पुणे, 30 सितंबर 2026: सेंटर ऑफ एक्सीलेंस–इंडियन नॉलेज सिस्टम (CoE–IKS), डी. वाई. पाटिल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी (DYPIU), पुणे के 20 विद्यार्थियों और दो संकाय सदस्यों ने 22 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), नई दिल्ली में आयोजित इमर्शन कार्यक्रम में भाग लिया। IGNCA के कला निधि प्रभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को भारत की समृद्ध बौद्धिक, कलात्मक और सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ ज्ञान संसाधनों के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रसार की समकालीन विधियों से प्रत्यक्ष रूप से परिचित होने का अवसर प्रदान किया।
यह कार्यक्रम CoE–IKS के संस्थापक निदेशक डॉ. अवनीश सिंह चौहान के नेतृत्व में तथा DYPIU के कुलपति प्रो. मनीष भल्ला के मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य कक्षा-कक्ष की शिक्षा को व्यापक बनाना तथा विभिन्न शैक्षणिक विषयों से जुड़े विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा की अंतर्विषयक प्रकृति से परिचित कराना था। DYPIU का CoE–IKS भारत की बौद्धिक परंपराओं को समकालीन शिक्षा, अनुसंधान और अंतर्विषयक अध्ययन से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रहा है।
DYPIU और IGNCA के बीच बढ़ते शैक्षणिक सहयोग के संदर्भ में यह इमर्शन कार्यक्रम विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। अप्रैल 2026 में दोनों संस्थानों ने भारतीय कला, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान पर विशेष ध्यान देते हुए भारतीय ज्ञान प्रणाली के क्षेत्र में सहयोगात्मक अनुसंधान, अकादमिक आदान-प्रदान, दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रसार को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ परिचय एवं स्वागत सत्र से हुआ, जिसके बाद विद्यार्थियों को IGNCA के कार्यों और उसके विभिन्न प्रभागों की गतिविधियों से परिचित कराया गया। प्रो. सुधीर कुमार लाल, डीन, IGNCA, ने प्रतिभागियों को भारत की सांस्कृतिक विरासत के अनुसंधान, संरक्षण, पुनर्स्थापन और दस्तावेजीकरण के क्षेत्र में संस्थान द्वारा किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। डॉ. के. अनिल कुमार, विभागाध्यक्ष, IGNCA, ने विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक व्यापक और अंतर्विषयक क्षेत्र के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया, जिसमें दर्शन, कला, साहित्य, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, भाषा और पारंपरिक ज्ञान पद्धतियाँ शामिल हैं।
इसके बाद कला कोष के माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में विद्यार्थियों को IGNCA में संरक्षित और अध्ययन किए जा रहे भारत के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों को समझने का अवसर मिला। चर्चा ने विद्यार्थियों को यह समझने में सहायता की कि भारतीय ज्ञान परंपराओं को केवल ऐतिहासिक या सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखने के बजाय व्यवस्थित अकादमिक अनुसंधान के माध्यम से भी समझना आवश्यक है।
अगले सत्र में संरक्षण एवं परिरक्षण प्रबंधन पर चर्चा हुई। डॉ. अचल पांड्या, प्रोफेसर एवं प्रमुख, संरक्षण विभाग, ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और सांस्कृतिक सामग्रियों के संरक्षण तथा दीर्घकालिक परिरक्षण में प्रयुक्त वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी। विद्यार्थियों ने दुर्लभ और संवेदनशील विरासत संसाधनों की सुरक्षा के लिए अपनाई जाने वाली भौतिक उपचार, दस्तावेजीकरण और संरक्षण प्रक्रियाओं को समझा।
