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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

चार नवगीत: कवि- डॉ. जगदीश 'व्योम'

 डॉ. जगदीश 'व्योम'

विकीपीडिया पर हिन्दी के उत्थान में एक अरसे से अनूठा कार्य करने वाले डॉ जगदीश 'व्योम' हिन्दी साहित्य को समर्पित कई चिट्ठे भी संचालित-संपादित कर रहे हैं। यानी हिन्दी साहित्य, हाइकु दर्पण, हाइकु कोश, राजभाषा संवाद, हाइकु कानन, काव्यकुंज, उड़ान, कवि सरल, व्योम के पार, हिन्दी ब्लाग कोश, बाल प्रतिबिम्ब, हाइकु कोश, नवगीत आदि चिट्ठे उनके अथक परिश्रम और सोच-समझ का सुफल हैं। लेकिन इसके साथ रहा है आपका और भी महत्वपूर्ण कार्य- गीत, कविता, आलोचना, कहानी, उपन्यास, हाइकू आदि विधाओं में मौलिक और प्रेरणास्पद रचनाकर्म।  डा० व्योम जी का जन्म (०१-०५-१९६०) शम्भूनगला, फर्रुखाबाद, उ. प्र. (भारत) मे हुआ। डा० व्योम जी ने एम० ए० (हिन्दी साहित्य), एम.एड. तथा पी-एच. डी. हिन्दी साहित्य में (कन्नौजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण) विषय पर लखनऊ विश्वविद्यालय से की। पेशे से शिक्षक डॉ. व्योम हिंदी हाइकु के क्षेत्र में अपने विशेष योगदान के लिए जाने जाते हैं। वे हिंदी हाइकु की विशेष पत्रिका हाइकु दर्पण के संपादक भी हैं। इसके अतिरिक्त भारत की अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में आपके शोध लेख, कहानी, बालकहानी, हाइकु, नवगीत आदि का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी दिल्ली, मथुरा, सूरतगढ़, ग्वालियर, लखनऊ, भोपाल आदि केंद्रों से आपकी कविता, कहानी तथा वार्ताओं का प्रसारण भी हो चुका है। आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं - इंद्रधनुष, भोर के स्वर (काव्य संग्रह), कनउजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण (शोध ग्रंथ), कन्नौजी लाकोक्ति और मुहावरा कोश (कोश), नन्हा बलिदानी, डब्बू की डिबिया (बाल उपन्यास), सगुनी का सपना, चुनियाँ के आँसू (बाल कहानी संग्रह), आज़ादी के आस-पास, कहानियों का कुनबा (संपादित कहानी संग्रह), हाइकु दर्पण, बाल प्रतिबिंब (संपादन)। शोधग्रंथ 'कनउजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण' के लिए 'प्रकाशिनी हिंदी निधि', कन्नौज सहित कई संस्थाओं द्वारा आपको सम्मानित किया जा चुका है। 'नन्हा बलिदानी' बाल उपन्यास के लिए आपको पाँच पुरस्कार प्रदान किये जा चुके हैं। संप्रति: दिल्ली प्रशासन के अन्तर्गत शिक्षा विभाग में प्राचार्य। संपर्क: dr_vyom@yahoo.com,  jagdishvyom@gmail.com। आपकी चार रचनाएँ यहाँ प्रस्तुत हैं:-


१. अपने घर के लोग

औरों की भर रहे तिजोरी
अपने घर के लोग

सच कहना तो ठीक
मगर इतना सच नहीं कहो
जैसे सहती रही पीढ़ियाँ
तुम भी वही सहो
आज़ादी है, बोलो
लेकिन "कुछ भी" मत बोलो
जनता के मन में
सच्चाई का विष मत घोलो
नियति-नटी कर रही सदा से
ऐसे अज़ब प्रयोग

राजा चुप
रानी भी चुप है
चुप सारे प्यादे
सिसक रहे सब
सैंतालिस से पहले के वादे
घर का कितना माल-ख़जाना
बाहर चला गया
बहता हुआ पसीना
फिर इत्रों से छला गया
जो बोला, लग गया उसी पर
एक नया अभियोग

