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सोमवार, 29 अगस्त 2011

धर्मेन्द्र कुमार सिंह, अनिल जनविजय और कुमार मुकुल के पत्र: कविता कोश के सन्दर्भ में


धर्मेन्द्र कुमार सिंह

अनिल जनविजय

कुमार मुकुल


आदरणीय अनिल जी,

ललित जी बिना पैसे के कब तक कविता कोश का काम कर सकते हैं। वो एक सॉफ़्टवेयर प्रोफ़ेशनल हैं और कविता कोश की ही वजह से वो किसी संस्था में स्थाई नौकरी नहीं ले सके हैं। उन्हें उनके स्वयं के खर्चे कविता कोश से निकालने का अधिकार है। आप यूँ समझिए कि हम लोग अपनी सुविधा के अनुसार रचनाएँ जोड़ सकते हैं मगर यदि वो अपना काम करने के लिए अपनी सुविधा देखेंगे तो वेबसाइट चौबीस घंटे कैसे उपलब्ध रहेगी और जब उन्होंने कह दिया है कि वो केवल कविता कोश लोगो, डोमेन नेम और कविता कोश नाम के ही मालिक हैं कविता कोश के नहीं तो फिर मालिकाना हक एक तरह से समाप्त हो जाता है। क्यूँकि यही सारी सामग्री आप दूसरे नाम से भी डाल दीजिए तो वो नाम भी इतना ही प्रसिद्ध हो जाएगा कुछ ही समय में। सामग्री का मालिकाना हक वो एक NGO को देना चाहते हैं जिसमें सात लोग होंगे (उन्होंने कहा था एक स्थान आपके लिए होगा) और इस NGO को हक होगा कि वो कविता कोश के हितों के विरुद्ध कार्य करने पर ललित जी को भी बेदखल कर के सारी सामग्री दूसरे वेबसाइट पर ले जाए। याद कीजिए आप ने इतने साल साथ साथ कविता कोश के लिए काम किया है। यदि कविता कोश से आप वाकई प्यार करते हैं तो आप उसे हमेशा दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करते देखना चाहेंगे। NGO कविता कोश के लिए एक नया कांसेप्ट है, ये सफल भी हो सकता है और असफल भी। मगर प्रयास करने में कोई हर्ज नहीं है। आप / हम कविता कोश के अंग हों या न हों कविता कोश उन्नति करे ये मैं चाहता हूँ और मेरे विचार में आप भी चाहते होंगे। अब अपनी इतनी मेहनत को बर्बाद होते हुए देखना चाहेंगे क्या? ये तो वही बात हुई "जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता"। मैं सिर्फ कविता कोश का समर्थक हूँ और जो भी कविता कोश को आगे ले जाने की कोशिश करेगा उसके साथ हूँ। एक बार आप ललित बनकर सोचिए कि आप क्या करते। मैं उस समय आपके साथ था क्यूँकि आप कविता कोश को बचा रहे थे और ललित जी ने धमकी दी थी कि वो उसे बंद कर देंगे पर ऐसा नहीं हुआ। अब आप क्यूँ इसके विरुद्ध हैं? यदि आप चाहें तो मैं भी कविता कोश में काम करना बंद कर दूँगा। पर मेरे और आपके जाने के बाद क्या होगा? कविता कोश के आधे पन्ने तो आप ने और मैंने ही मिलकर बनाए हैं। आप टीम में स्थान नहीं चाहते ललित जी की वजह से तो कोई बात नहीं लेकिन आप सर्वश्रेष्ठ योगदानकर्त्ता हैं और रहेंगे ये आपसे कोई नहीं छीन सकता, आप भी नहीं।

सादर
धर्मेन्द्र कुमार सिंह

Subject: Re: ललित कुमार का पत्र


भाई प्रेमचन्द जी !

