथ भेज दिया था। उसके बाद भी कई बार उनके घुटने के आपरेशन के समय और उसके बाद उनसे बातें हुईं। 'गीत वसुधा' के दूसरे संस्करण के बारे में मुझे कोई पता नहीं किन्तु मुझे खेद है कि समकालीन नवगीतकारों की लंबी सूची गिनाने में उन्हें मेरा नाम याद नहीं आया। नचिकेता जी के प्रस्तुत आलोचनात्मक आलेख को आधा पढने के बाद भी मैंने उन्हें फोन करके उनके लेख की आरंभिक मान्यताओं के आधार पर बातें की। मेरे लिए दोनों महानुभाव ही आदरणीय हैं तथा मुझे मेरी व्यक्तिगत उपेक्षा के सम्बन्ध में कोई शिकायत नहीं है क्योंकि किसी का उल्लेख करना या न करना उन्हीं पर निर्भर करता है तथा उनका विशेषाधिकार भी है। contd. jagdish pankaj

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  3. मैंने उक्त लेख को पूरा पढ़ लिया है तथा कुछ सवाल मेरे मन में भी उठे हैं। अतः अब प्रश्नगत संकलनों और उनमें उल्लेखित मान्यताओं पर विचार कर लिया जाए। यदि नचिकेता जी द्वारा उद्धृत प्रसंग सही है तो संकलन में नवगीत की ऐतिहासिक मान्यताओं और अवधारणाओं पर प्रश्नचिन्ह स्वाभाविक हैं तथा डॉ ओमप्रकाश की ऐतिहासिक समझ संदेहात्मक है। नवगीत का इतिहास कोई प्रागैतिहासिक घटना नहीं है। वह पीढ़ी अभी जीवित है जिसने नवगीत को स्थापित करने में अपने जीवन का अमूल्य समय और श्रम खर्च किया है। साहित्यकार अपने समय पर प्रतिक्रिया स्वरुप सर्जना करता है अतः किसी भी देश के साहित्य पर तत्कालीन परिस्थितियों और घटनाक्रम का प्रभाव पडना स्वाभाविक है। विश्व साहित्य को देखने से पता चलता है कि जब किसी देश या समाज में जितनी उथल-पुथल हुई उतना ही साहित्य भी प्रतिरोध और जनोन्मुख स्वरों को वाणी देता रहा है। यहां नचिकेता जी का विश्लेषण सही है कि भारत में भी विषयगत कालावधि में अनेक झकझोरने वाली घटनाएं हुईं जिन्होंने हिन्दी नवगीत को ही नहीं बल्कि हर भारतीय भाषा के साहित्य और अभिव्यक्ति की विभिन्न शैलियों को प्रभावित किया। राजनैतिक के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य ने जब नागरिक जीवन को प्रभावित किया तब साहित्य कैसे अछूता रह सकता था। फलस्वरूप कथ्य और शिल्प के अनछुए और नए रूप सामने आये। अतः नचिकेता जी का निष्कर्ष कि संकलन में नवगीत के काल निर्धारण की मान्यताएं ऐतिहासिक सत्य से मेल नहीं खाती, ज्यादा सही लगता है। कोई भी संग्रह अपनी गुणवत्ता में चाहे कैसा भी हो अपने प्रकाशन के बाद अपनी ऐतिहासिक महत्ता ग्रहण कर लेता है अतः सम्मिलित रचनाकारों के बारे में कोई न कोई विवेकसम्मत दृष्टि होना आवश्यक है ताकि युगबोध को व्यक्त करने में एक समग्रता प्रकट हो। अतीत और परम्परा को न तो नष्ट किया जा सकता है न ही दृष्टि से ओझल बल्कि उनका सम्यक विवेचन करते हुए समयानुकूल संशोधन करके आगे बढ़ाया जाता है। अनेक वरिष्ठ नवगीतकारों को स्थान न देकर और कुछ नाममात्र का लेखन करने वाले रचनाकारों को सुशोभित करने से सम्पादकीय नैतिकता पर सवाल उठता है कि क्या यह सब किसी षड्यंत्र के अन्तर्गत तो नहीं हो रहा।जिससे किसी विधा विशेष को अपहृत करके विकृत किया जाए और इतिहास की एकांगी दृष्टि को दुनिया के सामने एकमात्र सत्य के रूप में प्रकट कर दिया जाय। इस सम्बन्ध में नचिकेता जी का आकलन गलत नहीं कहा जा सकता। इसी के साथ-साथ गीत-नवगीत की प्रस्थापना में पत्र-पत्रिकाओं के योगदान के अन्तर्गत किसी संगठन के मुख पत्र या पत्रिका का उल्लेख करना तथा इस विषय पर पूर्ण समर्पण के साथ प्रयासरत पत्रिकाओं का उल्लेख न करना संकुचित सम्पादकीय दृष्टि का ही परिचय दे रहा है।
    उक्त आलोचनात्मक लेख के प्रकाशन के बाद कई विचारपटल और विमर्शसमूहों पर चर्चा भी आरम्भ हो गई है।विशेष रूप से डॉ राजेंद्र गौतम के गीत के मुखड़े को उद्धृत करके नचिकेता जी ने अपने मन्तव्य स्पष्ट किये हैं। नचिकेता जी वरिष्ठ नवगीतकार ही नहीं बल्कि प्रतिभासम्पन्न आलोचक भी हैं जो अपनी वैचारिकी और वैज्ञानिक सोच के कारण समादृत रहे हैं। आलोचना दृष्टि भी प्रहारात्मक और सुधारात्मक दोनों तरह की होती है। किसी रचना को उसकी समग्रता में ही ग्रहण करना चाहिए तथा विवेचन करते हुए अभिव्यक्ति की शैली को दृष्टिगत रखना आवश्यक है। यह सही है कि गीत में मुखड़ा उसका प्रस्थान बिंदु होता है जिससे गीतकार के रचना में आगे व्यक्त विचार का आभास होता है। उद्धृत गीत के मुखड़े से ही व्यंजना प्रकट हो रही है अतः किसी मुद्दे को विवादास्पद बनाने के बजाय एक सुधारात्मक परामर्श अधिक उपयुक्त रहता किन्तु गीत की प्रगतिशीलता या प्रतिक्रियावादिता से आगे नचिकेता जी के किसी अन्य निहितार्थ की गंध साफ़ झलक रही है जिसका प्रकटीकरण इसी लेख में आगे योगेंद्र दत्त शर्मा के गीत को उद्धृत करके दे दिया है। अपने मन्तव्य के समर्थन में आदरणीय देवेंद्र शर्मा 'इन्द्र' जी की मान्यता को भी इसी सन्दर्भ में प्रहार के रूप में प्रयोग किया गया है। यह कोई संयोग नहीं है कि दोनों गीतकार आदरणीय 'इन्द्र' जी से व्यक्तिगत रूप से प्रेरणा ग्रहण करते रहे हैं तथा मेरे संग्रह 'सुनो मुझे भी' की भूमिका भी 'इन्द्र' जी द्वारा लिखी गयी है। इसके प्रकारांतर क्या हैं यह नचिकेता जी ही अच्छी तरह जानते होंगे।
    बहरहाल डॉ ओमप्रकाश सिंह द्वारा सम्पादित समवेत संकलन की सम्पादकीय दृष्टि विवाद से परे नहीं है साथ ही नचिकेता जी के आकलन और विश्लेषण में भी सम्यक दृष्टि का अभाव प्रकट हो रहा है। मैं इस विषय में विनम्रतापूर्वक इतना ही कहना चाहूँगा कि निष्पक्षता के लिए 'राष्ट्रधर्म' का उल्लेख जरूरी नहीं तथा सारी खबरें आदमकद नहीं होतीं। सादर -जगदीश पंकज ----31/08/2016

