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शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

स्मृति मैडम : रह गईं स्मृतियाँ, रह गया सन्नाटा... — अवनीश सिंह चौहान


जीवन में कुछ दृश्य ऐसे होते हैं, जो घटित तो कुछ ही क्षणों में होते हैं, किन्तु स्मृति में आजीवन ठहरे रहते हैं। समय बीत जाता है, परिस्थितियाँ बदल जाती हैं, लोग आगे बढ़ जाते हैं, पर वे क्षण मन के किसी कोमल कोने में वैसे ही जीवित रहते हैं। स्मृति मैडम से हुई मेरी अंतिम बातचीत ऐसा ही एक क्षण है।

उस दिन सुबह का समय था। पल्लवी मैडम और प्रियंका मैडम, स्मृति मैडम से वीडियो कॉल पर बात कर रही थीं। मेरी केबिन से थोड़ा आगे कॉरिडोर में वे दोनों खड़ी थीं। मैं भी प्रतिदिन की भाँति घर से विश्वविद्यालय पहुँचा था। चलते-चलते अनायास मेरी दृष्टि मोबाइल की स्क्रीन पर चली गई। देखा— स्मृति मैडम बिस्तर पर लेटी हुई थीं। बीमारी ने उनके शरीर को अवश्य थका दिया था, पर उनके चेहरे की वही परिचित, सहज मुस्कान अब भी बनी हुई थी, जिसे हम सब पहले से जानते थे।

मैं कुछ क्षणों के लिए वहीं ठिठक गया। मन में आया कि उनसे बात कर लूँ। मैंने पल्लवी मैडम से संकोचपूर्वक पूछा, "क्या मैं भी स्मृति मैडम से बात कर सकता हूँ?" उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के मोबाइल मेरी ओर कर दिया।

मैंने उनका कुशल-क्षेम पूछा और स्वास्थ्य के विषय में जानना चाहा। उन्होंने धीमे स्वर में उत्तर दिए, पर उनके चेहरे पर वही आत्मीय मुस्कान थी, जिसे मैंने अनेक बार अपने कॉरिडोर में देखा और महसूस किया था। जब-जब वे मेरे कक्ष के सामने से गुज़रती थीं, मैं सहज ही पूछ बैठता, "कैसी हैं, मैडम?" और वे मुस्कुराकर कहतीं, "ठीक हूँ।" उस छोटे-से संवाद में भी इतना अपनापन और स्नेह होता था कि दिन भर मन प्रसन्न बना रहता था।

उस दिन भी उन्होंने अपनी अस्वस्थता को मानो पीछे छोड़ते हुए मुझे ढेर सारा स्नेह दिया। यह स्पष्ट था कि बीमारी शरीर पर भारी पड़ रही थी, किन्तु उनके व्यक्तित्व की ऊष्मा, उनका वात्सल्य और दूसरों के प्रति उनकी चिंता तनिक भी कम नहीं हुई थी। आज सोचता हूँ तो लगता है— वह केवल बातचीत नहीं थी; शायद वह उनकी ओर से मिला अंतिम स्नेह-स्पर्श था।

जब उस अंतिम भेंट को स्मरण करता हूँ, तब उनके व्यक्तित्व के अनेक रूप एक-एक करके आँखों के सामने उभर आते हैं। स्मृति मैडम हमारे विश्वविद्यालय में मार्केटिंग एवं ब्रांडिंग की एसोसिएट डायरेक्टर थीं, किन्तु उनका परिचय केवल उनके पद तक सीमित नहीं था। उनके साथ एक सहकर्मी के रूप में बिताए गए दिन आज स्मृतियों की अमूल्य निधि बन चुके हैं। हमारे कॉरिडोर में उनका होना किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति भर नहीं था; वह पूरे वातावरण की जीवंतता का पर्याय था। उनके कक्ष के बाहर लोगों का आना-जाना लगा रहता था। विद्यार्थी हों, शिक्षक हों या कर्मचारी— हर किसी के लिए उनके दरवाज़े सदैव खुले रहते थे। उनके आसपास संवाद था, आत्मीयता थी और ऐसा विश्वास था, जो सहज ही लोगों को उनकी ओर खींच लाता था।

उनके जाने के बाद ही यह गहराई से अनुभव हुआ कि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति केवल एक कुर्सी को रिक्त नहीं करती, वह पूरे परिवेश का स्वर बदल देती है।

आज वही कॉरिडोर है, वही दीवारें हैं, वही दरवाज़े हैं; लेकिन सब कुछ जैसे बदल गया है। जहाँ कभी हँसी की धीमी-सी आहट सुनाई देती थी, वहाँ अब एक गहरा सन्नाटा पसरा है। कई बार उस ओर जाने का मन होता है, पर कदम स्वयं ठिठक जाते हैं। रिक्त कुर्सियाँ भी कभी-कभी बहुत कुछ कहती हैं।

ऐसे क्षणों में प्रख्यात नवगीतकार दिनेश सिंह की पंक्तियाँ अनायास स्मरण हो आती हैं—

लो वही हुआ जिसका था डर,
ना रही नदी, ना रही लहर।

सचमुच, लगता है जैसे हमारे विश्वविद्यालय की एक जीवनदायिनी धारा अचानक थम गई हो।

आज विश्वविद्यालय में आयोजित श्रद्धांजलि सभा ने भी इस क्षति की गहराई को और अधिक स्पष्ट कर दिया। सभागार खचाखच भरा था, किन्तु वातावरण असाधारण रूप से शांत था। मंच का संचालन कर रहे मानवर्धन साब की भर्राई हुई आवाज़ बता रही थी कि शब्द भी कभी-कभी दुःख का भार उठाने में असमर्थ हो जाते हैं। कुलपति महोदय श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए भावुक हो उठे। उनकी आँखों की नमी बहुत कुछ कह रही थी। डीन मैडम बोलते-बोलते स्वयं को रोने से रोक न सकीं।

इसके बाद दो मिनट का मौन रखा गया।

वह केवल दो मिनट का मौन नहीं था; वह उन असंख्य स्मृतियों का मौन था, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर लिए बैठा था। उस मौन में शब्द नहीं थे, केवल स्मृतियाँ थीं; आँसू नहीं थे, केवल भीगा हुआ मन था।

सभा समाप्त हुई। लोग धीरे-धीरे बाहर निकलने लगे। मैंने अपने मित्र प्रमोद जी की ओर देखा। वे निस्पंद बैठे थे। स्मृति मैडम से उनका आत्मीय संबंध था। उनके चेहरे पर पसरी हुई नीरवता उस गहरे दुःख की साक्षी थी, जिसे शब्द कभी व्यक्त नहीं कर सकते। उस क्षण लगा कि कुछ संबंधों का शोक आँसुओं से नहीं, मौन से व्यक्त होता है।

विनम्र श्रद्धांजलि।


प्रस्तुति :
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की सूक्ति को अपने जीवन में आत्मसात करने वाले द्विभाषी साहित्यकार डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून, 1979) आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वे वर्तमान में मास्टर ट्रेनर (नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति), भारतीय ज्ञान परंपरा–विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत कार्यरत हैं। 

In Memorium: Smriti Ma'am: Memories Remain, Silence Endures... — Abnish Singh Chauhan

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