ललित ने कविता कोश चलाने का संकल्प नहीं दिखाया है, बल्कि उसका मालिक बनने का संकल्प दिखाया है। हर NGO का कोई स्वामी होता है और वह स्वामी ललित होगा। बात मेरी ही सच निकली। चूँकि मैं अड़ गया था कि ऐसा नहीं होना चाहिए इसलिए NGO का बहाना खोजा गया है। मुझे निकालने की घोषणा की गई है। कविता कोश टीम ने निकाला। लेकिन टीम के किस सदस्य से यह पूछा गया(प्रतिष्ठा को छोड़कर, और पता नहीं प्रतिष्ठा से भी पूछा या नहीं) कि अनिल को निकाला जाए। ख़ुद ही कविता कोश छोड़ा ललित ने और ख़ुद ही फिर वापिस आ गया। मुझसे बात करने का बहाना किया गया। कुल 48 सैकिन्ड बात हुई। उसी में मैंने कुछ सवाल उठाए और ललित व प्रतिष्ठा ने सम्पर्क काट दिया।

कविता कोश को और गद्यकोश को भी ललित व्यावसायिक रूप देना चाहता था। अब NGO का रूप देकर भी विदेश में बसे भारतीयों से कविता कोश के नाम पर पैसा खींचने की ही योजना है। गद्यकोश को व्यावसायिक बनाने की तो ललित ने घोषणा कर ही दी है। ललित ने लिखा है : "गद्यकोश मेरी अपनी व्यक्तिगत वेबसाइटहोगी। चाहे मैं ऐसा करूं या ना करूं लेकिन मैं कभी भी इसका व्यवसायिक प्रयोग करनेके लिए स्वतंत्र रहूंगा। " जिस वैबसाईट का निर्माण कुछ लोगों ने मिलकर किया है, वह उनकी अपनी वैबसाईट कैसे हो सकती है? "कविता कोश" नाम पर और उसके प्रतीकचिन्ह पर निजी स्वामित्व बताने का मतलब क्या कविता कोश पर अपना स्वामित्व बताना नहीं है ?

कविता कोश की गवर्निंग बॉडी में किसी भी साहित्यकार को शामिल न करने का मतलब क्या यह नहीं है कि ललित अपने परिवार के लोगों और मित्रों को ही कविता कोश का संचालन सौंपने जा रहा है ?
जिस भाषा में ये सब जानकारियाँ भेजी गई हैं, वह भाषा क्या यह नहीं दिखाती कि मैं मालिक हूँ और आप सबको वही करना होगा जो मैं कहूँगा। "सम्पादक कविता कोश के प्रशासक के प्रति उत्तरदायी होगा" यानी प्रशासक (या मालिक या स्वामी) जब चाहेगा सम्पादक को कान पकड़कर निकाल बाहर करेगा।

बातें और भी बहुत सी हैं । लेकिन मेरे पास समय नहीं है।

सादर
अनिल


प्रिय ललितजी,

कोश को लेकर मैंने कुछ सवाल उठाये थे आपने जवाब भी दिये। मैंने फिर एक संक्षिप्‍त जवाब दिया था, दरअसल मैं इस सबसे उबने लगा था। मैं एक अदना सा योगदानकर्ता मुझे इस मालिक और प्रशासक के द्वंद्व में पडना ही नही चाहिए था। मन की शांति मुझे भी चाहिए। पर कोश के एनजीओकरण को लेकर मेरा मन मान नहीं रहा सो मैं खुद को कोश से अलग कर रहा हूं। आगे से इस सवाल जवाब में मेरी रूचि नहीं क्‍योकि यह साहित्‍येतर विषय है और चूंकि आप साहित्‍य को कोश से इतर कर रहे हैं तो एक तथाकथित साहित्‍यकार होने के कारण मैं खुद को कोश के व्‍यवसायीकरण से अलग कर रहा हूं।

आपका व्‍यवसाय बढे इस शुभकामना के साथ!

कुमार मुकुल


2 टिप्‍पणियां:

  1. सब निकल ही जायेंगे, तो रहेगा कौन? ललित जी ने यह तो नहीं ही सोचा होगा ।

    कविता कोश का व्यावसायिक होना/न होना, यह किसी के सम्मान और असम्मान से जुड़ा प्रश्न नहीं है । प्रश्न है कविता कोश के भविष्य में किसी भी बन सकने वाले स्वरूप में प्रत्येक योगदानकर्ता का सम्मान और उसका स्थान कितना सुरक्षित है ।

    कविता कोश व्यक्तिगत नहीं, सो गद्य कोश भी नहीं, इसमें समझने/समझाने जैसा कुछ है ही नहीं । दोनों एक-से हैं - सामूहिक ।

    NGO बन जाये तो इसमें हर्ज़ क्या? पर इस तरह से? ऐसे वक़्त में दिए गए प्रस्ताव से? इस वाद-विवाद के मध्य? बस एक व्यक्ति की चिन्तन-दृष्टि से- बिलकुल नहीं । सब कुछ और कुछ दिन क्यों नहीं चल सकता ऐसे ही, पहले-सा !