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  4. प्रतिक्रियाएं
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    भाई जय चक्रवर्ती ने डॉ ओमप्रकाश सिंह द्वारा संपादित 'नयी सदी के नवगीतकार - खण्ड 1,2,3' का लोकार्पण एवं परिचर्चा-समारोह (भोपाल) से सम्बंधित पोस्ट अपनी फेसबुकवाल पर लगायी थी, जिस पर मैंने बधाई देते हुए पूर्वाभास पर प्रकाशित नचिकेता जी की समीक्षा का लिंक भी दिया। बातचीत हुई (हालाँकि अब जय भाई ने ज्यादातर टिप्पणियां डिलीट कर दी हैं). अवलोकनार्थ कुछ बची हुईं टिप्पणियां प्रस्तुत हैं :-
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    अवनीश सिंह चौहान: हार्दिक बधाई. प्रसन्नता की बात है कि इन संकलनों की एक समीक्षा पूर्वाभास पर प्रकाशित हो चुकी है
    Like • Reply • 2 hrs • Edited
    Jai Chakrawarti : पूर्वाभास को नवगीत के नये प्रतिमान, नवगीत का लोकधर्मी सौन्दर्यबोध तथा गीत वसुधा आदि ग्रंथों की भी समीक्षायें कराकर यथाशीघ्र प्रकाशित करनी चाहिए।
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    अवनीश सिंह चौहान: पूर्वाभास पर सभी प्रकार की स्तरीय समीक्षाओं का स्वागत है। आप चाहें तो स्वयं इनकी समीक्षाएं कर भेज सकते हैं।
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    Jai Chakrawarti : भाई, मैं समीक्षक कहाँ हूँ! बड़े - बड़े समीक्षक बैठे हैं, आप अपनी एप्रोच से यह कार्य बेहतर ढंग से करा सकते हैं। और नवगीत के शोधार्थियों के लिए यह बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण काम होगा, प्रकारान्तर से नवगीत के लिए भी। उम्मीद है आप मेरी बात समझ रहे हैं।
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    अवनीश सिंह चौहान: आप समीक्षक न भी सही, समीक्षा के मर्म को तो समझते ही हैं, उसकी आवश्यकता को भी ? आवश्यकता आविष्कार की जननी है- कहीं पढ़ा था ? आप भी प्रयास कर सकते हैं ? रही बात 'एप्रोच' की तो, भाईसाहब, पूर्वाभास किसी से आग्रह कर किसी पुस्तक पर समीक्षा नहीं करवाता। हां, कभी कोई आलोचक स्तरीय सामग्री भेज देता है, तो प्रकाशित अवश्य करता हूँ, बशर्ते पुनरावृत्ति न हो। नवगीत के शोधार्थियों के लिए यह जरूरी भी है। है कि नहीं ?
    Like • Reply • 1 hr
    Ramakant Yadav: अभी तो नयी सदी के नवगीत की समीक्षा पर बात कीजिए जय चक्रवर्ती जी।आपको इस समीक्षा के प्रकाशन पर कोई आपत्ति है क्या?आप नचिकेता जी को इतने हल्के में क्यों ले रहे हैं?क्या इतनी वैशिष्ट्यपूर्ण और श्रमसाध्य समीक्षा किसी एप्रोच का परिणाम है?यह तो वही प्रतिक्रियावादियों की बात हुई कि ज़रा उनको" भी तो देखो! बात बस इतनी कि नचिकेता ने समीक्षा लिखी और अवनीश जी ने छापा।इस समीक्षा में जाए बिना इसकी चर्चा किए बिना किसी दूसरी तरफ ध्यान भटकाने की ज़रूरत भी क्या?क्या इसका यह अर्थ निकाला जाए कि डॉ ओमप्रकाश सिंह ने जिनको छापा वे ओम प्रकाश जी के आदमी हो गये कुछ अन्यथा पढ़ने सुनने को तैयार ही नहीं?इससे क्या नवगीत का भला होगा?नवगीत किसी एक या दो की बपौती है क्या? इतिहासपुरुष बनने बनाने की आत्म मुग्धता से कृपया बाहर निकलें!

