पूर्वाभास पर आपका हार्दिक स्वागत है। 2012 में पूर्वाभास को मिशीगन-अमेरिका स्थित 'द थिंक क्लब' द्वारा 'बुक ऑफ़ द यीअर अवार्ड' प्रदान किया गया। 2014 में मेरे प्रथम नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' को अभिव्यक्ति विश्वम् द्वारा 'नवांकुर पुरस्कार' एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' प्रदान किया गया। इस हेतु सुधी पाठकों और साथी रचनाकारों का ह्रदय से आभार।

शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

दो नवगीत: कवि- गुलाब सिंह

गुलाब सिंह

कुम्भ नगरी के रूप में विश्वविख्यात और उत्तर भारत की तीन नदियों (गंगा, यमुना एवं सरस्वती) के संगम स्थल के लिए जाना जाने वाला इलाहाबाद (प्राचीन नाम प्रयाग) ने जहाँ देश को स्वतंत्रता सेनानी, प्रधानमंत्री , वैज्ञानिक, अभिनेता, प्रशासक, खिलाड़ी, शिक्षाविद, समाज सुधारक आदि दिए, वहीं दिए हैं कई विशिष्ट साहित्यकार, जिनमें नवगीत के क्षेत्र में गुलाब सिंह जी का नाम भी शामिल है५ जनवरी १९४४ को जनपद इलाहाबाद (उ.प्र.) के ग्राम बिगहनी में जन्मे कवि गुलाब सिंह  के गीतों में भारतीय ग्राम्य संस्कृति, वहाँ का जीवन और उसके राग-रंगों का मनोहारी चित्रण दिखाई पड़ता है। आपकी रचनाओं में जहां आधुनिक गांव-समाज की संगत एवं विसंगत छवियां देखने को मिलती हैं वहीं मानवी संवाद भी स्थापित होता चलता है आप के द्वारा गढे हुए प्रतीकों-विम्बों के चिन्तनपरक चित्रांकन एवं रागवेशित भावाभिव्यक्ति से। देखने में सरल, विनम्र और सादगी पसन्द गुलाब सिंह  राजकीय इण्टर कालेज के प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। १९६२ से देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। ‘धूल भरे पांव’, ‘बांस और बासुरी’, ‘जड़ों से जुड़े हुए’ इनके प्रमुख नवगीत संग्रह हैं। 'पानी के फेरे ' उपन्यास है। साथ ही डॉ  शम्भुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित 'नवगीत दशक ' और 'नवगीत अर्धशती' में भी आपके गीत संकलित किये गये हैं । संपर्क-  ग्रा. व  पोस्ट - बिगहनी, जनपद- इलाहाबाद, उ.प्र.  मोब.-09936379937 कई पुरस्कारों से सम्मानित इस गीत कवि के दो नवगीत यहाँ दिए जा रहे हैं:-

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
1. हतप्रभ हैं शब्द 

शायद किसी मोड़ पर
ठहर जाए
थककर हाँफती
जिन्दगी लौट आए

पीपल के पत्तों तक का
हिलना बन्द है
इस कदर
मौसम निष्पंद है
हवाओं के झोंके
सिर्फ उठें श्मशानों से
भटक रही राख
खुली आँखों में पड़ जाए

मंचों पर नाच रही
कठपुतली
मिट्‌टी खाए मुँह में
डाले टेढ़ी अँगुली
छिः छिः आ आ
माँ बार बार दुहराए
बच्चा बस रो रोकर
मौन मुस्कराए

हतप्रभ हैं शब्द
दया करुणा संवेदना
सब कहते अपने को
दुनिया की आँखों से देखना
कौन सी दुनिया
यही जो मूल्यों के शस्य डाल-
खड़ी है दोनो हाथ
उन पर आए ।

2. गीतों का होना

गीत न होंगे
क्या गाओगे?

हँस-हँस रोते
रो-रो गाते
आँसू-हँसी
राग-ध्वनि-रंजित
हर पल को
संगीत बनाते
लय-विहीन
हो गए अगर
तो कैसे फिर
सम पर आओगे

तन में कण्ठ
कण्ठ में स्वर है
स्वर शब्दों की
तरल धार ले
देह नदी
हर साँस लहर है
धारा को अनुकूल
किए बिन
दिशाहीन बहते जाओगे

स्वर अनुभावन
भाव विभावन
ऋतु वैभव
विन्यास पाठ विधि
रचनाओं के
फागुन-सावन
मुक्त-प्रबंध
काव्य कौद्गाल से
धवल नवल
रचते जाओगे ।

Two Poems Of Varishth Navgeetkar Gulab Sing

5 टिप्‍पणियां:

  1. दीपावली के शुभ अवसर पर, चल अरुणिम देख छटा
    दो नवगीतों को लेकर के, पूर्व-आभास घटा
    राजगीर के दर्शनीय कर, नीरसता तनिक बटा
    राम-राम भाई जी कहता, गिल्टी का रोग लटा

    लिंक आपकी रचना का है
    अगर नहीं इस प्रस्तुति में,
    चर्चा-मंच घूमने यूँ ही,
    आप नहीं क्या आयेंगे ??
    चर्चा-मंच ६७६ रविवार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. गीत न होगे ... क्या गाओगे ...
    बहुत ही सुन्दर ... लाजवाब गीत हैं दोनों ...

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  3. वाह बहुत हि सुन्दर!
    दिवाली कि हार्दिक शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं

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