इसके बाद डॉ. ऋचा नेगी, प्रमुख, आदि-दृश्य, ने विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा की अभिव्यक्ति के रूप में प्रागैतिहासिक शैल कला से परिचित कराया। सत्र में शैल कला की परंपराओं, उनके दस्तावेजीकरण और संरक्षण तथा भारतीय उपमहाद्वीप में प्रारंभिक मानव अभिव्यक्ति एवं सांस्कृतिक प्रथाओं को समझने में उनके महत्व पर चर्चा की गई।
स्लाइड यूनिट के सत्र में श्री वीरेंद्र बांगरू ने भारतीय कला के दृश्य दस्तावेजीकरण से संबंधित जानकारी दी। विद्यार्थियों ने समझा कि दृश्य सांस्कृतिक संसाधनों का व्यवस्थित अभिलेखीकरण उन्हें संरक्षित करने तथा भविष्य के शोध के लिए उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
चाय अवकाश के बाद कार्यक्रम पांडुलिपि इकाई में आगे बढ़ा। डॉ. सरवरुल हक, सहायक प्रोफेसर एवं प्रभारी, पांडुलिपि इकाई, ने विद्यार्थियों को IGNCA में संरक्षित दस्तावेजीकृत पांडुलिपियों के संग्रह से परिचित कराया। सत्र में भारत की विशाल पांडुलिपि विरासत को संरक्षित करने तथा युवा पीढ़ी को इसके दस्तावेजीकरण, संरक्षण और अकादमिक अध्ययन से जोड़ने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया।
रिप्रोग्राफी इकाई द्वारा पांडुलिपियों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए रिप्रोग्राफी एवं माइक्रोफिल्मिंग तकनीकों पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया। श्री सुब्रतो दास, श्री अशोक डोगरा और श्री संजय ने दुर्लभ एवं नाजुक पांडुलिपियों के दस्तावेजीकरण तथा उनकी विषय-वस्तु को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में प्रयुक्त तकनीकी प्रक्रियाओं की जानकारी दी। विद्यार्थियों ने समझा कि वैज्ञानिक और तकनीकी विधियाँ पारंपरिक विरासत संरक्षण के प्रयासों को किस प्रकार सुदृढ़ कर सकती हैं।
इसके बाद डॉ. शिल्पी रॉय, सहायक प्रोफेसर, सांस्कृतिक अभिलेखागार, ने विद्यार्थियों को IGNCA सांस्कृतिक अभिलेखागार से परिचित कराया। सत्र में बताया गया कि सांस्कृतिक अभिलेखागार ज्ञान और कलात्मक अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों, जिनमें संगीत तथा अन्य अमूर्त सांस्कृतिक संसाधन भी शामिल हैं, के बहुविषयक भंडार के रूप में कार्य करते हैं।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को विरासत अनुसंधान में प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका से भी परिचित कराया गया। सांस्कृतिक सूचना-विज्ञान प्रयोगशाला में श्रीमती कामना चौधरी, वरिष्ठ विश्लेषक, ने प्रयोगशाला के अनुसंधान एवं अनुप्रयोगों के बारे में जानकारी दी। विद्यार्थियों ने जाना कि डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ भारत की सांस्कृतिक विरासत के दस्तावेजीकरण, संरक्षण, संगठन, अनुसंधान और प्रसार में किस प्रकार सहायक हो सकती हैं।
इमर्शन कार्यक्रम के अंतिम चरण में प्रतिभागियों ने कला निधि संदर्भ पुस्तकालय का दौरा किया। श्रीमती श्वेता सिंह, LIO, संदर्भ पुस्तकालय, ने विद्यार्थियों को पुस्तकालय के संग्रह और सेवाओं से परिचित कराया। विद्यार्थियों को दुर्लभ पांडुलिपियों और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक संसाधनों को देखने तथा अकादमिक अनुसंधान में विशिष्ट पुस्तकालयों की भूमिका को समझने का अवसर मिला। पुस्तकालय स्वचालन पर डॉ. जसबीर सिंह, सहायक प्रोफेसर, कला निधि, ने प्रतिभागियों को शैक्षणिक संसाधनों तक पहुँच और उनके प्रबंधन में प्रयुक्त तकनीकी प्रणालियों की जानकारी दी।
निर्धारित अकादमिक सत्रों के साथ-साथ इस यात्रा ने DYPIU और IGNCA के विशेषज्ञों के बीच भविष्य में सहयोगात्मक अनुसंधान की संभावनाओं पर संवाद का अवसर भी प्रदान किया। डॉ. गरिमा शर्मा, गतिविधि समन्वयक एवं समन्वयक, CoE–IKS, ने शैक्षणिक यात्रा को संभव बनाने के लिए IGNCA के प्रति आभार व्यक्त किया। डॉ. पथिक साहू, गतिविधि समन्वयक, CoE–IKS, ने DYPIU और IGNCA के बीच अंतर्विषयक सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर चर्चा की।