    Continued....

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  5. Jai Chakrawarti भाई रमाकांत जी, मैंने इस समीक्षा को बहुत ध्यान से पढा है, और मैं कई बिन्दुओं पर नचिकेता जी शत प्रतिशत सहमत हूँ। नचिकेता जी को और उनके तेवर को मैं आपसे बहुत पहले से जानता हूँ , और उनका सम्मान करता हूँ। उन्हें जो ठीक लगा, उन्होंने लिखा, लिखना भी चाहिए। इस पर ऐतराज किसे है? मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूँ कि हाल के वर्षों में नवगीत केन्द्रित जो दूसरे संग्रह आये हैं, उनकी भी पड़ताल हो, और पूर्वाभास जैसी पत्रिकाओं के जरिए पाठकों तक पहुँचे। आप क्यों इसे अन्यथा समझ रहे हैं। डॉक्टर प्रकाश. सिंह ने जो भी .काम किया है, वह न अंतिम है, न ऐतिहासिक है। कोई चाहे तो इसकी गलतियों को सुधारते हुए इसमें छूट गई चीजों को सामने ला सकता है। कालांतर में फालतू चीजें खुद ब खुद पीछे छूट जायेंगी।
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    Jai Chakrawarti: समीक्षा बिलकुल जरूरी है, और होनी भी चाहिए, छपनी भी चाहिए, किन्तु उतना ही जरूरी उस दृष्टि का भी होना है, जो एक समीक्षक को एक "जज" की हैसियत में पाठक के सामने खड़ा कर सके।
    अवनीश सिंह चौहान: तब तो आप अपनी दृष्टि का सदुपयोग करते हुए समीक्षा लिख ही सकते हैं?
    Jai Chakrawarti: और हाँ, जो आपने मेरे लिए " आत्ममुग्ध होने " जैसी बात कही है, मैं विनम्रता के साथ आपको बताना चाहता हूँ कि कृपया इस तरह की बातें लिखते समय थोड़ा रुका करें। किसी संकलन में छप जाने से अगर कोई इतिहास पुरुष बन ज़ाता, तो आप भी इतिहासपुरुष बन चुके होते। आप तो संपादक भी है, नवगीतकार भी,, गजलकार भी, और भी बहुत कुछ। .... तो भाई ऐसी तकलीफदेह बातें मत लिखिए, जो पलटकर आप पर भी वार कर दें। आलोचना - वालोचना अपनी जगह है, पर यार कुछ चीजें और भी हैं, जिनका हमें खयाल रखना चाहिए।
    अवनीश सिंह चौहान: दरअसल आपने पूर्वाभास का ठीक से अध्ययन किये बिना ही टिप्पणी कर डाली। क्या आप जानते है कि इससे पहले किसी संकलन पर पूर्वाभास में समीक्षा नहीं छपी ? इससे तो यही लगता है कि आप बिना पढ़े-लिखे ही टिप्पणी कर देते हैं। दूसरी बात यह कि 'अप्रोच' जैसे शब्दों का प्रयोग और समीक्षाओं की खोखली चिंता दर्शाने से पाठकों को मूल बात से भटकाने का आपका कार्य क्या ठीक लगता है ? जय भाई, जिस लहजे में आपने अच्छी चीजें देखने का मन उपर्युक्त टिप्पणियों में दर्शाया है, वह आपकी सोच और मन्तव्य को भलीभांति व्यक्त कर चुका है। सफाई देने से चीजें बदल नहीं जाएंगी। तिलमलाना अपने स्वभाव में नहीं है। बस आपको आपकी भाषा में जवाब जरूर दिया है। प्यार से, अपनेपन के साथ, जिसकी आपने डिमांड की है।