    अनिल जी और प्रेमचन्द जी को खोना कोश को पिछले पैरों पर ले आने जैसा है, इसे कोई समझाये भई ! मैंने कविता कोश को ’अनिल जनविजय’ के श्रमसाध्य कर्म, उनकी निष्ठा से ही जाना-पहचाना है । बाद में जानने की कोशिश की कि यह शुरुआत कहाँ से हुई, किसने की, परिकल्पना किसकी थी? तो ललित जी सामने आये, पर इससे क्या ! कविता कोश के योगदानकर्त्ताओं में ऊपर ही चमकते रहने वाले इस नाम का खयाल तो होना ही चाहिए !

    ललित जी की व्यावसायिक परेशानियाँ हल हों, चाहते हम सब हैं/होंगे, पर कविता कोश की कीमत पर? ललित जी की भावुकता को यहाँ तो ठहर कर सोचना ही चाहिए!

    पहली बार कुछ कह रहा हूँ, किसी को भी कुछ कहना अपने आप को कहना समझ में आ रहा है । कविता कोश मेरी भी निष्ठा में शामिल है । उसे यूँ ठिठकते, सहमते देखना सुहा नहीं रहा ।

    खैर, शेष फिर............

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय अवनीश जी
    , यह देखकर अच्छा नहीं लगा कि आज फिर आपके द्वारा कविताकोश के शीर्ष पदाधिकारियों के मध्य हो रही बातचीत को सार्वजनिक किया
    गया। मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि आप यह सब करते हुये क्या प्रदर्शित करना चाहते हैं । अभी एक माह भी नहीं हुआ है कि जिस संस्था ने आपको पुरस्कृत /सम्मानित किया था आप उसके आपसी विवादों को चटखारें लेकर सार्वजनिक कर रहे हैं । विचार करें कि क्या ऐसा करना उचित है ? फैसला आप ही करें । मेरे विचार से इस प्रकार का व्यवहार प्रदर्शित होने पर विवाद
    सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझता जायेगा। मैं भी आदरणयीय अनिल जनविजय जी का प्रशंसक हूँ तथा यह विश्वास रखता हूँ कि अंततोगत्वा प्रशासक एवं संपादक के मध्य यह विवाद सुलझेगा और श्री अनिल जनविजय जी उसी शिद्दत और सम्मान के साथ कविताकोश में वापिस लौटेगे और इसको अपना वैसा ही स्नेह देंगें जैसा विगत चार पाँच वर्षो से देते रहे है। मेरा मानना है कि अनिल जी जैसे उत्कृष्ट साहित्यकारो के मार्गदर्शन से ही यह परियोजना एक इनसाक्लोपीडिया का रूप लेती जा रही थी। आज ललित जी के ब्लाग दशमलव पर कविताकोश की भावी रूपरेखा के संबंध में विवरण प्रकाशित हुआ है इसमें योगदानकर्ताओं को उनके योगदान के लिये पारिश्रमिक देने जैसे प्राविधान शामिल किये गये हैं। मुझे लगता है कि आपको इस विषय में अपनी राय रखनी चाहिये कि जिन साहित्यकारों का साहित्य इस कोश में संकलित है क्या उन्हें भी रायल्टी दिये जाने का प्राविधान डाला जाय? हम सबको सार्थक बहस करते हुये परियोजना के लिये श्री अनिल जनविजयजी की अपरिहार्यता को साबित करना चाहिये जिससे परियोजना प्रशासक पर इस बात का नैतिक दबाव बन सके कि वे अनिल जी के साथ ही परियोजना को आगे बढायें। विश्वास करूँगा कि हम सबकी प्रार्थनायें अपना असर डालेंगी और कविताकोश और अनिल जनविजय जी पुनः एक दूसरे के पूरक होंगे। दशमलव पर कविताकोश की भावी रूपरेखा के संबंध में प्रकाशित आलेख पर विस्तृत टिप्पणी पृथक से भी लिखूँगा।भवदीय अशोक कुमार शुक्ला

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