सहम गई है हवा
लग रहा आँधी आयेगी
अंहकार के छानी-छप्पर
ले उड़ जायेगी
भोला राजा रहा ऊँघता
जनता बेचारी
सभासदों ने
कदम-कदम पर की है मक्कारी
कोई अनहद उठे
कहीं से, हो ऐसा संयोग

२. न जाने क्या होगा

सिमट गई
सूरज के रिश्तेदारों तक ही धूप
न जाने क्या होगा

घर में लगे उकसने कांटे
कौन किसी का क्रंदन बांटे
अंधियारा है गली-गली
गुमनाम हो गई धूप
न जाने क्या होगा

काल-चक्र रट रहा ककहरा
गूंगा वाचक, श्रोता बहरा
तौल रहे तुम, बैठ-
तराजू से दुपहर की धूप
न जाने क्या होगा

कंपित सागर, डरी दिशाएं
भटकी-भटकी सी प्रतिभाएं
चली ओढ़ कर अंधकार की
अजब ओढ़नी धूप,
न जाने क्या होगा

घर हैं अपने चील-घोंसले
घायल गीत जनम कैसे लें
जीवन की अभिशप्त प्यास
भड़का कर चल दी धूप
न जाने क्या होगा

सहमी-सहमी नदी धार है
आंसू टपकाती बहार है
भटके को पथ दिखलाकर,
 खुद-भटक गई है धूप
न जाने क्या होगा

समृतिमय हर रोम-रोम है
एक उपेक्षित शेष व्योम है
क्षितिज अंगुलियों में फँसकर फिर
फिसल गई है धूप
न जाने क्या होगा

बलिदानी रोते हैं जब-तब
देख-देख अरमानों के शव
मरघट की वादियां
खोजने लगीं
सुबह की धूप
न जाने क्या होगा

३. हम पलाश के वन


ये कैसी आपाधापी है
ये कैसा क्रंदन
दूर खड़े चुप रहे देखते
हम पलाश के वन ।

तीन पात से बढ़े न आगे
कितने युग बीते
अभिशापित हैं जनम-जनम से
हाथ रहे रीते
सहते रहे ताप, वर्षा
पर नहीं किया क्रंदन
हम पलाश के वन ।

जो आया उसने धमकाया
हम शोषित ठहरे
राजमहल के द्वार, कंगूरे
सब के सब बहरे
करती रहीं पीढ़ियाँ फिर भी
झुक-झुक अभिनंदन
हम पलाश के वन । 

धारा के प्रतिकूल चले हम
जिद्दीपन पाया
ऋतु वसंत में नहीं
ताप में पुलक उठी काया
चमक-दमक से दूर
हमारी बस्ती है निर्जन
हम पलाश के वन ।

४. बाजीगर बन गई व्यवस्था

बाजीगर बन गई व्यवस्था
हम सब हुए जमूरे
सपने कैसे होंगे पूरे ।

चार कदम भर चल पाए थे
पैर लगे थर्राने
क्लांत प्रगति की निरख विवशता
छाया लगी चिढ़ाने
मन के आहत मृगछौने ने
बीते दिवस बिसूर
सपने कैसे होंगे पूरे ।

हमने निज हाथों से युग–
पतवार जिन्हें पकड़ाई
वे शोषक हो गए
हुए हम चिर शोषित तरुणाई
'शोषण' दुर्ग हुआ अलबत्ता–
तोड़ो जीर्ण कंगूरे
सपने कैसे होंगे पूरे ।

वे तो हैं स्वच्छंद, करेंगे
जो मन में आएगा
सूरज को गाली देंगे
कोई क्या कर पाएगा
दोष व्यक्ति का नहीं
व्यवस्था में छल-छिद्र घनेरे
सपने कैसे होंगे पूरे ।

मिला भेड़ियों को भेड़ों की
अधिरक्षा का ठेका
जिन सफ़ेदपोशों को मैंने
देश निगलते देखा
स्वाभिमान को बेच, उन्हें
मैं कब तक नमन करूँ रे
सपने कैसे होंगे पूरे ।