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  6. ‘पूर्वाभास’ में हाल ही में नचिकेता का एक लम्बा लेख आया है. इसमें ओमप्रकाश सिंह द्वारा सम्पादित ‘नई सदी के नवगीत’ (तीन भाग) पुस्तक के सम्पादकीय मंतव्यों से तो असहमति जताई ही गई है उनके चयन को भी चुनौती दी गयी है. ओमप्रकाश सिंह ने ‘नई सदी के नवगीत’ के तीनों भागों की भूमिकाओं में निस्संदेह अनेक ऐसी बातें कही हैं जिनसे सहमत होना नवगीत के किसी भी जानकार के लिए संभव नहीं, विशेषकर नवगीत के विकास के इतिहास का वर्गीकरण तो नितांत भ्रामक, तथ्यहीन और अवैज्ञानिक है, उस पर नचिकेता ने जो आपत्तियां उठाईं हैं, वे सही हैं. संयोगवश साहित्य-एकेडमी के प्रकाश्य ग्रन्थ “स्वातंत्र्योत्तर हिंदी साहित्य का इतिहास” के लिए लिखे गए मेरे 50 पृष्ठीय लेख की मान्यताएं भी नचिकेता जी की मान्यताओं से मेल खाती हैं. उन्होंने अपनी स्थापनाओं को इस लेख में विस्तार से प्रतिपादित किया है लेकिन यह भी विचित्र है कि स्वयं नचिकेता भी अनेक विरोधाभासों और पूर्वाग्रहों के शिकार नजर आते हैं. उन्होंने नवगीत की मूलभूत विशेषताओं को रेखांकित करते हुए लिखा है: “दरअसल नवगीत के उदय के पूर्व पारंपरिक गीत की मूल अवधारणा थी कि गीत नितांत निजी आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति का माध्यम है तथा गीत वैयक्तिक दुख-सुख तथा विरह-मिलन की घनीभूत अनुभूतियों, जीवन-दर्शन और मिलनोच्छवास की भावना को ही सही ढंग से व्यक्त कर सकता है, इसलिए गीत आत्मनिष्ठ होता है। नवगीत के उदय के बाद इस धारणा में परिवर्तन आया। नवगीत ने अपने अंतर्जगत में व्यक्तिनिष्ठता की जगह वस्तुनिष्ठता और नितांत निजी आत्मानुभूति की जगह सामाजिक चेतना के विविध् रूपों को अभिव्यक्त करने का जोखिम उठाया।” यहाँ नवगीत में जिस व्यक्तिनिष्ठता की जगह वस्तुनिष्ठता और नितांत निजी आत्मानुभूति की जगह सामाजिक चेतना का अस्तित्व बताया गया है, उससे किसी की असहमति नहीं हों सकती. यद्यपि यह कोई मौलिक स्थापना भी नहीं हैं. 1976 में सप्तसिंधु में मेरा एक लम्बा लेख छपा था “नवगीत में आत्मानुभूति का स्वरूप”. उसमें इस मुद्दे का विस्तार से विश्लेषण करते हुए ये स्थापनायें की गई थी. जब 1984 में मेरी पुस्तक “हिंदी नवगीत रू उद्भव और विकास” आई तो उसमें भी इन तथ्यों को रखा गया था. तात्पर्य यह है कि नचिकेता जी हों या कोई अन्य, हर समझदार व्यक्ति नवगीत की विशिष्टता इसी रूप में स्थापित करेगा. लेकिन बार-बार इस लेख में नवगीत की विशेषताओं में “व्यक्तिवादी, अस्तित्ववादी और आधुनिकतावादी” प्रवृत्तियों को गिनवाया है. दो दशक पहले तक जनगीत का अलग बैनर उठाये रह कर वे नवगीत का विरोध करते रहे. फिर न जाने किन विवशताओं के कारण नवगीत से उन्हें जुड़ना पडा. नवगीत की प्रगतिशील भूमिका को नजरंदाज किया ही नहीं जा सकता. पर कुछ व्यक्तियों को लक्ष्य बना कर उनके गीतों का तोड़-मरोड़ कर जो अनर्थ करते हैं, उसका लक्ष्य अपनी नापसंदगी वाले लेखकों को “व्यक्तिवादी, अस्तित्ववादी और आधुनिकतावादी सिद्ध करना होता है. इसका एक मजेदार उदहारण इस लेख में देखा जा सकता है. उन्होंने मेरे गीत का एक अंश उद्धृत कर उसकी मनमानी व्याख्या कर डाली है. जानबूझ कर अर्थ का अनर्थ करना इसी को कहते हैं. पूरा गीत उद्धृत करते तो उनकी कलई खुल जाती, गीत का सिर्फ मुखड़ा उद्धृत किया है.
    एक दसवीं क्लास का बच्चा भी इस व्यंग्य को समझ जायेगा कि भूख, गरीबी या शोषण को नजरंदाज कर सिर्फ फूलों और तितलियों की बात करने वाले गीतकारों और शोषक सत्ता की दुरभिसंधि की खबर इस गीत में ली गयी है. यदि यह बात नचिकेता जी को समझ में नहीं आई है तो वे दया के पात्र हैं और यदि समझने के बाद जानबूझ कर वे यह टिपण्णी कर रहे हैं तो उनकी चालाकी साहित्यिक बेईमानी कई जाएगी. नवगीत का यही दुर्भाग्य है कि या तो उसे तटस्थ आलोचक नहीं मिले हैं और यदि कही तटस्थ आलोचना हुई भी तो अपने को पुरोधा के रूप में स्थापित न देख कर कुछ नवगीतकार और नवगीत-आलोचक ऐसी ही साहित्यिक बेईमानी पर उतर आते हैं. नवगीत को दरकार है ऐसे आलोचक की जो आत्म-मुग्धता से मुक्त हो.