इस इमर्शन कार्यक्रम में लिबरल आर्ट्स, अर्थशास्त्र, मीडिया एवं संचार अध्ययन, डिजाइन, सिविल इंजीनियरिंग तथा इंजीनियरिंग मैनेजमेंट एवं रिसर्च सहित विभिन्न शैक्षणिक पृष्ठभूमियों के विद्यार्थियों ने भाग लिया। विद्यार्थियों की यह विविधता भारतीय ज्ञान परंपरा की अंतर्विषयक प्रकृति को रेखांकित करती है और यह दर्शाती है कि पारंपरिक भारतीय ज्ञान का अध्ययन समकालीन अकादमिक विषयों के विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जा सकता है।
इस यात्रा ने विद्यार्थियों को कक्षा-कक्ष की शिक्षा से आगे बढ़कर पांडुलिपियों, अभिलेखीय संग्रहों, दृश्य कला, शैल कला, संरक्षण प्रयोगशालाओं, डिजिटल सांस्कृतिक संसाधनों और विशिष्ट पुस्तकालय संग्रहों के साथ प्रत्यक्ष रूप से जुड़ने का अवसर दिया। इस अनुभव ने विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा, विरासत संरक्षण, सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण और अंतर्विषयक अनुसंधान से जुड़े अकादमिक एवं व्यावसायिक अवसरों की संभावनाओं पर विचार करने के लिए भी प्रेरित किया।
इस अवसर पर CoE–IKS, DYPIU के संस्थापक निदेशक डॉ. अवनीश सिंह चौहान ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को इमर्शन कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर प्रदान करने के लिए DYPIU के कुलपति प्रो. मनीष भल्ला के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम के समन्वय के लिए डॉ. गरिमा शर्मा और डॉ. पथिक साहू को बधाई दी तथा विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अनुभवात्मक अधिगम के अवसर विद्यार्थियों में भारत की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत की समझ विकसित करने तथा समकालीन अकादमिक दृष्टिकोणों और अनुसंधान के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
विद्यार्थियों ने दुर्लभ पांडुलिपियों, कलाकृतियों, अभिलेखीय सामग्रियों और अन्य सांस्कृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्रत्यक्ष रूप से देखने के अवसर के प्रति उत्साह व्यक्त किया। IGNCA के विशेषज्ञों के साथ उनकी बातचीत ने उन्हें विरासत संरक्षण के वैज्ञानिक, तकनीकी और अंतर्विषयक आयामों को समझने में सहायता की तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली को अकादमिक और अनुसंधान के उभरते क्षेत्र के रूप में देखने में उनकी रुचि को और मजबूत किया।
IGNCA की टीम ने भारतीय ज्ञान परंपराओं के प्रति DYPIU के विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों द्वारा प्रदर्शित गहरी रुचि की सराहना की। इस अवसर पर IGNCA द्वारा डॉ. गरिमा शर्मा और डॉ. पथिक साहू को स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
भारतीय ज्ञान प्रणाली के प्रति विद्यार्थियों की भागीदारी और योगदान को प्रोत्साहित एवं सम्मानित करने की दिशा में CoE–IKS, DYPIU ने 29 सितंबर 2026 को ‘प्रमाण-पत्र वितरण समारोह’ भी आयोजित किया। समारोह में CoE–IKS के निदेशक डॉ. अवनीश सिंह चौहान और CoE–IKS के सलाहकार सदस्य डॉ. प्रमोद शर्मा उपस्थित रहे, जबकि डॉ. रमेश चंद्र पाठक ने मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता की। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. गरिमा शर्मा, समन्वयक, CoE–IKS, ने डॉ. पथिक साहू, गतिविधि समन्वयक, CoE–IKS के सहयोग से किया।
‘वंदे ब्रज वसुंधरा’ की जीवन-दृष्टि को आत्मसात करने वाले डॉ. अवनीश सिंह चौहान (जन्म: 4 जून 1979) हिंदी और अंग्रेजी के द्विभाषी कवि, कथाकार, आलोचक, अनुवादक एवं संपादक हैं। वे ‘पूर्वाभास’ और ‘क्रिएशन एण्ड क्रिटिसिज्म’ के संपादक तथा आभासी दुनिया में हिंदी नवगीत के संस्थापकों में से एक हैं। वर्तमान में वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत ‘नीतिशास्त्र एवं कथाकथन शिक्षण-पद्धति’ के मास्टर ट्रेनर भी हैं।
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