बदल गए आदर्श
आचरण की बदली परिभाषा
चोर लुटेरे हुए घनेरे
यह अभिशप्त निराशा
बदले युग के वर्तमान को
किस विधि से बदलूँ रे
सपने कैसे होंगे पूरे ।

Four Hindi Lyrics/ Navgeet of Dr Jagdish 'Vyom'

7 टिप्‍पणियां:

  1. मन को गहराई तक छूते हुए सभी नवगीत हर दृष्टि से अति सुंदर हैं।

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  2. प्रतिक्रिया के लिए आभार कल्पना जी

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  3. मन को छूते सभी नवगीत सुंदर हैं।
    Dr Saraswati Mathur

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  4. चारो नवगीत पढ़े .. कुछ पल तक अंतर्मन में सचमुच अनहद ही गूंजता रह। वयवस्था के निरन्तर पतन से उपजे नैराश्य एवं चिन्ताओं को कवि मन प्रत्येक छन्द में पाठक की आत्मा को नैसर्गिक लय के साथ बांधते हुये लोक सरोकारों के प्रति ध्यानाकर्षित करता है। एक आह्वान .. भी
    सभी गीत काव्यशिल्प की अभिनव पाठशाला भी हैं एवं प्रेरणा भी - नमन काव्यशिल्प एवं कथ्य को।

    चारो गीतों से उल्लेखनीय अंतरे प्रस्तुत हैं
    ..
    कदम-कदम पर की है मक्कारी
    कोई अनहद उठे
    कहीं से, हो ऐसा संयोग
    ..

    बलिदानी रोते हैं जब-तब
    देख-देख अरमानों के शव
    मरघट की वादियां
    खोजने लगीं
    सुबह की धूप
    न जाने क्या होगा
    ..

    धारा के प्रतिकूल चले हम
    जिद्दीपन पाया
    ऋतु वसंत में नहीं
    ताप में पुलक उठी काया
    चमक-दमक से दूर
    हमारी बस्ती है निर्जन
    हम पलाश के वन ।
    ..
    हमने निज हाथों से युग–
    पतवार जिन्हें पकड़ाई
    वे शोषक हो गए
    हुए हम चिर शोषित तरुणाई
    'शोषण' दुर्ग हुआ अलबत्ता–
    तोड़ो जीर्ण कंगूरे
    सपने कैसे होंगे पूरे ।
    ..
    मिला भेड़ियों को भेड़ों की
    अधिरक्षा का ठेका
    जिन सफ़ेदपोशों को मैंने
    देश निगलते देखा
    स्वाभिमान को बेच, उन्हें
    मैं कब तक नमन करूँ रे
    सपने कैसे होंगे पूरे ।

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  5. डॉ. व्योम ऐसे रचनाकारों में से हैं जो बहुत ही कम लिखते हैं। लेकिन वे जब भी लिखते हैं तब उनकी रचना एक सिद्धहस्त वरिष्ठ लेखक की रचना की तरह परिपक्व आकार लेती है। यहाँ प्रस्तुत उनकी रचनाओं में उनकी यह बानगी देखी जा सकती है। कथ्य और शिल्प के अतिरिक्त उनकी रचनाओं में अंतर्कथाएँ, संदर्भ और यथार्थ को रचने के तेवर देखने योग्य होते हैं। रचनाकार और प्रकाशक दोनों को बधाई !!

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  6. डा व्योम जी के चार नवगीत बार बार पढ़े जिनमें समाज तथा राजनीती के साथ साथ जीवन मूल्यों में होने वाले ह्रास की और संकेत किया गया है | पाठक रचना का आनंद लेते हुए भी चिंतन और मनन की स्थिति से गुजरता है जिसमें भविष्य के प्रति चिंता की भावना जागृत होती है | जागरूकता के साथ साथ प्रेरणा प्रदान करने वाली इन रचनायों के लिए व्योम जी का धन्यवाद तथा अवनीश जी का आभार |

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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