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  7. राम सेंगर @ फेसबुक
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    "इस विवाद की सच्चाई जो भी हो। क्यों नचिकेता ऐसा सोचते हैं इसके पीछे उनकी मूल्यदृष्टि और तर्क हो सकते हैं। लेकिन राजेंद्र गौतम जी सुना है आप भी तो आलोचक, समालोचक क्या-क्या हैं; अपनी कविता के चरित्र और अपने कवि के सच को तो आप भी बखूबी जानते ही होंगे। इसमें आपा खोने जैसी तो कोई बात नहीं है। आपसी बातचीत से एक दूसरे को ठीक से समझ या समझा भी सकेंगे आप लोग।" - राम सेंगर

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  8. "अवनीश सिंह चौहान जी, अंग्रेजी के ही सही पर हैं तो आप भी भाषा के और साहित्य के ही अध्यापक. इसके बावजूद आप यह लिख रहे हैं , यह देख कर आश्चर्य हुआ. भाषा साहित्य में इतने इकहरे रूप में क्या कभी काम करती है जिस रूप में आप देख रहे हैं. 'कविता' की अपेक्षा अकेला ' कवितारानी' शब्द ही पूरे सन्दर्भ को व्यंग्यात्मक बना देता है, लहजा ही कविता में अर्थ-निर्धारण करता है. मेरा मंतव्य वह होता जिसका निष्कर्ष आप ने निकाला है अर्थात मैं सुखद एवं सुगन्धित वातावरण में गीत लिखने की बात कर रहाहूँ तब मैं इतना ही लिखता: ''फूल खिले हैं,/ तितली नाचे,/ आओ इन पर गीत लिखें हम'' कोई भी लेखक यह लिखने का रिस्क नहीं ले सकता "भूख, गरीबी या शोषण से/ कविता-रानी को क्या लेना।” ज़रा फैज़ की कविता 'मौजू-ए-सुखन' पढ़िए और निर्णय लीजिये कि वे कविता से क्या चाहते हैं? गीत की टेक संकेतक होती है व्याख्यायक नहीं. मूल संकेत उस में मौजूद है. आपकी बात को ही एक मिनट के लिए सही मान लें तो मुखड़ा एक जिज्ञासा तो पैदा करता ही है कि कवि क्या कहने जा रहा है? क्या मानलें कि नचिकेता जी ने पूरा गीत पढ़ा ही नहीं? यदि पूरा गीत पढ़े बिना वे अपना मंतव्य देते हैं तो यह प्रबुद्ध आलोचक की विशेषता नहीं है और यदि पूरा गीत पढ़ कर यह लिखा गया है तो यह जानबूझ कर पाठक को भरमाने के लिए लिखा गया है. यहाँ दूसरी ही सम्भावना अधिक है और आलोचक के पूर्वाग्रह की परिचायक है. दिल्ली में रहने के कारण उनका मुझे नामवर सिंह की सलाह मानने का निष्कर्ष भी उनके मन में बैठी विषाक्तता का परिचायक है. ऐसे में तटस्थ आलोचना की अपेक्षा व्यर्थ है."- डॉ राजेंद्र गौतम

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  9. राम सेंगर जी, डॉ राजेन्द्र गौतम जी एवं जगदीश पंकज जी की गौतमजी के नवगीत पर टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए उनके नवगीत के साथ कुछ और टिप्पणियां यहाँ प्रकाशित करना उपयुक्त लगता है :

    नवगीत :
    “फूल खिले हैं तितली नाचे
    आओ इन पर गीत लिखें हम
    भूख, गरीबी या शोषण से
    कविता-रानी को क्या लेना

    महानगर की चौड़ी सड़के
    इन पर बंदर-नाच दिखाएं
    अपनी उत्सव-संध्याओं में
    भाड़ा दे कर भाँड बुलाएं
    हम हैं संस्कृति के रखवाले
    इसे रखेंगे शो-केसों में
    मूढ़-गंवारों की चीखों से
    शाश्वत वाणी को क्या लेना

    लिए लुकाठी रहा घूमता
    गली-गली सिर-फिरा कबीरा
    दो कोड़ी की साख नहीं थी
    कैसे उसको मिलता हीरा
    लखटकिया-- छंदों का स्वागत
    राजसभा के द्वार करेंगे
    निपट निराले तेरे स्वर से
    इस ‘रजधनी’ को क्या लेना। - डॉ राजेन्द्र गौतम
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    मेरी फेसबुक वाल पर चर्चा से ली गयीं कुछ टिप्पणियां:
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    अब उनकी उम्र हो गयी है। कुछ दिन पहले बीमार भी थे। लेकिन उन्हें शुद्ध आलोचक कहना समझना ठीक नहीं।- भारतेंदु मिश्र
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    "आदरणीय गौतम जी, गीत के बंध कुछ भी कहते हों, किन्तु इस गीत का मुखड़ा ठीक नहीं है। मुखड़ा जिस सुखद एवं सुगन्धित वातावरण में गीत लिखने की बात करता है, उसमें न तो कहीं पर व्यंग्य दिखाई देता है और न ही प्रतिरोध का स्वर सुनाई पड़ता है। यह बात आलोचक होने के नाते आप भी समझते होंगे? यदि नहीं भी समझते हैं तो एक आलोचक को दूसरे आलोचक के कहे को किस प्रकार से लेना चाहिए यह तो आप जानते ही होंगे? हाँ, नचिकेता जी की यह टिप्पणी पूर्वाभास पर प्रकाशित है, किस सन्दर्भ में? पढी जा सकती है। "- अवनीश सिंह चौहान
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    "राजेन्द्र गौतम जी । अगर नचिकेता जी की टिप्पड़ी को ध्यान से पढ़ा जाए तो ऐसा लगता हैकि आपके रचना कर्म और व्यक्तित्व पर उन्होंने वही व्यंगात्मक लहजा अपनाया है जो आपने वस्तुतः आपने अपने गीत में अपनाया है।कविता व्यंगात्मक हो सकती है पर दृष्टि इतनी भी न खो जाए कि सृजन और निर्माण के तत्व ही न दिखाई दें। भूख गरीबी और शोषण के खिलाफ आप क्या कहते जान पड़ते हैं इस गीत में? आपकी प्रतिरोधी आवाज कहां है? कविता रानी को ही तो आपने जिस तिस तरह से पूरे गीत में महिमा मंडित किया है! अगर कविता रानी के पक्ष में आप नहीं हैं तो अन्याय अत्याचार शोषण का पक्ष क्या आप रख सके हैं?क्या आपका व्यंग्य यहां अपने को अस्मर्थ पा रहा है? क्या जरूरत थी पूरे गीत को व्यंगात्मक बनाने की? आखिर कोई क्यों न माने कि आप फूल और तितली पर ही गीत लिखने का आह्वान कर रहे हैं? प्रारम्भ से लेकर अंत तक कहीं भी आपकी भूख गरीबी ने करवट नहीं बदली! आपने जिस लहजे की बात की है संभवतः वह लहजा नचिकेता जी को नागवार गुजरा होगा क्योंकि वे शब्दों लहजों और मंशा को किसी से भी अच्छा समझने की क्षमता रखते हैं। यह गीत का निहितार्थ यह भी हो सकता है कि हम कैसे भूख गरीबी औरशोषण को फैशन की तरह इस्तेमाल कर प्रगतिशील और प्रतिरोधी अपने को सिद्ध कर ले जाते हैं। पूरे गीत में भूख गरीबी शोषण को राजेन्द्र गौतम जी ने कौन सा अर्थ देना चाहा है? यदि आशा कुछ बची ही नहीं तो फूल और तितली पर कविता लिखने का बुलावा गीतकार का सोचा समझा निर्णय होना ही चाहिए!क्या गीत यह अर्थ निर्थारण नहीं करता कि भूख गरीबी और प्रतिरोधी स्वरों की ऐसी तैसी हो रही है तो अच्छा है फूल तितली पर गीत लिखना क्योंकि कविता रानी से तो हमें मधुर सम्बन्ध बनाए ही रखना है। हां आप रिस्क नहीं ले रहे हैं। आप चलन में हैं। आजकल ऐसी ही प्रगतिशीलता चलन में जो है! संक्षेप में इतना ही आपने मुखड़े को सही तरीके से नहीं कहा है। मुखड़े का स्वर लहजा निश्चित रूप से प्रतिरोधी नहीं है।जबकि मुखड़ा ही सारे शरीर की जान होता है।कविता रानी तो आपका ही शब्द है। क्या आपने इस शब्द के आगे समर्पण नहीं कर दिया है?और हां जो लोग नचिकेता को बूढ़ा मन्द बुद्धि बता रहे हैं वे यह जान लें कि वे अब भी होशोहवास में हैं और इतना काम कर रहे हैं जो वे शायद कभी नकर पाएं।समीक्षा पर असहमति होना अच्छा है पर किसी को विषाक्त बता देना निहायत अनुचित है।" - रमाकांत यादव

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  10. फेसबुक पर श्री राजेंद्र गौतम के नवगीत पर एक और टिप्पणी
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    आप अपने गीत को प्रगतिशील कहने पर क्यों इतना जोर दे रहे हैं राजेन्द्र गौतम जी? हां मुर्दा प्रगतिशीलता के शव को जरूर सजाकर आप रुदाली गा रहे हैं। अब मुर्दा या दिखावटी प्रगतिशीलता का सिर काटो या पैर क्या फर्क पड़ता है। अच्छा है नचिकेता जी ने सिर काटकर उसके मनो-मस्तिष्क की जांच पड़ताल कर ली। पता नहीं आप अपने गीत को प्रतिरोध की किस श्रेणी में रख रहे हो! मैं फिर यह बात कहना चाहूंगा कि यह गीत निश्चित रूप से प्रतिरोधी नहीं है। प्रतिरोधी साहित्य प्रतिरोध करता दिखाई देता है। गीत नवगीत में प्रतिरोध के नाम पर यत्र तत्र ऐसे ही झूठे मन गढ़न्त और मृतप्राय प्रतिरोध के शव जन पक्ष पर अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रहे हैं। राजेन्द्र गौतम जी आपका तो विशद अध्ययन है गीत नवगीत पर। नचिकेता को दोष देने के बजाय क्या आप बतायेंगे कि कितने नवगीतकार जनपक्षों को अपने गीतों में पूरी समझ और समग्रता से उठा पा रहे हैं? इन गीतकारों की वैचारिकी इतनी पुअर है कि हर गीत को आप खारिज कर दो। इन खारिज करने योग्य गीतकारों नवगीतकारों में कुछ कथित बड़ों को भी शामिल करना चाहूंगा। मैं गीत नवगीत में इसे संकट की तरह देखता हूं। कृपया अपने इस गीत को प्रगतिशील और प्रतिरोधी न कहें। क्योंकि इसमें कहीं से भी कोई प्रतिरोधी आहट नहीं आ रही है। यह हो सकता है कि आपके पक्ष में ज्यादा लोग आ जाएं पर यह आपकी विजय की निशानी नहीं होगी। साहित्य में तो अल्पमत को ही जीवन्त और सच्चा मान लेने में समझदारी दिखाई देती है। आपकी नचिकेता से अनबन हो सकती है पर उनके विश्लेषणों संकेतों को झुठलाया नहीं जा सकता। जनपक्ष की उनको व्यापक समझ है। हो सकता है कहीं उनसे चूक हो रही हो पर आप पहले अपने गीत कर्म को भी समझ लें। कई बार जो हम कहना चाहते हैं सही तरीके से नहीं कह पाते। अक्सर यह हमारी वैचारिक प्रतिबद्धता की कमी की वजह से भी होता है और शिल्पगत समस्या की वजह से भी। हमें पता है कि गीत नवगीत में गुट बने हुए हैं। सामन्ती सोच वाले मठाधीशों का प्रभुत्व है यहां। ये जिसको चाहें बढ़ाएं जिसको चाहें घटाएं। निश्चित रूप से आपका गुट बड़ा है और नचिकेता का छोटा। इसलिए कृपया बहुमत पर न जाएं। यथास्थितिवादी और वर्चस्ववादी यही चाहते हैं कि वे जन पक्ष के पैरोकार बन कर असली प्रतिरोध को दबा दें। आपसे निवेदन है कि कृपया इसे व्यक्तिगत न लें और गीत नवगीत के हक में इस चर्चा को व्यापक बनाएं। अपनी कमियों कमजोरियों को देखने में अहमन्यता आड़े नहीं आनी चाहिए। अवनीश जी को मैं जानता हूं। मुझे लगता है कि वे आपके गीत को समझने की योग्यता रखते हैं। वे उन कुछ लोगों में हैं जो गीत और गीतकारों के पाखंडी चरित्र पर बारीक नजर रखते हैं। कृपया आप बहस को व्यक्तिकेन्द्रित न बनाकर गीत केन्द्रित बनाएं। आप जैसे काबिल गीतकार से हम यही उम्मीद रखते हैं। और हां नचिकेता पर जो लोग गन्दा कमेंट कर रहे हैं मैं फिर कहना चाहूंगा कि वे न तो नचिकेता को जानते हैं न ही उनके रचना कर्म को। गीत नवगीत को सुधारने संवारने और एक दिशा देने में नचिकेता का बहुत बड़ा योगदान है। उनके बिना कोई भी गीत कथा अधूरी ही मानी जाएगी।"- रमाकांत यादव, रायबरेली

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  11. नवगीतकारों का वैचारिक अंतर्विरोध
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    "नई सदी के नवगीत" के वैचारिक अंतर्विरोध या नवगीतकारों में वैचारिक अंतर्विरोध है यह? जिस तरह से नचिकेता जी के समीक्षात्मक/आलोचनात्मक आलेख पर टिप्पणियां हो रहीं हैं उनसे एक बात तो अवश्य ही निकलकर आती है कि अंतर्विरोध नवगीतों में नहीं बल्कि नवगीतकारों में है और उसके तथाकथित आलोचकों में है।साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है कि समस्त नवगीतकार खेमे में विभाजित होकर अपने अपने शिविरों में अपनी महत्ता का शंख बजा रहे हैं।यहाँ एक प्रश्न लाज़िमी है कि "क्या यह तय हो चुका है कि नवगीत क्या है यदि हाँ तो फिर तथागत/तथाकथित नवगीतों पर चर्चा और विमर्श क्यों??" क्या केवल एक दूसरे से आगे बढ़ने और नवगीत विधा का मसीहा बनने की कोशिश नहीं है यह?? कुछेक मुट्ठीभर लोगों ने ही ठेका ले रखा है क्या नवगीत का?? चाहे डॉ ओम प्रकाश सिंह जी हों या फिर नचिकेता जी दोनों लोग अपनी आत्मा से पूछें कि क्या उन्होंने पूर्ण निरपेक्षता के साथ नवगीत के साथ न्याय किया अथवा क्या समस्त नवगीतकारों को समाहित किया अपनी पुस्तकों में??
    ऐसा लगता है सभी बहुत जल्दी में हैं और एक दूसरे को कमजोर दिखाने की होड़ में शामिल होकर एक दूसरे की टांग में लँगी लगाते चले जा रहे हैं।सिंह साहब और नचिकेता जी आप दोनों ही ने बहुत से नए नामों को पहले कभी वर्णित नहीं किया। क्यों?? क्या वे भूलवश छूटे या फिर जानबूझकर छोड़ दिए गए?? ऐसा पहले भी हुआ था गुलाब सिंह जी के साथ जो कि छूटे नहीं थे छोड़ दिए गए थे।आज भी हो रहा है।गुटबाजी ने नवगीत के साथ क्या किया इसे सभी समझते हैं,जानते हैं लेकिन आदत से मजबूर हैं।
    क्या आत्ममंथन की आवश्यकता नहीं है?? आत्मश्लाघा की इतनी बड़ी कीमत कौन चुकायेगा? स्यात् इस पर भी कभी बात हो......!!
    मेरी टीप निरर्थक उपजते विद्वेष से उद्भूत पीड़ा भी है।
    अवनीश त्रिपाठी, सुल्तानपुर,उ प्र

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  12. यह सारस्वत कार्य है!कुछ न करने से कुछ करना अच्छा हैं। भले ही नवगीत के नाम पर सही हिंदी का गीतिकाव्य और रचनाकार तो छपेंगे ही। इससे हिंदी का भला तो अवश्य होगा; भले ही नवगीतकारों की गुटबंदी कम न हो।डॉ शम्भू नाथ सिंह और स्व.राजेंद्र प्रसाद सिंह के कार्यकाल में जितनी गुटबंदी थी वह अब तो बढ़कर कई गुनी हो गयी है। अबतो नवगीतकारों के अलग-2 खेमे बन गए हैं।और अहंकार इतना है हर खेमे में कि प्रत्येक खेमा अपने को नवगीत का महान शब्द शिल्पी समझता है। पता नहीं इस अहंकार का सत्यानाश कब होगा? अपने-2नवगीत सम्मेलनों में सब बड़ी-2 बातें करते हैं।सत्य हैं आठ कनौजिया नौ चूल्हे की उक्ति चरितार्थ होती है। यद्यपि मुझे नवगीत से कुछ लेना-देना नहीं है तथापि यह गुटबंदी तो समाप्त होनी चाहिए। नवगीत के नाम पर किसी को निरस्त कर देना और किसी को रख लेना,यह तानाशाही नहीं तो और क्या है? साहित्यकार होने से पहले आदमी होना जरूरी है। अरे भाई!जिससे गुटबंदी को बल मिले ऐसे काम करते क्यों हो?आप अपने को महान नवगीतकार/साहित्यकार बताने वाले होते कौन हैं?अरे आपने गीत लिख दिया अब बाक़ी काम समीक्षकों पर छोड़ दीजिये कि आपका गीत किस कोटि का है?लेकिन यहां तो निर्णय भी ये ही भले मानस करेंगे? जज भी खुद और मुद्दई भी खुद?यह सब मैं अकारण ही नहीं लिख रहा हूं। मैंने इन नवगीतकारों के कई शिविर तटस्थ होकर देखे हैं और सुने हैं। - डॉ महेश दिवाकर

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  13. कुछ भी हो नचिकेता के प्रस्तुत लेख में राजेन्द्र गौतम की प्रारंभिक समालोचना पुस्तक -हिन्दी नवगीत का उद्भव और विकास -का नाम न लिया जाना उनकी दुर्भावना से प्रेरित ही लगता है| ज़रा सोचिए कि अपने ही शहर के -सत्यनारायण -का जिक्र नचिकेता क्यों नहीं करते ?जिनका गीत बिहार प्रदेश का गीत स्वीकार किया गया|माहेश्वर तिवारी की रचनाधर्मिता का उनके हिसाब से क्या मूल्य है ..इन कई सवालों पर नचिकेता जी नए नवगीत के रचनाकारों को भ्रमित करते है|जबकि राधेश्याम बंधू जैसे व्यक्ति स्तरहीन काम को वे अत्यंत महत्वपूर्ण मानते है और उसका उल्लेख भी करना आवश्यक समझाते हैं |इसीलिए मेरा मानना है उनकी दृष्टि धुंधली हो गयी है|
    *भारतेंदु मिश्र

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